भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1987, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1987

यह सुनकर सावित्री शीघ्र अपने पतिके पास आयी और उनका सिर गोदमें लेकर पृथ्वीपर बैठ गयी ॥ ६ ॥

ततः सा नारदवचो विमृशन्ती तपस्विनी । तं मुहूर्तं क्षणं वेलां दिवसं च युयोज ह ॥ ७ ॥

फिर वह तपस्विनी राजकन्या नारदजीकी बात याद करके उस मुहूर्त, क्षण, समय और दिनका योग मिलाने लगी ॥ ७ ॥

मुहूर्तादिव चापश्यत् पुरुषं रक्तवाससम् । बद्धमौलिं वपुष्मन्तमादित्यसमतेजसम् ॥ ८ ॥ श्यामावदातं रक्ताक्षं पाशहस्तं भयावहम् । स्थितं सत्यवतः पार्श्वे निरीक्षन्तं तमेव च ॥ ९ ॥

दो ही घड़ीमें उसने देखा, एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए हैं, जिनके शरीरपर लाल रंगका वस्त्र शोभा पा रहा है। सिरपर मुकुट बँधा हुआ है। सूर्यके समान तेजस्वी होनेके कारण वे मूर्तिमान् सूर्य ही जान पड़ते हैं। उनका शरीर श्याम एवं उज्ज्वल प्रभासे उद्भासित है, नेत्र लाल हैं। उनके हाथमें पाश है। उनका स्वरूप डरावना है। वे सत्यवान्‌के पास खड़े हैं और बार-बार उन्हींकी ओर देख रहे हैं ॥ ८-९ ॥

तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय भर्तुर्न्यस्य शनैः शिरः । कृताञ्जलिरुवाचार्ता हृदयेन प्रवेपती ॥ १० ॥

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