महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1988, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्हें देखते ही सावित्रीने धीरेसे पतिका मस्तक भूमिपर रख दिया और सहसा खड़ी हो हाथ जोड़कर काँपते हुए हृदयसे वह आर्त वाणीमें बोली ।। १० ।।
सावित्र्युवाच
दैवतं त्वाभिजानामि वपुरेतद्ध्यमानुषम् । कामया ब्रूहि देवेश कस्त्वं किं चिकीर्षसि ।। ११ ।।
सावित्रीने कहा— मैं समझती हूँ, आप कोई देवता हैं; क्योंकि आपका यह शरीर मनुष्यों-जैसा नहीं है। देवेश्वर! यदि आपकी इच्छा हो तो बताइये आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं ।। ११ ।।
यम उवाच
पतिव्रतासि सावित्रि तथैव च तपोऽन्विता । अतस्त्वामभिभाषामि विद्धि मां त्वं शुभे यमम् ।। १२ ।।
यमराज बोले— सावित्री! तू पतिव्रता और तपस्विनी है, इसलिये मैं तुझसे वार्तालाप कर सकता हूँ। शुभे! तू मुझे यमराज जान ।। १२ ।।
अयं ते सत्यवान् भर्ता क्षीणायुः पार्थिवात्मजः । नेष्यामि तमहं बद्ध्वा विद्ध्येतन्मे चिकीर्षितम् ।। १३ ।।
तेरे पति इस राजकुमार सत्यवान्की आयु समाप्त हो गयी है, अतः मैं इसे बाँधकर ले जाऊँगा। बस, मैं यही करना चाहता हूँ ।। १३ ।।
सावित्र्युवाच
श्रूयते भगवन् दूतास्तवागच्छन्ति मानवान् । नेतुं किल भवान् कस्मादागतोऽसि स्वयं प्रभो ।। १४ ।।
सावित्रीने पूछा— भगवन्! मैंने तो सुना है कि मनुष्योंको ले जानेके लिये आपके दूत आया करते हैं। प्रभो! आप स्वयं यहाँ कैसे चले आये? ।। १४ ।।
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्तः पितृराजस्तां भगवान् स्वचिकीर्षितम् । यथावत् सर्वमाख्यातुं तत्प्रियार्थं प्रचक्रमे ।। १५ ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! सावित्रीके इस प्रकार पूछनेपर पितृराज भगवान् यमने उसका प्रिय करनेके लिये अपना सारा अभिप्राय यथार्थरूपसे बताना आरम्भ किया ।। १५ ।।
अयं च धर्मसंयुक्तो रूपवान् गुणसागरः । नार्हो मत्पुरुषैर्नेतुमतोऽस्मि स्वयमागतः ।। १६ ।।