भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1989, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1989

'यह सत्यवान् धर्मात्मा, रूपवान् और गुणोंका समुद्र है। मेरे दूतोंद्वारा ले जाया जाने योग्य नहीं है। इसीलिये मैं स्वयं आया हूँ' ।। १६ ।।
ततः सत्यवतः कायात् पाशबद्धं वशं गतम् ।
अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निष्कर्ष यमो बलात् ।। १७ ।।
तदनन्तर यमराजने सत्यवान्‌के शरीरसे पाशमें बँधे हुए अंगुष्ठमात्र परिमाणवाले विवश हुए जीवको बलपूर्वक खींचकर निकाला ।। १७ ।।
ततः समुद्धृतप्राणं गतश्वासं हतप्रभम् ।
निर्विचेष्टं शरीरं तद् बभूवाप्रियदर्शनम् ।। १८ ।।
फिर तो प्राण निकल जानेसे उसकी साँस बंद हो गयी—अंगकान्ति फीकी पड़ गयी और शरीर निश्चेष्ट होकर अपरूप दिखायी देने लगा ।। १८ ।।
यमस्तु तं ततो बद्ध्वा प्रयातो दक्षिणामुखः ।
सावित्री चैव दुःखार्ता यममेवान्वगच्छत ।
नियमव्रतसंसिद्धा महाभागा पतिव्रता ।। १९ ।।
यमराज उस जीवको बाँधकर साथ लिये दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये। सावित्री दुःखसे आतुर हो यमराजके ही पीछे-पीछे चल पड़ी। वह परम सौभाग्यवती पतिव्रता राजकन्या नियमपूर्वक व्रतोंके पालनसे पूर्णतः सिद्ध हो चुकी थी। (अतः निर्बाध गतिसे सर्वत्र आने-जानेमें समर्थ थी) ।। १९ ।।

यम उवाच

निवर्त गच्छ सावित्रि कुरुष्वास्यौर्ध्वदेहिकम् ।
कृतं भर्तुस्त्वयाऽऽनृण्यं यावद् गम्यं गतं त्वया ।। २० ।।
**यमराज बोले—**सावित्री! अब तू लौट जा, सत्यवान्‌का अन्त्येष्टि-संस्कार कर। अब तू पतिके ऋणसे उऋण हो गयी। पतिके पीछे तुझे जहाँतक आना चाहिये था, तू वहाँतक आ चुकी ।। २० ।।

सावित्र्युवाच

यत्र मे नीयते भर्ता स्वयं वा यत्र गच्छति ।
मया च तत्र गन्तव्यमेष धर्मः सनातनः ।। २१ ।।
**सावित्रीने कहा—**जहाँ मेरे पति ले जाये जाते हैं अथवा ये स्वयं जहाँ जा रहे हैं, वहीं मुझे भी जाना चाहिये; यही सनातन धर्म है ।। २१ ।।
तपसा गुरुभक्त्या च भर्तुः स्नेहाद् व्रतेन च ।
तव चैव प्रसादेन न मे प्रतिहता गतिः ।। २२ ।।
तपस्या, गुरुभक्ति, पतिप्रेम, व्रतपालन तथा आपकी कृपासे मेरी गति कहीं भी रुक नहीं सकती ।। २२ ।।