महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1990, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राहुः साप्तपदं मैत्रं बुधास्तत्त्वार्थदर्शिनः । मित्रतां च पुरस्कृत्य किञ्चिद् वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ २३ ॥ तत्त्वार्थदर्शी विद्वान् ऐसा कहते हैं कि सात पग साथ चलनेमात्रसे मैत्री-सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, उसी मित्रताको सामने रखकर मैं आपसे कुछ निवेदन करूँगी, उसे सुनिये ॥ २३ ॥
नानात्मवन्तस्तु वने चरन्ति धर्मं च वासं च परिश्रमं च । विज्ञानतो धर्ममुदाहरन्ति तस्मात् सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥ २४ ॥ जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, वे वनमें रहकर धर्मपालन, गुरुकुलवास तथा कष्टसहनरूप तपस्या नहीं कर सकते हैं। जितेन्द्रिय पुरुष ही यह सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। महात्मालोग विवेक-विचारसे ही धर्म-प्राप्ति बताते हैं, अतः सभी सत्पुरुष धर्मको ही श्रेष्ठ मानते हैं ॥ २४ ॥
एकस्य धर्मेण सतां मतेन सर्वे स्म तं मार्गमनुप्रपन्नाः । मा वै द्वितीयं मा तृतीयं च वाञ्छे तस्मात् सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥ २५ ॥ अपने एक ही वर्णके सत्पुरुष-सम्मत धर्मका पालन करनेसे सभी लोग उस विज्ञान-मार्गपर पहुँच जाते हैं, जो सबका लक्ष्य है। अतः दूसरे या तीसरे वर्णकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये। इसलिये साधु पुरुष केवल वर्ण-धर्मको ही प्रधानता देते हैं ॥ २५ ॥
यम उवाच
निवर्त तुष्टोऽस्मि तवानया गिरा स्वराक्षरव्यञ्जनहेतुयुक्तया । वरं वृणीष्वेह विनास्य जीवितं ददानि ते सर्वमनिन्दिते वरम् ॥ २६ ॥ **यमराज बोले—**अनिन्दिते! तू लौट जा। स्वर, अक्षर, व्यंजन एवं युक्तियोंसे युक्त तेरी इन बातोंसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तू यहाँ मुझसे कोई वर माँग ले। सत्यवान्के जीवनके सिवा मैं और सब कुछ तुझे दे सकता हूँ ॥ २६ ॥
सावित्र्युवाच
च्युतः स्वराज्याद् वनवासमाश्रितो विनष्टचक्षुः श्वशुरो ममाश्रमे । स लब्धचक्षुर्बलवान् भवेन्नृप-