महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1991, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्तव प्रसादाज्ज्वलनार्कसंनिभः ॥ २७ ॥
**सावित्री बोली—**भगवन्! मेरे श्वशुर अपने राज्यसे भ्रष्ट होकर वनमें रहते हैं। उनकी आँखें भी नष्ट हो गयी हैं। मैं चाहती हूँ, आपकी कृपासे उन महाराजको उनकी आँखें मिल जायँ और वे बलवान् तथा अग्नि एवं सूर्यके समान तेजस्वी हो जायँ ॥ २७ ॥
यम उवाच
ददानि तेऽहं तमनिन्दिते वरं
यथा त्वयोक्तं भविता च तत् तथा ।
तवाध्वना ग्लानिमिवोपलक्षये
निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत् ॥ २८ ॥
**यमराज बोले—**अनिन्दिते! मैं तुझे वर देता हूँ। तूने जैसा कहा है, वह सब वैसा ही होगा। मैं देखता हूँ, तू राह चलनेके कारण बहुत थक गयी है। अब लौट जा, जिससे तुझे अधिक परिश्रम न हो ॥ २८ ॥
सावित्र्युवाच
श्रमः कुतो भर्तृसमीपतो हि मे
यतो हि भर्ता मम सा गतिर्ध्रुवा ।
यतः पतिं नेष्यसि तत्र मे गतिः
सुरेश भूयश्च वचो निबोध मे ॥ २९ ॥
**सावित्री बोली—**स्वामीके समीप रहते हुए मुझे श्रम हो ही कैसे सकता है। जहाँ मेरे पतिदेव रहेंगे, वहीं मेरी भी गति निश्चित है। आप जहाँ मेरे प्राणनाथको ले जायँगे, वहीं मेरा जाना भी अवश्यम्भावी है। देवेश्वर! आप फिर मेरी बात सुनिये ॥ २९ ॥
सतां सकृत्संगतमीप्सितं परं
ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते ।
न चाफलं सत्पुरुषेण सङ्गतं
ततः सतां संनिवसेत् समागमे ॥ ३० ॥
सत्पुरुषोंका एक बारका समागम भी अत्यन्त अभीष्ट होता है। उनके साथ मित्रता हो जाना उससे भी बढ़कर बताया गया है। साधु पुरुषका संग कभी निष्फल नहीं होता; अतः सदा सत्पुरुषोंके ही समीप रहना चाहिये ॥ ३० ॥
यम उवाच
मनोऽनुकूलं बुधबुद्धिवर्धनं
त्वया यदुक्तं वचनं हिताश्रयम् ।
विना पुनः सत्यवतोऽस्य जीवितं