महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1997, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै। अधिक क्या कहूँ, मैं पतिके बिना जीवित रहना भी नहीं चाहती ॥ ५३ ॥
वरातिसर्गः शतपुत्रता मम त्वयैव दत्तो ह्रियते च मे पतिः । वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं तवैव सत्यं वचनं भविष्यति ॥ ५४ ॥
आपने ही मुझे सौ पुत्र होनेका वर दिया है और आप ही मेरे पतिको अन्यत्र लिये जा रहे हैं; अतः मैं वही वर माँगती हूँ कि ये सत्यवान् जीवित हो जायँ, इससे आपका ही वचन सत्य होगा ॥ ५४ ॥
मार्कण्डेय उवाच
तथेत्युक्त्वा तु तं पाश मुक्त्वा वैवस्वतो यमः । धर्मराजः प्रहृष्टात्मा सावित्रीमिदमब्रवीत् ॥ ५५ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर 'तथास्तु' कहकर सूर्यपुत्र धर्मराज यमने सत्यवान्का बन्धन खोल दिया और प्रसन्नचित्त होकर सावित्रीसे इस प्रकार कहा—
एष भद्रे मया मुक्तो भर्ता ते कुलनन्दिनि । (तोषिताेऽहं त्वया साध्वि वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः ।) अरोगस्तव नेयश्च सिद्धार्थः स भविष्यति ॥ ५६ ॥