भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1998, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1998

'भद्रे! यह ले, मैंने तेरे पतिको छोड़ दिया। कुलनन्दिनी! तूने अपने धर्मार्थयुक्त वचनोंद्वारा मुझे पूर्ण संतुष्ट कर दिया है। साध्वी! यह सत्यवान् नीरोग, सफल-मनोरथ तथा तेरे द्वारा ले जानेयोग्य हो गया ।। ५६ ।।

चतुर्वर्षशतायुश्च त्वया सार्धमवाप्स्यति ।
इष्ट्वा यज्ञैश्च धर्मेण ख्यातिं लोके गमिष्यति ।। ५७ ।।

'यह तेरे साथ रहकर चार सौ वर्षोंकी आयु प्राप्त करेगा। यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करके यह अपने धर्माचरणके द्वारा सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात होगा ।। ५७ ।।

त्वयि पुत्रशतं चैव सत्यवान् जनयिष्यति ।
ते चापि सर्वे राजानः क्षत्रियाः पुत्रपौत्रिणः ।। ५८ ।।

'सत्यवान् तेरे गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न करेगा और वे सभी राजकुमार राजा होनेके साथ ही पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न होंगे ।। ५८ ।।

ख्यातास्त्वन्नामधेयाश्च भविष्यन्तीह शाश्वताः ।
पितुश्च ते पुत्रशतं भविता तव मातरि ।। ५९ ।।

'तेरे ही नामसे उनकी सदा ख्याति होगी अर्थात् वे सावित्र नामसे प्रसिद्ध होंगे। तेरे पिताके भी तेरी माताके ही गर्भसे सौ पुत्र होंगे ।। ५९ ।।

मालव्यां मालवा नाम शाश्वताः पुत्रपौत्रिणः ।
भ्रातरस्ते भविष्यन्ति क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ।। ६० ।।