भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2003, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2003

सत्यवान्ने कहा— प्रिये! मेरे सिरका दर्द दूर हो गया है। मुझे अपने सब अंग स्वस्थ दिखायी देते हैं। अब तुम्हारे कृपाप्रसादसे मैं अपने माता-पितासे मिलना चाहता हूँ॥ ८२ ॥

न कदाचिद् विकालं हि गतपूर्वो मयाऽऽश्रमः ।
अनागतायां सन्ध्यायां माता मे प्ररुणद्धि माम् ॥ ८३ ॥
आजसे पहले कभी भी मैं इतनी देर करके असमयमें अपने आश्रमपर नहीं लौटा हूँ। संध्या होनेसे पहले ही माता मुझे रोक लेती है—आश्रमसे बाहर नहीं जाने देती ॥ ८३ ॥

दिवापि मयि निष्क्रान्ते संतप्येते गुरू मम ।
विचिनोति हि मां तातः सहैवाश्रमवासिभिः ॥ ८४ ॥
दिनमें भी यदि मैं आश्रमसे दूर निकल जाता हूँ तो मेरे माता-पिता व्याकुल हो उठते हैं एवं पिताजी आश्रमवासियोंके साथ मुझे खोजने निकल पड़ते हैं ॥ ८४ ॥

मात्रा पित्रा च सुभृशं दुःखिताभ्यामहं पुरा ।
उपालब्धश्च बहुशश्चिरेणागच्छसीति ह ॥ ८५ ॥
मेरे माता-पिताने अत्यन्त दुःखी होकर पहले कई बार मुझे उलाहना दिया है कि ‘तु देरसे घर लौटता है’ ॥ ८५ ॥

का त्ववस्था तयोरद्य मदर्थमिति चिन्तये ।
तयोरदृश्ये मयि च महत् दुःखं भविष्यति ॥ ८६ ॥
आज मेरे लिये उन दोनोंकी क्या अवस्था हुई होगी? यह सोचकर मुझे बड़ी चिन्ता हो रही है। मुझे न देखनेपर उन दोनोंको महान् दुःख होगा ॥ ८६ ॥

पुरा मामूचतुश्चैव रात्रावस्रायमाणकौ ।
भृशं सुदुःखितौ वृद्धौ बहुशः प्रीतिसंयुतौ ॥ ८७ ॥
पहलेकी बात है, मेरे वृद्ध माता-पिताने अत्यन्त दुःखी हो रातमें आँसू बहाते हुए मुझसे बारंबार प्रेमपूर्वक कहा था— ॥ ८७ ॥

त्वया हीनौ न जीवाव मुहूर्तमपि पुत्रक ।
यावद् धरिष्यसे पुत्र तावन्नौ जीवितं ध्रुवम् ॥ ८८ ॥
‘बेटा! तुम्हारे बिना हम दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते। वत्स! तुम जबतक जीवित रहोगे, तभीतक हमारा भी जीवन निश्चित है ॥ ८८ ॥

वृद्धयोरन्धयोर्दृष्टिस्त्वयि वंशः प्रतिष्ठितः ।
त्वयि पिण्डश्च कीर्तिश्च संतानं चावयोरिति ॥ ८९ ॥
‘हम दोनों बूढ़े और अंधे हैं। तुम्हीं हमारी दृष्टि हो तथा तुम्हींपर हमारा वंश प्रतिष्ठित है। हम दोनोंका पिण्ड, कीर्ति और कुलपरम्परा सब कुछ तुमपर ही अवलम्बित है’ ॥ ८९ ॥

माता वृद्धा पिता वृद्धस्तयोर्यष्टिरहं किल ।
तौ रात्रौ मामपश्यन्तौ कामवस्थां गमिष्यतः ॥ ९० ॥