भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2004, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2004

मेरी माता बूढ़ी है। पिता भी वृद्ध हैं, केवल मैं ही उन दोनोंके लिये लाठीका सहारा हूँ। वे दोनों रातमें मुझे न देखकर पता नहीं किस दशाको पहुँच जायँगे? ।। ९० ।। निद्रायाश्चाभ्यसूयामि यस्या हेतोः पिता मम । माता च संशयं प्राप्ता मत्कृतेऽनपकारिणी ।। ९१ ।। मैं अपनी इस नींदको कोसता हूँ, जिसके कारण मेरे पिता तथा कभी मेरा अपकार न करनेवाली मेरी माताका जीवन संशयमें पड़ गया है ।। ९१ ।। अहं च संशयं प्राप्तः कृच्छ्रामापदमास्थितः । मातापितृभ्यां हि विना नाहं जीवितुमुत्सहे ।। ९२ ।। मैं भी कठिन विपत्तिमें फँसकर प्राण-संशयकी दशामें आ पहुँचा हूँ। माता-पिताके बिना तो मैं कदापि जीवित नहीं रह सकता ।। ९२ ।। व्यक्तमाकुलया बुद्ध्या प्रज्ञाचक्षुः पिता मम । एकैकमस्यां वेलायां पृच्छत्याश्रमवासिनम् ।। ९३ ।। निश्चय ही इस समय मेरे प्रज्ञाचक्षु (अंधे) पिता व्याकुल हृदयसे एक-एक आश्रमवासीके पास जाकर मेरे विषयमें पूछ रहे होंगे ।। ९३ ।। नात्मानमनुशोचामि यथाहं पितरं शुभे । भर्तारं चाप्यनुगतां मातरं परिदुर्बलाम् ।। ९४ ।। शुभे! मुझे अपने लिये उतना शोक नहीं है, जितना कि पिताके लिये और उन्हींका अनुसरण करनेवाली दुबली-पतली माताके लिये है ।। ९४ ।। मत्कृतेन हि तावद्य सन्तापं परमेष्यतः । जीवन्तावनुजीवामि भर्तव्यौ तौ मयेति ह ।। ९५ ।। तयोः प्रियं मे कर्तव्यमिति जानामि चाप्यहम् । मेरे कारण आज मेरे माता-पिता बहुत संतप्त होंगे। उन्हें जीवित देखकर ही मैं जी रहा हूँ। मुझे उन दोनोंका भरण-पोषण करना चाहिये। मैं यह भी जानता हूँ कि माता-पिताका प्रिय करना ही मेरा कर्तव्य है ।। ९५ ½ ।।

मार्कण्डेय उवाच

एवमुक्त्वा स धर्मात्मा गुरुभक्तो गुरुप्रियः ।। ९६ ।। उच्छ्रित्य बाहू दुःखार्तः सुस्वरं प्ररुरोद ह । **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! यों कहकर धर्मात्मा, गुरुभक्त एवं गुरुजनोंके प्रिय सत्यवान् दोनों बाँहें ऊपर उठाकर दुःखसे आतुर हो फूट-फूटकर रोने लगे ।। ९६ ½ ।। ततोऽब्रवीत् तथा दृष्ट्वा भर्तारं शोककर्शितम् ।। ९७ ।। प्रमृज्याश्रूणि नेत्राभ्यां सावित्री धर्मचारिणी । यदि मेऽस्ति तपस्तप्तं यदि दत्तं हुतं यदि ।। ९८ ।।