महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2006, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्यवान्ने भी उठकर एक हाथसे अपने सभी अंग पोंछे और चारों ओर देखकर फलोंकी टोकरीपर दृष्टि डाली ॥ १०४ ॥
तमुवाचाथ सावित्री श्वः फलानि हरिष्यसि ।
योगक्षेमार्थमेतं ते नेष्यामि परशुं त्वहम् ॥ १०५ ॥
तब सावित्रीने उनसे कहा—'कल सबेरे फलोंको ले चलियेगा। इस समय आपके योग-क्षेमके लिये इस कुल्हाड़ीको मैं साथ ले चलूँगी' ॥ १०५ ॥
कृत्वा कठिनभारं सा वृक्षशाखावलम्बिनम् ।
गृहीत्वा परशुं भर्तुः सकाशे पुनरागमत् ॥ १०६ ॥
फिर उसने टोकरीके बोझको पेड़की डालमें लटका दिया और कुल्हाड़ी लेकर वह पुनः पतिके पास आ गयी ॥ १०६ ॥
वामे स्कन्धे तु वामोरूर्भर्तुर्बाहुं निवेश्य च ।
दक्षिणेन परिष्वज्य जगाम गजगामिनी ॥ १०७ ॥
कमनीय ऊरुओंसे सुशोभित तथा हाथीके समान मन्द गतिसे चलनेवाली सावित्रीने पतिकी दाहिनी भुजाको अपने बायें कंधेपर रखकर दाहिने हाथसे उन्हें अपने पार्श्वभागमें सटा लिया और धीरे-धीरे चलने लगी ॥ १०७ ॥
सत्यवानुवाच