महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2007, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभ्यासगमनाद् भीरु पन्थानो विदिता मम ।
वृक्षान्तरालोकितया ज्योत्स्नया चापि लक्षये ।। १०८ ।।
**उस समय सत्यवान्ने कहा—**भीरु! बार-बार आने-जानेसे यहाँके सभी मार्ग मेरे परिचित हैं। वृक्षोंके भीतरसे दिखायी देनेवाली चाँदनीसे भी मैं रास्तोंकी पहचान कर लेता हूँ ।। १०८ ।।
आगतौ स्वः पथा येन फलान्यवचितानि च ।
यथागतं शुभे गच्छ पन्थानं मा विचारय ।। १०९ ।।
यह वही मार्ग है जिससे हम दोनों आये थे और हमने फल चुने थे। शुभे! तुम जैसे आयी हो वैसे चली चलो। रास्तेका विचार न करो ।। १०९ ।।
पलाशखण्डे चैतस्मिन् पन्था व्यावर्तते द्विधा ।
तस्योत्तरेण यः पन्थास्तेन गच्छ त्वरस्व च ।। ११० ।।
स्वस्थोऽस्मि बलवानस्मि दिदृक्षुः पितरावुभौ ।
पलाश-वृक्षोंके इस वनप्रदेशमें यह मार्ग अलग-अलग दो दिशाओंकी ओर मुड़ जाता है। इन दोनोंमेंसे जो मार्ग उत्तरकी ओरसे जाता है, उसीसे चलो और शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाओ। अब मैं स्वस्थ हूँ, बलवान् हूँ और अपने माता तथा पिता दोनोंको देखनेके लिये उत्सुक हूँ ।। ११० १/२ ।।
मार्कण्डेय उवाच
ब्रुवन्नेवं त्वरायुक्तः सम्प्रायादाश्रमं प्रति ।। १११ ।।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**ऐसा कहते हुए सत्यवान् बड़ी उतावलीके साथ आश्रमकी ओर चलने लगे ।। १११ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने
सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २९७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-
उपाख्यानविषयक दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २९७ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ११२ श्लोक हैं)