महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमैं समझता हूँ कि मैं वेदनासे व्याकुल होकर देरतक सोता रह गया। उतने समयतक मैं उसके पहले कभी नहीं सोया था ।। ३१ ।। सर्वेषामेव भवतां संतापो मा भवेदिति । अतो विरात्रागमनं नान्यदस्तीह कारणम् ।। ३२ ।। नींद खुलनेपर मैं इतनी रातके बाद भी इसलिये चला आया कि आप सब लोगोंको मेरे लिये चिन्तित न होना पड़े। इस विलम्बमें और कोई कारण नहीं है ।। ३२ ।।
गौतम उवाच
अकस्माच्चक्षुषः प्राप्तिर्द्युमत्सेनस्य ते पितुः । नास्य त्वं कारणं वेत्सि सावित्री वक्तुमर्हति ।। ३३ ।। गौतम बोले—तुम्हारे पिता द्युमत्सेनको जो सहसा नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम नहीं जानते। सम्भवतः सावित्री बतला सकती है ।। ३३ ।। श्रोतुमिच्छामि सावित्रि त्वं हि वेत्थ परावरम् । त्वां हि जानामि सावित्रि सावित्रीमिव तेजसा ।। ३४ ।। त्वमत्र हेतुं जानीषे तस्मात् सत्यं निरूच्यताम् । रहस्यं यदि ते नास्ति किंचिदत्र वदस्व नः ।। ३५ ।। सावित्री! मैं इसका रहस्य तुमसे सुनना चाहता हूँ; क्योंकि तुम भूत और भविष्य सब कुछ जानती हो। मैं तुम्हें साक्षात् सावित्रीदेवीके समान तेजस्विनी जानता हूँ। राजाको जो सहसा नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम जानती हो। सच-सच बताओ, यदि इसमें कुछ छिपानेकी बात न हो तो हमसे अवश्य कहो ।। ३४-३५ ।।
सावित्र्युवाच
एवमेतद् यथा वेत्थ संकल्पो नान्यथा हि वः । न हि किंचिद् रहस्यं मे श्रूयतां तथ्यमेव यत् ।। ३६ ।। सावित्री बोली—मुनीश्वरो! आपलोग जैसा समझते हैं, ठीक है। आपलोगोंका संकल्प अन्यथा नहीं हो सकता। मेरे लिये कोई छिपानेकी बात नहीं है। मैं सब घटनाएँ ठीक-ठीक बताती हूँ, सुनिये ।। ३६ ।। मृत्युर्मे पत्युराख्यातो नारदेन महात्मना । स चाद्य दिवसः प्राप्तस्ततो नैनं जहाम्यहम् ।। ३७ ।। महात्मा नारदजीने मुझसे मेरे पतिकी मृत्युका हाल बताया था। वह मृत्युदिवस आज ही आया था; इसलिये मैं इन्हें अकेला नहीं छोड़ती थी ।। ३७ ।। सुप्तं चैनं यमः साक्षादुपागच्छत् सकिङ्करः । स एनमनयद् बद्ध्वा दिशं पितृनिषेविताम् ।। ३८ ।।