महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2014, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब ये सिरके दर्दसे व्याकुल होकर सो गये, उस समय साक्षात् भगवान् यमराज अपने सेवकके साथ पधारे। वे इन्हें बाँधकर दक्षिण दिशाकी ओर ले चले॥ ३८॥ अस्तौषं तमहं देवं सत्येन वचसा विभुम्। पञ्च वै तेन मे दत्ता वराः शृणुत तान् मम॥ ३९॥ उस समय मैंने सत्यवचनोंद्वारा उन भगवान् यमकी स्तुति की। तब उन्होंने मुझे पाँच वर दिये। उन वरोंको आप मुझसे सुनिये॥ ३९॥ चक्षुषी च स्वराज्यं च द्वौ वरौ श्वशुरस्य मे। लब्धं पितुः पुत्रशतं पुत्राणां चात्मनः शतम्॥ ४०॥ नेत्र तथा अपने राज्यकी प्राप्ति—ये दो वर मेरे श्वशुरके लिये प्राप्त हुए हैं। इसके सिवा मैंने अपने पिताके लिये सौ पुत्र तथा अपने लिये भी सौ पुत्र होनेके दो वर और पाये हैं॥ ४०॥ चतुर्वर्षशतायुर्मे भर्ता लब्धश्च सत्यवान्। भर्तुर्हि जीवितार्थं तु मया चीर्णं त्विदं व्रतम्॥ ४१॥ पाँचवें वरके रूपमें मुझे मेरे पति सत्यवान् चार सौ वर्षोंकी आयु लेकर प्राप्त हुए हैं। पतिके जीवनकी रक्षाके लिये ही मैंने यह व्रत किया था॥ ४१॥ एतत् सर्वं मयाऽऽख्यातं कारणं विस्तरेण वः। यथावृत्तं सुखोदर्कमिदं दुःखं महन्मम॥ ४२॥ इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे विलम्बसे आनेका कारण और उसका यथावत् वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है। मुझे जो यह महान् दुःख उठाना पड़ा है उसका अन्तिम फल सुख ही हुआ है॥ ४२॥
ऋषय ऊचुः निमज्जमानं व्यसनैरभिद्रुतं कुलं नरेन्द्रस्य तमोमये ह्रदे। त्वया सुशीलव्रतपुण्यया कुलं समुद्धृतं साध्वि पुनः कुलीनया॥ ४३॥ ऋषि बोले—पतिव्रते! राजा द्युमत्सेनका कुल भाँति-भाँतिकी विपत्तियोंसे ग्रस्त होकर दुःखके अंधकारमय गढ़ेमें डूबा जा रहा था; परंतु तुझ-जैसी सुशीला, व्रतपरायणा और पवित्र आचरणवाली कुलीन वधूने आकर इसका उद्धार कर दिया॥ ४३॥
मार्कण्डेय उवाच तथा प्रशस्य ह्यभिपूज्य चैव वरस्त्रियं तामृषयः समागताः। नरेन्द्रमामन्त्र्य सपुत्रमञ्जसा