महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसके बाद राजाने आश्रममें रहनेवाले उन वृद्ध ब्राह्मणोंका अभिवादन किया और उन सबसे समादृत हो वे अपनी राजधानीकी ओर चले ॥ ९ ॥ शैब्या च सह सावित्र्या स्वास्तीर्णेन सुवर्चसा । नरयुक्तेन यानेन प्रययौ सेनया वृता ॥ १० ॥ शैब्या भी अपनी बहू सावित्रीके साथ सुन्दर बिछावनसे युक्त तेजस्वी शिबिकापर, जिसे कई कहार ढो रहे थे, आरूढ़ हो सेनासे घिरी हुई चल दी ॥ १० ॥ ततोऽभिषिषिचुः प्रीत्या द्युमत्सेनं पुरोहिताः । पुत्रं चास्य महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयन् ॥ ११ ॥ वहाँ पहुँचनेपर पुरोहितोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ द्युमत्सेनका राज्याभिषेक किया। साथ ही उनके महामना पुत्र सत्यवान्को भी युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ११ ॥ ततः कालेन महता सावित्र्याः कीर्तिवर्धनम् । तद् वै पुत्रशतं जज्ञे शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ १२ ॥ तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् सावित्रीके गर्भसे उसकी कीर्ति बढ़ानेवाले सौ पुत्र उत्पन्न हुए। वे सब-के-सब शूरवीर तथा संग्राममें कभी पीछे न हटनेवाले थे ॥ १२ ॥ भ्रातॄणां सोदराणां च तथैवास्याभवच्छतम् । मद्राधिपस्याश्वपतेर्मालव्यां सुमहद् बलम् ॥ १३ ॥ इसी प्रकार मद्राज अश्वपतिके भी मालवीके गर्भसे सावित्रीके सौ सहोदर भाई उत्पन्न हुए, जो अत्यन्त बलशाली थे ॥ १३ ॥ एवमात्मा पिता माता श्वश्रूः श्वशुर एव च । भर्तुः कुलं च सावित्र्या सर्वं कृच्छ्रात् समुद्धृतम् ॥ १४ ॥ इस तरह सावित्रीने अपने आपको, पिता-माताको, सास-ससुरको तथा पतिके समस्त कुलको भी भारी संकटसे बचा लिया था ॥ १४ ॥ तथैवैषा हि कल्याणी द्रौपदी शीलसम्मता । तारयिष्यति वः सर्वान् सावित्रीव कुलाङ्गना ॥ १५ ॥ सावित्रीकी ही भाँति यह कल्याणमयी उत्तम कुलवाली सुशीला द्रौपदी तुम सब लोगोंका महान् संकटसे उद्धार करेगी ॥ १५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स पाण्डवस्तेन अनुनीतो महात्मना । विशोको विज्वरो राजन् काम्यके न्यवसत् तदा ॥ १६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार उन महात्मा मार्कण्डेयजीके समझाने-बुझाने और आश्वासन देनेपर उस समय पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिर शोक तथा चिन्तासे रहित हो काम्यकवनमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १६ ॥