महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2017, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनेन निश्चयेनेह वयं प्रस्थापिता नृप । प्राप्तानीमानि यानानि चतुरङ्गं च ते बलम् ॥ ६ ॥ ‘नरेश्वर! ऐसा निश्चय करके ही हमें यहाँ भेजा गया है। ये सवारियाँ प्रस्तुत हैं और आपकी चतुरंगिणी सेना भी सेवामें उपस्थित है’ ॥ ६ ॥ प्रयाहि राजन् भद्रं ते घुष्टस्ते नगरे जयः । अध्यास्स्व चिररात्राय पितृपैतामहं पदम् ॥ ७ ॥ ‘राजन्! आपका कल्याण हो। अब अपने राज्यमें पधारिये। नगरमें आपकी विजय घोषित कर दी गयी है। आप दीर्घकालतक अपने बाप-दादोंके राज्यपर प्रतिष्ठित रहें’ ॥ ७ ॥ चक्षुष्मन्तं च तं दृष्ट्वा राजानं वपुषान्वितम् । मूर्ध्ना निपतिताः सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् राजा द्युमत्सेनको नेत्रयुक्त और स्वस्थ शरीरसे सुशोभित देखकर उन सबके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और सबने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ८ ॥ ततोऽभिवाद्य तान् वृद्धान् द्विजानाश्रमवासिनः । तैश्चाभिपूजितः सर्वैः प्रययौ नगरं प्रति ॥ ९ ॥