महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अनेन निश्चयेनेह वयं प्रस्थापिता नृप । प्राप्तानीमानि यानानि चतुरङ्गं च ते बलम् ॥ ६ ॥ ‘नरेश्वर! ऐसा निश्चय करके ही हमें यहाँ भेजा गया है। ये सवारियाँ प्रस्तुत हैं और आपकी चतुरंगिणी सेना भी सेवामें उपस्थित है’ ॥ ६ ॥ प्रयाहि राजन् भद्रं ते घुष्टस्ते नगरे जयः । अध्यास्स्व चिररात्राय पितृपैतामहं पदम् ॥ ७ ॥ ‘राजन्! आपका कल्याण हो। अब अपने राज्यमें पधारिये। नगरमें आपकी विजय घोषित कर दी गयी है। आप दीर्घकालतक अपने बाप-दादोंके राज्यपर प्रतिष्ठित रहें’ ॥ ७ ॥ चक्षुष्मन्तं च तं दृष्ट्वा राजानं वपुषान्वितम् । मूर्ध्ना निपतिताः सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् राजा द्युमत्सेनको नेत्रयुक्त और स्वस्थ शरीरसे सुशोभित देखकर उन सबके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और सबने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ८ ॥ ततोऽभिवाद्य तान् वृद्धान् द्विजानाश्रमवासिनः । तैश्चाभिपूजितः सर्वैः प्रययौ नगरं प्रति ॥ ९ ॥
इसके बाद राजाने आश्रममें रहनेवाले उन वृद्ध ब्राह्मणोंका अभिवादन किया और उन सबसे समादृत हो वे अपनी राजधानीकी ओर चले ॥ ९ ॥ शैब्या च सह सावित्र्या स्वास्तीर्णेन सुवर्चसा । नरयुक्तेन यानेन प्रययौ सेनया वृता ॥ १० ॥ शैब्या भी अपनी बहू सावित्रीके साथ सुन्दर बिछावनसे युक्त तेजस्वी शिबिकापर, जिसे कई कहार ढो रहे थे, आरूढ़ हो सेनासे घिरी हुई चल दी ॥ १० ॥ ततोऽभिषिषिचुः प्रीत्या द्युमत्सेनं पुरोहिताः । पुत्रं चास्य महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयन् ॥ ११ ॥ वहाँ पहुँचनेपर पुरोहितोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ द्युमत्सेनका राज्याभिषेक किया। साथ ही उनके महामना पुत्र सत्यवान्को भी युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ११ ॥ ततः कालेन महता सावित्र्याः कीर्तिवर्धनम् । तद् वै पुत्रशतं जज्ञे शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ १२ ॥ तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् सावित्रीके गर्भसे उसकी कीर्ति बढ़ानेवाले सौ पुत्र उत्पन्न हुए। वे सब-के-सब शूरवीर तथा संग्राममें कभी पीछे न हटनेवाले थे ॥ १२ ॥ भ्रातॄणां सोदराणां च तथैवास्याभवच्छतम् । मद्राधिपस्याश्वपतेर्मालव्यां सुमहद् बलम् ॥ १३ ॥ इसी प्रकार मद्राज अश्वपतिके भी मालवीके गर्भसे सावित्रीके सौ सहोदर भाई उत्पन्न हुए, जो अत्यन्त बलशाली थे ॥ १३ ॥ एवमात्मा पिता माता श्वश्रूः श्वशुर एव च । भर्तुः कुलं च सावित्र्या सर्वं कृच्छ्रात् समुद्धृतम् ॥ १४ ॥ इस तरह सावित्रीने अपने आपको, पिता-माताको, सास-ससुरको तथा पतिके समस्त कुलको भी भारी संकटसे बचा लिया था ॥ १४ ॥ तथैवैषा हि कल्याणी द्रौपदी शीलसम्मता । तारयिष्यति वः सर्वान् सावित्रीव कुलाङ्गना ॥ १५ ॥ सावित्रीकी ही भाँति यह कल्याणमयी उत्तम कुलवाली सुशीला द्रौपदी तुम सब लोगोंका महान् संकटसे उद्धार करेगी ॥ १५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स पाण्डवस्तेन अनुनीतो महात्मना । विशोको विज्वरो राजन् काम्यके न्यवसत् तदा ॥ १६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार उन महात्मा मार्कण्डेयजीके समझाने-बुझाने और आश्वासन देनेपर उस समय पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिर शोक तथा चिन्तासे रहित हो काम्यकवनमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १६ ॥
यश्चेदं शृणुयाद् भक्त्या सावित्र्याख्यानमुत्तमम् । स सुखी सर्वसिद्धार्थो न दुःखं प्राप्नुयान्नरः ॥ १७ ॥ जो इस परम उत्तम सावित्री-उपाख्यानको भक्तिभावसे सुनेगा, वह मनुष्य सदा अपने समस्त मनोरथोंके सिद्ध होनेसे सुखी होगा और कभी दुःख नहीं पायेगा ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-उपाख्यानविषयक दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९९ ॥
(कुण्डलाहरणपर्व)
(कुण्डलाहरणपर्व)
त्रिशततमोऽध्यायः
सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना
जनमेजय उवाच
यत् तत् तदा महद् बह्वाँल्लोमशो वाक्यमब्रवीत् ।
इन्द्रस्य वचनादेव पाण्डुपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ १ ॥
यच्चापि ते भयं तीव्रं न च कीर्तयसे क्वचित् ।
तच्चाप्यपहरिष्यामि धनंजय इतो गते ॥ २ ॥
किं नु तज्जपतां श्रेष्ठ कर्णं प्रति महत् भयम् ।
आसीन्न च स धर्मात्मा कथयामास कस्यचित् ॥ ३ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! लोमशजीने इन्द्रके कथनानुसार उस समय पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे जो यह महत्वपूर्ण वचन कहा था कि 'तुम्हें जो बड़ा भारी भय लगा रहता है और जिसकी तुम किसीके सामने चर्चा भी नहीं करते, उसे भी मैं अर्जुनके यहाँ (स्वर्ग)-से चले जानेपर दूर कर दूँगा।' जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वैशम्पायनजी! धर्मात्मा महाराज युधिष्ठिरको कर्णसे वह कौन-सा भारी भय था, जिसकी वे किसीके सम्मुख बात भी नहीं चलाते थे ॥ १—३ ॥
वैशम्पायन उवाच
अहं ते राजशार्दूल कथयामि कथामिमाम् ।
पृच्छतो भरतश्रेष्ठ शुश्रूषस्व गिरं मम ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— नृपश्रेष्ठ! भरतकुलभूषण! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं यह कथा सुनाऊँगा। तुम ध्यान देकर मेरी बात सुनो ॥ ४ ॥
द्वादशे समतिक्रान्ते वर्षे प्राप्ते त्रयोदशे ।
पाण्डूनां हितकृच्छक्रः कर्णं भिक्षितुमुद्यतः ॥ ५ ॥
जब पाण्डवोंके वनवासके बारह वर्ष बीत गये और तेरहवाँ वर्ष आस्मभ हुआ, तब पाण्डवोंके हितकारी इन्द्र कर्णसे कवच-कुण्डल माँगनेको उद्यत हुए ॥ ५ ॥
अभिप्रायमथो ज्ञात्वा महेन्द्रस्य विभावसुः ।
कुण्डलार्थे महाराज सूर्यः कर्णमुपागतः ॥ ६ ॥
महाराज! कुण्डलके विषयमें देवराज इन्द्रका मनोभाव जानकर भगवान् सूर्य कर्णके पास गये ॥ ६ ॥
महार्हे शयने वीरं स्पर्द्ध्यास्तरणसंवृते ।
शयानमतिविश्वस्तं ब्रह्मण्यं सत्यवादिनम् ॥ ७ ॥
ब्राह्मणभक्त और सत्यवादी वीर कर्ण अत्यन्त निश्चिन्त होकर एक सुन्दर बिछौनेवाली बहुमूल्य शय्यापर सोया था ॥ ७ ॥
स्वप्रान्ते निशि राजेन्द्र दर्शयामास रश्मिवान् ।
कृपया परयाऽऽविष्टः पुत्रस्नेहाच्च भारत ॥ ८ ॥
राजेन्द्र! भरतनन्दन! अंशुमाली भगवान् सूर्यने पुत्रस्नेहवश अत्यन्त दयाभावसे युक्त हो रातको सपनेमें कर्णको दर्शन दिया ॥ ८ ॥
ब्राह्मणो वेदविद् भूत्वा सूर्यो योगर्द्धिरूपवान् ।
हितार्थमब्रवीत् कर्णं सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥ ९ ॥
उस समय उन्होंने वेदवेत्ता ब्राह्मणका रूप धारण कर रखा था। उनका स्वरूप योग-समृद्धिसे सम्पन्न था। उन्होंने कर्णके हितके लिये उसे समझाते हुए इस प्रकार कहा — ॥ ९ ॥
कर्ण मद्वचनं तात शृणु सत्यभृतां वर । ब्रुवतोऽद्य महाबाहो सौहृदात् परमं हितम् ॥ १० ॥ ‘सत्यधारियोंमें श्रेष्ठ तात कर्ण! मेरी बात सुनो। महाबाहो! मैं सौहार्दवश आज तुम्हारे परम हितकी बात कहता हूँ ॥ १० ॥
उपायास्यति शक्रस्त्वां पाण्डवानां हितेप्सया । ब्राह्मणच्छद्मना कर्ण कुण्डलापजिहीर्षया ॥ ११ ॥ ‘कर्ण! देवराज इन्द्र पाण्डवोंके हितकी इच्छासे तुम्हारे दोनों कुण्डल (और कवच) लेनेके लिये ब्राह्मणका छद्मवेष धारण करके तुम्हारे पास आयेंगे ॥ ११ ॥
विदितं तेन शीलं ते सर्वस्य जगतस्तथा । यथा त्वं भिक्षितः सद्भिर्ददास्येव न याचसे ॥ १२ ॥ ‘तुम्हारी दानशीलताका उन्हें ज्ञान है तथा सम्पूर्ण जगत्को तुम्हारे इस नियमका पता है कि किसी सत्पुरुषके माँगनेपर तुम उसकी अभीष्ट वस्तु देते ही हो, उससे कुछ माँगते नहीं हो ॥ १२ ॥
त्वं हि तात ददास्येव ब्राह्मणेभ्यः प्रयाचितम् । वित्तं यच्चान्यदप्याहुर्न प्रत्याख्यासि कस्यचित् ॥ १३ ॥
‘तात! तुम ब्राह्मणोंको उनकी माँगी हुई वस्तु दे ही देते हो; साथ ही धन तथा और जो कुछ भी वे माँग लें, सब दे डालते हो। किसीको ‘नहीं’ कहकर निराश नहीं लौटाते ॥ १३ ॥
त्वां तु चैवंविधं ज्ञात्वा स्वयं वै पाकशासनः ।
आगन्ता कुण्डलार्थाय कवचं चैव भिक्षितुम् ॥ १४ ॥
‘तुम्हारे ऐसे स्वभावको जानकर साक्षात् इन्द्र तुमसे तुम्हारे कवच और कुण्डल माँगनेके लिये आनेवाले हैं ॥ १४ ॥
तस्मै प्रयाचमानाय न देये कुण्डले त्वया ।
अनुनेयः परं शक्त्या श्रेय एतद्धि ते परम् ॥ १५ ॥
‘उनके माँगनेपर तुम उन्हें अपने दोनों कुण्डल दे न देना। यथाशक्ति अनुनय-विनय करके उन्हें समझा देना; इससे तुम्हारा परम मंगल होगा ॥ १५ ॥
कुण्डलार्थे ब्रुवंस्तात कारणैर्बहुभिस्त्वया ।
अन्यैर्बहुविधैर्वित्तैः सन्निवार्यः पुनः पुनः ॥ १६ ॥
‘इस प्रकार वे जब-जब कुण्डलके लिये बात करें तब-तब बहुत-से कारण बताकर तथा दूसरे नाना प्रकारके धन आदि देनेकी बात कहकर बार-बार उन्हें कुण्डल माँगनेसे मना करना ॥ १६ ॥
रत्नैः स्त्रीभिस्तथा गोभिर्धनैर्बहुविधैरपि ।
निदर्शनैश्च बहुभिः कुण्डलेप्सुः पुरन्दरः ॥ १७ ॥
‘नाना प्रकारके रत्न, स्त्री, गौ, भाँति-भाँतिके धन देकर तथा बहुत-से दृष्टान्तोंद्वारा बहलाकर कुण्डलार्थी इन्द्रको टालनेका प्रयत्न करना ॥ १७ ॥
यदि दास्यसि कर्ण त्वं सहजे कुण्डले शुभे ।
आयुषः प्रक्षयं गत्वा मृत्योर्वशमुपैष्यसि ॥ १८ ॥
‘कर्ण! यदि तुम अपने जन्मके साथ ही उत्पन्न हुए ये सुन्दर कुण्डल इन्द्रको दे दोगे तो तुम्हारी आयु क्षीण हो जायगी और तुम मृत्युके अधीन हो जाओगे ॥ १८ ॥
कवचेन समायुक्तः कुण्डलाभ्यां च मानद ।
अवध्यस्त्वं रणेऽरीणामिति विद्धि वचो मम ॥ १९ ॥
‘मानद! तुम अपने कवच और कुण्डलोंसे संयुक्त होनेपर रणमें शत्रुओंके लिये भी अवध्य बने रहोगे, मेरी इस बातको समझ लो ॥ १९ ॥
अमृतादुत्थितं ह्येतदुभयं रत्नसम्भवम् ।
तस्माद् रक्ष्यं त्वया कर्ण जीवितं चेत् प्रियं तव ॥ २० ॥
‘कर्ण! ये दोनों रत्नमय कवच और कुण्डल अमृतसे उत्पन्न हुए हैं; अतः यदि तुम्हें अपना जीवन प्रिय हो तो इन दोनों वस्तुओंकी रक्षा अवश्य करना’ ॥ २० ॥
कर्ण उवाच
को मामेवं भवान् प्राह दर्शयन् सौहृदं परम् । कामया भगवन् ब्रूहि को भवान् द्विजवेषधृक् ॥ २१ ॥ कर्णने पूछा—भगवन्! आप मेरे प्रति अत्यन्त स्नेह दिखाते हुए जो इस प्रकार हितकर सलाह दे रहे हैं इससे मैं जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं? यदि इच्छा हो, तो बताइये। इस प्रकार ब्राह्मणवेष धारण करनेवाले आप कौन हैं? ॥ २१ ॥
ब्राह्मण उवाच
अहं तात सहस्रांशुः सौहृदात् त्वां निदर्शये । कुरुष्वैतद् वचो मे त्वमेतच्छ्रेयः परं हि ते ॥ २२ ॥ ब्राह्मणने कहा—तात! मैं सहस्रांशु सूर्य हूँ। स्नेहवश ही तुम्हें दर्शन देकर सामयिक कर्तव्य सुझा रहा हूँ। तुम मेरा कहना मान लो। इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा ॥ २२ ॥
कर्ण उवाच
श्रेय एव ममात्यन्तं यस्य मे गोपतिः प्रभुः । प्रवक्ताद्य हितान्वेषी शृणु चेदं वचो मम ॥ २३ ॥ कर्णने कहा—जिसके हितका अनुसंधान साक्षात् भगवान् सूर्य करते और हितकी बात बताते हैं, उस कर्णका तो परम कल्याण है ही। भगवन्! आप मेरी यह बात सुनें ॥ २३ ॥
प्रसादये त्वां वरदं प्रणयाच्च ब्रवीम्यहम् । न निवार्यो व्रतादस्मादहं यद्यस्मि ते प्रियः ॥ २४ ॥ प्रभो! आप वरदायक देवता हैं। मैं आपसे प्रसन्न रहनेका अनुरोध करता हूँ और प्रेमपूर्वक यह कहता हूँ कि यदि मैं आपका प्रिय हूँ तो आप मुझे इस व्रतसे विचलित न करें ॥ २४ ॥
व्रतं वै मम लोकोऽयं वेत्ति कृत्स्नं विभावसो । यथाहं द्विजमुख्येभ्यो दद्यां प्राणानपि ध्रुवम् ॥ २५ ॥ सूर्यदेव! संसारमें सब लोग मेरे इस व्रतके विषयमें पूर्णरूपसे जानते हैं कि मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके याचना करनेपर उन्हें निश्चय ही अपने प्राण भी दे सकता हूँ ॥ २५ ॥
यद्यागच्छति मां शक्रो ब्राह्मणच्छद्मना वृतः । हितार्थं पाण्डुपुत्राणां खेचरोत्तम भिक्षितुम् ॥ २६ ॥ दास्यामि विबुधश्रेष्ठ कुण्डले वर्म चोत्तमम् । न मे कीर्तिः प्रणश्येत त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ २७ ॥ आकाशमें विचरनेवालोंमें उत्तम सूर्यदेव! यदि पाण्डवोंके हितके लिये ब्राह्मणके छद्मवेशमें अपनेको छिपाकर साक्षात् इन्द्रदेव मेरे पास भिक्षा माँगने आ रहे हैं तो देवेश्वर! मैं
उन्हें दोनों कुण्डल और उत्तम कवच अवश्य दे दूँगा, जिससे तीनों लोकोंमें विख्यात हुई मेरी कीर्ति नष्ट न होने पाये ।। २६-२७ ।। मद्विधस्य यशस्यं हि न युक्तं प्राणरक्षणम् । युक्तं हि यशसा युक्तं मरणं लोकसम्मतम् ।। २८ ।। मेरे-जैसे शूरवीरको प्राण देकर भी यशकी ही रक्षा करनी चाहिये; अपयश लेकर प्राणोंकी रक्षा करनी कदापि उचित नहीं है। सुयशके साथ यदि मृत्यु हो जाय तो वह वीरोचित एवं सम्पूर्ण लोकके लिये सम्मानकी वस्तु है ।। २८ ।। सोऽहमिन्द्राय दास्यामि कुण्डले सह वर्मणा । यदि मां बलवृत्रघ्नो भिक्षार्थमुपयास्यति ।। २९ ।। ऐसी स्थितिमें यदि बलासुर और वृत्रासुरके विनाशक देवराज इन्द्र मेरे पास भिक्षाके लिये पधारेंगे तो मैं कवचसहित दोनों कुण्डल उन्हें अवश्य दे दूँगा ।। २९ ।। हितार्थं पाण्डुपुत्राणां कुण्डले मे प्रयाचितुम् । तन्मे कीर्तिकरं लोके तस्याकीर्तिर्भविष्यति ।। ३० ।। यदि इन्द्र पाण्डवोंके हितके लिये मेरे कुण्डल माँगने आयेंगे तो इससे संसारमें मेरी कीर्ति बढ़ेगी और उनका अपयश होगा ।। ३० ।। वृणोमि कीर्तिं लोके हि जीवितेनापि भानुमन् । कीर्तिमानश्नुते स्वर्गं हीनकीर्तिस्तु नश्यति ।। ३१ ।। अतः सूर्यदेव! मैं जीवन देकर भी जगत्में कीर्तिका ही वरण करूँगा। कीर्तिमान् पुरुष स्वर्गका सुख भोगता है। जिसकी कीर्ति नष्ट हो जाती है, वह स्वयं भी नष्ट ही है ।। ३१ ।। कीर्तिर्हि पुरुषं लोके संजीवयति मातृवत् । अकीर्तिर्जीवितं हन्ति जीवतोऽपि शरीरिणः ।। ३२ ।। कीर्ति इस संसारमें माताकी भाँति मनुष्यको नूतन जीवन प्रदान करती है। परंतु अकीर्ति जीवित पुरुषके भी जीवनको नष्ट कर देती है ।। ३२ ।। अयं पुराणः श्लोको हि स्वयं गीतो विभावसो । धात्रा लोकेश्वर यथा कीर्तिरायुर्नरस्य ह ।। ३३ ।। विभावसो! लोकेश्वर! साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा गाया हुआ यह प्राचीन श्लोक है कि कीर्ति मनुष्यकी आयु है ।। ३३ ।। पुरुषस्य परे लोके कीर्तिरेव परायणम् । इह लोके विशुद्धा च कीर्तिरायुर्विवर्द्धनी ।। ३४ ।। परलोकमें कीर्ति ही पुरुषके लिये सबसे महान् आश्रय है। इस लोकमें भी विशुद्ध कीर्ति आयु बढ़ानेवाली होती है ।। ३४ ।। सोऽहं शरीरजे दत्त्वा कीर्तिं प्राप्स्यामि शाश्वतीम् । दत्त्वा च विधिवद् दानं ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि ।। ३५ ।।
हुत्वा शरीरं संग्रामे कृत्वा कर्म सुदुष्करम् । विजित्य च परानाजौ यशः प्राप्स्यामि केवलम् ॥ ३६ ॥ अतः मैं अपने शरीरके साथ उत्पन्न हुए कवच-कुण्डल इन्द्रको देकर सनातन कीर्ति प्राप्त करूँगा। ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान देकर, अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके समराग्निमें शरीरकी आहुति देकर तथा शत्रुओंको संग्राममें जीतकर मैं केवल सुयशका उपार्जन करूँगा ॥ ३५-३६ ॥ भीतानामभयं दत्त्वा संग्रामे जीवितार्थिनाम् । वृद्धान् बालान् द्विजातींश्च मोक्षयित्वा महाभयात् ॥ ३७ ॥ प्राप्स्यामि परमं लोके यशः स्वर्ग्यमनुत्तमम् । जीवितेनापि मे रक्ष्या कीर्तिस्तद् विद्धि मे व्रतम् ॥ ३८ ॥ संग्राममें भयभीत होकर प्राणोंकी भीख माँगनेवाले सैनिकोंको अभय देकर तथा बालक, वृद्ध और ब्राह्मणोंको महान् भयसे छुड़ाकर संसारमें परम उत्तम स्वर्गीय यशका उपार्जन करूँगा। मुझे प्राण देकर भी अपनी कीर्ति सुरक्षित रखनी है। यही मेरा व्रत समझें ॥ ३७-३८ ॥ सोऽहं दत्त्वा मघवते भिक्षामेतामनुत्तमाम् । ब्राह्मणच्छद्मिने देव लोके गन्ता परां गतिम् ॥ ३९ ॥ इसलिये देव! इस प्रकारके व्रतवाला मैं ब्राह्मण-वेषधारी इन्द्रको यह परम श्रेष्ठ भिक्षा देकर जगत्में उत्तम गति प्राप्त करूँगा ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकर्णसंवादे त्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्यकर्णसंवादविषयक तीन सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०० ॥
३०१-
एकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः
सूर्यका कर्णको समझाते हुए उसे इन्द्रको कुण्डल न देनेका आदेश देना
सूर्य उवाच
माहितं कर्ण कार्षीस्त्वमात्मनः सुहृदां तथा ।
पुत्राणामथ भार्याणामथो मातुरथो पितुः ॥ १ ॥
**सूर्यने कहा—**कर्ण! तुम अपना, अपने सुहृदोंका, पुत्रों और पत्नियोंका तथा माता-पिताका अहित न करो ॥ १ ॥
शरीरस्याविरोधेन प्राणिनां प्राणभृद्वर ।
इष्यते यशसः प्राप्तिः कीर्तिश्च त्रिदिवे स्थिरा ॥ २ ॥
प्राणधारियोंमें श्रेष्ठ वीर! अपने शरीरकी रक्षा करते हुए ही प्राणियोंको इहलोकमें यशकी प्राप्ति तथा स्वर्गमें स्थायी कीर्ति अभीष्ट होती है ॥ २ ॥
यस्त्वं प्राणविरोधेन कीर्तिमिच्छसि शाश्वतीम् ।
सा ते प्राणान् समादाय गमिष्यति न संशयः ॥ ३ ॥
यदि तुम प्राणोंका विरोध (नाश) करके सनातन कीर्ति प्राप्त करना चाहते हो तो इसमें संदेह नहीं कि वह (कीर्ति) तुम्हारे प्राणोंको लेकर ही जायगी ॥ ३ ॥
जीवतां कुरुते कार्यं पिता माता सुतास्तथा ।
ये चान्ये बान्धवाः केचिल्लोकेऽस्मिन् पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
पुरुषरत्न! पिता, माता, पुत्र तथा और जो कोई भी भाई-बन्धु इस लोकमें हैं, वे सब जीवित पुरुषोंसे ही अपने प्रयोजनकी सिद्धि करते हैं ॥ ४ ॥
राजानश्च नरव्याघ्र पौरुषेण निबोध तत् ।
कीर्तिश्च जीवतः साध्वी पुरुषस्य महाद्युते ॥ ५ ॥
महातेजस्वी नरश्रेष्ठ! राजालोग भी जीवित रहनेपर ही पुरुषार्थसे कीर्तिलाभ करते हैं। इस बातको समझो; जीवित पुरुषके लिये ही कीर्ति अच्छी मानी गयी है ॥ ५ ॥
मृतस्य कीर्त्या किं कार्यं भस्मीभूतस्य देहिनः ।
मृतः कीर्तिं न जानीते जीवन् कीर्तिं समश्नुते ॥ ६ ॥
जो मर गया, जिसका शरीर चिताकी आगमें जलकर भस्म हो गया; उसे कीर्तिसे क्या प्रयोजन है? मरा हुआ पुरुष कीर्तिके विषयमें कुछ नहीं जानता। जीवित पुरुष ही कीर्तिजनित सुखका अनुभव करता है ॥ ६ ॥
मृतस्य कीर्तिर्मर्त्यस्य यथा माला गतायुषः ।
अहं तु त्वां ब्रवीम्येतद् भक्तोऽसीति हितेप्सया ॥ ७ ॥ मरे हुए मनुष्यकी कीर्ति मुर्देके गलेमें पड़ी हुई मालाके समान व्यर्थ है। तुम मेरे भक्त हो, इसलिये तुम्हारे हितकी इच्छासे मैं ये सब बातें कहता हूँ ॥ ७ ॥ भक्तिमन्तो हि मे रक्ष्या इत्येतेनापि हेतुना । भक्तोऽयं परया भक्त्या मामित्येव महाभुज । ममापि भक्तिरुत्पन्ना स त्वं कुरु वचो मम ॥ ८ ॥ मुझे अपने भक्तोंकी रक्षा करनी ही चाहिये, इसलिये भी तुमसे तुम्हारे हितकी बात कहता हूँ। महाबाहो! यह मेरा भक्त है, परम भक्तिभावसे मेरा भजन करता है, यह सोचकर मेरे मनमें भी तुम्हारे प्रति स्नेह जाग उठा है। अतः तुम मेरी आज्ञाका पालन करो ॥ ८ ॥ अस्ति चात्र परं किञ्चिदध्यात्मं देवनिर्मितम् । अतश्च त्वां ब्रवीम्येतत् क्रियतामविशङ्कया ॥ ९ ॥ इस सम्बन्धमें एक देवविहित आध्यात्मिक रहस्य है। इसी कारण तुमसे कह रहा हूँ कि तुम बेखटके यही कार्य करो, जिसे मैंने तुम्हें बतलाया है ॥ ९ ॥ देवगुह्यं त्वया ज्ञातुं न शक्यं पुरुषर्षभ । तस्मान्नाख्यामि ते गुह्यं काले वेत्स्यति तद् भवान् ॥ १० ॥ पुरुषरत्न! देवताओंकी गुप्त बात तुम नहीं समझ सकते, इसलिये वह गोपनीय रहस्य तुम्हें नहीं बता रहा हूँ। समय आनेपर तुम सब कुछ अपने-आप जान लोगे ॥ १० ॥ पुनरुक्तं च वक्ष्यामि त्वं राधेय निबोध तत् । मास्मै ते कुण्डले दद्या भिक्षिते वज्रपाणिना ॥ ११ ॥ राधानन्दन! मैं फिर अपनी कही हुई बात दोहराता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो—'इन्द्रके माँगनेपर भी तुम उन्हें अपने वे कुण्डल न देना' ॥ ११ ॥ शोभसे कुण्डलाभ्यां च रुचिराभ्यां महाद्युते । विशाखयोर्मध्यगतः शशीव विमले दिवि ॥ १२ ॥ महाद्युते! तुम इन दोनों मनोहर कुण्डलोंसे निर्मल आकाशमें विशाखा नामक दो नक्षत्रोंके बीच प्रकाशित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते हो ॥ १२ ॥ कीर्तिंश्च जीवतः साध्वी पुरुषस्येति विद्धि तत् । प्रत्याख्येयस्त्वया तात कुण्डलार्थे सुरेश्वरः ॥ १३ ॥ तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि जीवित पुरुषके लिये ही कीर्ति प्रशंसनीय है। अतः तात! तुम्हें कुण्डलके लिये आये हुए देवराज इन्द्रको देनेसे इनकार कर देना चाहिये ॥ १३ ॥ शक्या बहुविधैर्वाक्यैः कुण्डलेप्सा त्वयानघ । विहन्तुं देवराजस्य हेतुयुक्तैः पुनः पुनः ॥ १४ ॥
अनघ! तुम बारंबार युक्तियुक्त वचन कहकर अनेक प्रकारकी बातोंमें बहलाकर देवराज इन्द्रकी कुण्डल लेनेकी इच्छाको नष्ट कर सकते हो ॥ १४ ॥
हेतुमदुपपन्नार्थैर्माधुर्यकृतभूषणैः ।
पुरन्दरस्य कर्ण त्वं बुद्धिमेतामपानुद ॥ १५ ॥
कर्ण! अनेक कारण दिखाकर, नाना प्रकारकी युक्तियाँ सामने रखकर तथा माधुर्यगुणसे विभूषित वचन सुनाकर देवराज इन्द्रके इस कुण्डल लेनेके विचारको तुम पलट देना ॥ १५ ॥
त्वं हि नित्यं नरव्याघ्र स्पर्धसे सव्यसाचिना ।
सव्यसाची त्वया चेह युधि शूरः समेष्यति ॥ १६ ॥
नरव्याघ्र! तुम सदा अर्जुनसे स्पर्धा रखते हो अतः शूरवीर अर्जुन युद्धमें कभी तुमसे अवश्य भिड़ेगा ॥ १६ ॥
न तु त्वामर्जुनः शक्तः कुण्डलाभ्यां समन्वितम् ।
विजेतुं युधि यद्यस्य स्वयमिन्द्रः सखा भवेत् ॥ १७ ॥
यदि तुम इन दोनों कुण्डलोंको धारण किये रहोगे, तो अर्जुन तुम्हें युद्धमें कदापि नहीं जीत सकते; भले ही साक्षात् इन्द्र भी उनकी सहायता करनेके लिये आ जायँ ॥ १७ ॥
तस्मान्न देये शक्राय त्वयैते कुण्डले शुभे ।
संग्रामे यदि निर्जेतुं कर्ण कामयसेऽर्जुनम् ॥ १८ ॥
अतः कर्ण! यदि तुम समरभूमिमें अर्जुनको जीतनेकी अभिलाषा रखते हो तो इन्द्रको ये दोनों शुभ कुण्डल कदापि न देना ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकर्णसंवादे एकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्य-कर्णसंवादविषयक तीन सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०१ ॥
सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय
द्व्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः
सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय
कर्ण उवाच
भगवन्तमहं भक्तो यथा मां वेत्थ गोपते ।
तथा परमतिग्मांशो नास्त्यदेयं कथंचन ॥ १ ॥
**कर्णने कहा—**सूर्यदेव! मैं आपका अनन्य भक्त हूँ, जैसा कि आप भी मुझे जानते हैं। प्रचण्डरश्मे! आपके लिये किसी प्रकार कुछ भी अदेय नहीं है ॥ १ ॥
न मे दारा न मे पुत्रा न चात्मा सुहृदो न च ।
तथेष्टा वै सदा भक्त्या यथा त्वं गोपते मम ॥ २ ॥
स्त्री, पुत्र, सुहृद् और अपना शरीर भी मुझे वैसा प्रिय नहीं है, जैसे आप हैं। किरणोंके स्वामी सूर्यदेव! सदा आप ही मेरे भक्तिभावके आश्रय हैं ॥ २ ॥
इष्टानां च महात्मानो भक्तानां च न संशयः ।
कुर्वन्ति भक्तिमिष्टां च जानीषे त्वं च भास्कर ॥ ३ ॥
प्रभाकर! आप भी जानते ही हैं कि महात्मा पुरुष भी अपने प्रिय भक्तोंपर पूर्ण स्नेह रखते हैं, इसमें संदेह नहीं है ॥ ३ ॥
इष्टो भक्तश्च मे कर्णो न चान्यद् दैवतं दिवि ।
जानीत इति वै कृत्वा भगवानाह मद्धितम् ॥ ४ ॥
आपको यह मालूम है कि कर्ण मेरा प्रिय भक्त है और वह स्वर्गके दूसरे किसी भी देवताको (अपने इष्टरूपमें नहीं जानता है, यही समझकर आप मुझे मेरे हितका उपदेश कर रहे हैं ॥ ४ ॥
भूयश्च शिरसा याचे प्रसाद्य च पुनः पुनः ।
इति ब्रवीमि तिग्मांशो त्वं तु मे क्षन्तुमर्हसि ॥ ५ ॥
प्रचण्ड किरणोंवाले देव! मैं पुनः आपके चरणोंमें मस्तक रखकर, आपको प्रसन्न करके बारंबार क्षमायाचना करता हूँ। इस समय मैं जो कुछ कहता हूँ, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें ॥ ५ ॥
बिभेमि न तथा मृत्योर्यथा बिभ्येऽनृतादहम् ।
विशेषेण द्विजातीनां सर्वेषां सर्वदा सताम् ॥ ६ ॥
प्रदाने जीवितस्यापि न मेऽत्रास्ति विचारणा ।
मैं मृत्युसे भी उतना नहीं डरता जितना झूठसे डरता हूँ। विशेषतः सदा समस्त सज्जन ब्राह्मणोंको उनके माँगनेपर अपने प्राण देनेमें भी मुझे कोई सोच-विचार नहीं हो सकता ।। ६ १/२ ।। यच्च मामात्थ देव त्वं पाण्डवं फाल्गुनं प्रति ।। ७ ।। व्येतु संतापजं दुःखं तव भास्कर मानसम् । अर्जुनप्रतिमं चैव विजेष्यामि रणेऽर्जुनम् ।। ८ ।। देव! आपने पाण्डुनन्दन अर्जुनसे जो मेरे लिये डरकी बात बतायी है, उसके लिये आपके मनमें कोई दुःख और संताप नहीं होना चाहिये। भास्कर! मैं कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी अर्जुनको युद्धमें अवश्य जीत लूँगा ।। ७-८ ।। तवापि विदितं देव ममाप्यस्त्रबलं महत् । जामदग्न्यादुपात्तं यत्र तथा द्रोणान्महात्मनः ।। ९ ।। देव! मेरे पास भी अस्त्रोंका जो महान् बल है। इसे आप भी जानते हैं। मैंने जमदग्निनन्दन परशुराम तथा महात्मा द्रोणाचार्यसे अस्त्रविद्या सीखी है ।। ९ ।। इदं त्वमनुजानीहि सुरश्रेष्ठ व्रतं मम । भिक्षते वज्रिणे दद्यामपि जीवितमात्मनः ।। १० ।। सुरश्रेष्ठ! यह जो मेरा दान देनेका व्रत है, उसके लिये आप भी मुझे आज्ञा दीजिये, जिससे मैं याचक बनकर आये हुए इन्द्रको अपने प्राणतक दे सकूँ ।। १० ।।
सूर्य उवाच
यदि तात ददास्येते वज्रिणे कुण्डले शुभे । त्वमप्येनमथो ब्रूया विजयार्थं महाबलम् ।। ११ ।। नियमेन प्रदद्यां ते कुण्डले वै शतक्रतो । सूर्य बोले—तात! यदि तुम इन्द्रको ये दोनों सुन्दर कुण्डल दे रहे हो तो तुम भी उन महाबली इन्द्रसे अपनी विजयके लिये कोई अस्त्र माँग लेना और उनसे स्पष्ट कह देना कि देवराज! मैं एक शर्तके साथ ये दोनों कुण्डल आपको दे सकता हूँ ।। ११ १/२ ।। अवध्यो ह्यसि भूतानां कुण्डलाभ्यां समन्वितः ।। १२ ।। अर्जुनेन विनाशं हि तव दानवसूदनः । प्रार्थयानो रणे वत्स कुण्डले ते जिहीर्षति ।। १३ ।। कर्ण! इन दोनों कुण्डलोंसे युक्त रहनेपर तुम सभी प्राणियोंके लिये अवध्य बने रहोगे। वत्स! दानवसूदन इन्द्र युद्धमें अर्जुनके द्वारा तुम्हारा विनाश चाहते हैं। इसीलिये वे तुम्हारे दोनों कुण्डलोंको हर लेनेकी इच्छा करते हैं ।। १२-१३ ।। स त्वमप्येनमाराध्य सूनृताभिः पुनः पुनः । अभ्यर्थयेथा देवेशममोघार्थं पुरन्दरम् ।। १४ ।।
अतः तुम भी उनकी आराधना करके बारंबार मीठे वचन बोलकर देवेश्वर इन्द्रसे किसी अमोघ अस्त्रके लिये प्रार्थना करना ।। १४ ।।
अमोघां देहि मे शक्तिममित्रविनिबर्हिणीम् ।
दास्यामि ते सहस्राक्ष कुण्डले वर्म चोत्तमम् ।। १५ ।।
तुम उनसे कहना—‘सहस्राक्ष! मैं आपको अपने शरीरका उत्तम कवच और दोनों कुण्डल दे दूँगा, परंतु आप भी मुझे अपनी वह अमोघ शक्ति प्रदान कीजिये, जो शत्रुओंका संहार करनेवाली है’ ।। १५ ।।
इत्येव नियमेन त्वं दद्याः शक्राय कुण्डले ।
तया त्वं कर्ण संग्रामे हनिष्यसि रणे रिपून् ।। १६ ।।
इसी शर्तके साथ तुम इन्द्रको अपने कुण्डल देना। कर्ण! उस शक्तिके द्वारा तुम युद्धमें अपने शत्रुओंको मार डालोगे ।। १६ ।।
नाहत्वा हि महाबाहो शत्रूनेति करं पुनः ।
सा शक्तिर्देवराजस्य शतशोऽथ सहस्रशः ।। १७ ।।
महाबाहो! देवराज इन्द्रकी वह शक्ति युद्धमें सैकड़ों-हजारों शत्रुओंका वध किये बिना पुनः हाथमें लौटकर नहीं आती ।। १७ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सहस्रांशुः सहसान्तरधीयत ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर सूर्यदेव सहसा वहीं अन्तर्धान हो गये ।। १७ १/२ ।।
(कर्णस्तु बुबुधे राजन् स्वप्नान्ते प्रवदन्निव ।
प्रतिबुद्धस्तु राधेयः स्वप्नं संचिन्त्य भारत ।।
चकार निश्चयं राजन् शक्त्यर्थं वदतां वरः ।
यदि मामिन्द्र आयाति कुण्डलार्थं परंतपः ।।
शक्त्या तस्मै प्रदास्यामि कुण्डले वर्म चैव ह ।
स कृत्व प्रातरुत्थाय कार्याणि भरतर्षभ ।।
ब्राह्मणान् वाचयित्वाथ यथाकार्यमुपाक्रमत् ।
विधिना राजशार्दूल मुहूर्तमजपत् ततः ।।)
राजन्! स्वप्नके अन्तमें कुछ बोलता हुआ-सा कर्ण जाग उठा। भारत! जगनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ राधानन्दन कर्णने स्वप्नका चिन्तन करके शक्तिके लिये इस प्रकार निश्चय किया, ‘यदि शत्रुओंको संताप देनेवाले इन्द्र कुण्डलके लिये मेरे पास आ रहे हैं तो मैं शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच दूँगा।’ भरतश्रेष्ठ! ऐसा निश्चय करके कर्ण प्रातःकाल उठा
और आवश्यक कार्य करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर यथासमय संध्योपासन आदि कार्य करने लगा। नृपश्रेष्ठ! फिर उसने विधिपूर्वक दो घड़ीतक जप किया ॥
ततः सूर्याय जप्यन्ते कर्णः स्वप्नं न्यवेदयत् ॥ १८ ॥
यथादृष्टं यथातत्त्वं यथोक्तमुभयोर्निशि ।
तत् सर्वमानुपूर्व्येण शशंसास्मै वृषस्तदा ॥ १९ ॥
तदनन्तर जपके अन्तमें कर्णने भगवान् सूर्यसे स्वप्नका वृत्तान्त निवेदन किया। उसने जो कुछ देखा था तथा रातमें उन दोनोंमें जैसी बातें हुई थीं, उन सबको कर्णने क्रमशः उनसे ठीक-ठीक कह सुनाया ॥ १८-१९ ॥
तच्छ्रुत्वा भगवान् देवो भानुः स्वर्भानुसूदनः ।
उवाच तं तथेत्येव कर्णं सूर्यः स्मयन्निव ॥ २० ॥
राहुका संहार करनेवाले भगवान् सूर्यदेवने यह सब सुनकर कर्णसे मुसकराते हुए-से कहा—'तुमने जो कुछ देखा है, वह सब ठीक है' ॥ २० ॥
ततस्तत्त्वमिति ज्ञात्वा राधेयः परवीरहा ।
शक्तिमेवाभिकाङ्क्षन् वै वासवं प्रत्यपालयत् ॥ २१ ॥
तब शत्रुओंका संहार करनेवाला राधानन्दन कर्ण उस स्वप्नकी घटनाको यथार्थ जानकर शक्ति प्राप्त करनेकी ही अभिलाषा ले इन्द्रकी प्रतीक्षा करने लगा ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकर्णसंवादे
द्व्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्य-कर्ण-संवादविषयक तीन सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)
३०३-
त्र्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः
कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना
जनमेजय उवाच
किं तद् गुह्यं न चाख्यातं कर्णायेहोष्णरश्मिना ।
कीदृशे कुण्डले ते च कवचं चैव कीदृशम् ॥ १ ॥
कुतश्च कवचं तस्य कुण्डले चैव सत्तम ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा— सज्जनशिरोमणे! कौन-सी ऐसी गोपनीय बात थी, जिसे भगवान् सूर्यने कर्णपर प्रकट नहीं किया। उसके वे दोनों कुण्डल और कवच कैसे थे? तपोधन! कर्णको कुण्डल और कवच कहाँसे प्राप्त हुए थे? मैं यह सुनना चाहता हूँ, आप कृपापूर्वक मुझे बताइये ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
अयं राजन् ब्रवीम्येतत् तस्य गुह्यं विभावसोः ।
यादृशे कुण्डले ते च कवचं चैव यादृशम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! सूर्यदेवकी दृष्टिमें जो गोपनीय रहस्य था, उसे बताता हूँ। इसके साथ कर्णके कुण्डल और कवच कैसे थे? यह भी बता रहा हूँ ॥ ३ ॥
कुन्तिभोजं पुरा राजन् ब्राह्मणः पर्युपस्थितः ।
तिग्मतेजा महाप्रांशुः श्मश्रुदण्डजटाधरः ॥ ४ ॥
राजन्! प्राचीनकालकी बात है, राजा कुन्तिभोजके दरबारमें अत्यन्त ऊँचे कदके एक प्रचण्ड तेजस्वी ब्राह्मण उपस्थित हुए। उन्होंने दाढ़ी, मूँछ, दण्ड और जटा धारण कर रखी थी ॥ ४ ॥
दर्शनीयोऽनवद्याङ्गस्तेजसा प्रज्वलन्निव । मधुपिङ्गो मधुरवाक् तपःस्वाध्यायभूषणः ॥ ५ ॥ उनका स्वरूप देखने ही योग्य था। उनके सभी अंग निर्दोष थे। वे तेजसे प्रज्वलित होते-से जान पड़ते थे। उनके शरीरकी कान्ति मधुके समान पिंगलवर्णकी थी। वे मधुर वचन बोलनेवाले तथा तपस्या और स्वाध्यायरूप सद्गुणोंसे विभूषित थे ॥ ५ ॥ स राजानं कुन्तिभोजमब्रवीत् सुमहातपाः । भिक्षामिच्छामि वै भोक्तुं तव गेहे विमत्सर ॥ ६ ॥ उन महातपस्वीने राजा कुन्तिभोजसे कहा—'किसीसे ईर्ष्या न करनेवाले नरेश! मैं तुम्हारे घरमें भिक्षान्न भोजन करना चाहता हूँ ॥ ६ ॥ न मे व्यलीकं कर्तव्यं त्वया वा तव चानुगैः । एवं वत्स्यामि ते गेहे यदि ते रोचतेऽनघ ॥ ७ ॥ 'परंतु एक शर्त है, तुम या तुम्हारे सेवक कभी मेरे मनके प्रतिकूल आचरण न करें। अनघ! यदि तुम्हें मेरी यह शर्त ठीक जान पड़े तो उस दशामें मैं तुम्हारे घरमें निवास करूँगा ॥ ७ ॥ यथाकामं च गच्छेयमागच्छेयं तथैव च । शय्यासने च मे राजन् नापराध्येत कश्चन ॥ ८ ॥
‘मैं अपनी इच्छाके अनुसार जब चाहूँगा चला जाऊँगा और जब जीमें आयेगा चला आऊँगा। राजन्! मेरी शय्या और आसनपर बैठना अपराध होगा। अतः यह अपराध कोई न करे’ ॥ ८ ॥
तमब्रवीत् कुन्तिभोजः प्रीतियुक्तमिदं वचः ।
एवमस्तु परं चेति पुनश्चैनमथाब्रवीत् ॥ ९ ॥
तब राजा कुन्तिभोजने बड़ी प्रसन्नताके साथ उत्तर दिया—‘विप्रवर! ‘एवमस्तु’—जैसा आप चाहते हैं, वैसा ही होगा’, इतना कहकर वे फिर बोले— ॥ ९ ॥
मम कन्या महाप्राज्ञ पृथा नाम यशस्विनी ।
शीलवृत्तान्विता साध्वी नियता चैव भाविनी ॥ १० ॥
‘महाप्राज्ञ! मेरे पृथा नामकी एक यशस्विनी कन्या है, जो शील और सदाचारसे सम्पन्न, साध्वी, संयम-नियमसे रहनेवाली और विचारशील है ॥ १० ॥
उपस्थास्यति सा त्वां वै पूजयानवमन्य च ।
तस्याश्च शीलवृत्तेन तुष्टिं समुपयास्यसि ॥ ११ ॥
‘वह सदा आपकी सेवा-पूजाके लिये उपस्थित रहेगी। उसके द्वारा आपका अपमान कभी न होगा। मेरा विश्वास है कि उसके शील और सदाचारसे आप संतुष्ट होंगे’ ॥
एवमुक्त्वा तु तं विप्रमभिपूज्य यथाविधि ।
उवाच कन्यामभ्येत्य पृथां पृथुलोचनाम् ॥ १२ ॥
ऐसा कहकर उन ब्राह्मणदेवताकी विधिपूर्वक पूजा करके राजाने अपनी विशाल नेत्रोंवाली कन्या पृथाके पास जाकर कहा— ॥ १२ ॥
अयं वत्से महाभागो ब्राह्मणो वस्तुमिच्छति ।
मम गेहे मया चास्य तथेत्येवं प्रतिश्रुतम् ॥ १३ ॥
‘वत्से! ये महाभाग ब्राह्मण मेरे घरमें निवास करना चाहते हैं। मैंने ‘तथास्तु’ कहकर इन्हें अपने यहाँ ठहरानेकी प्रतिज्ञा कर ली है ॥ १३ ॥
त्वयि वत्से पराश्वस्य ब्राह्मणस्याभिराधनम् ।
तन्मे वाक्यममिथ्या त्वं कर्तुमर्हसि कर्हिचित् ॥ १४ ॥
‘बेटी! तुमपर भरोसा करके ही मैंने इन तेजस्वी ब्राह्मणकी आराधना स्वीकार की है; अतः तुम मेरी बात कभी मिथ्या न होने दोगी, ऐसी आशा है ॥ १४ ॥
अयं तपस्वी भगवान् स्वाध्यायनियतो द्विजः ।
यद् यद् ब्रूयान्महातेजास्तत्तद् देयममत्सरात् ॥ १५ ॥
‘ये विप्रवर महातेजस्वी, तपस्वी, ऐश्वर्यशाली तथा नियमपूर्वक वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न रहनेवाले हैं। ये जिस-जिस वस्तुके लिये कहें, वह सब इन्हें ईर्ष्यारहित हो श्रद्धाके साथ देना ॥ १५ ॥
ब्राह्मणो हि परं तेजो ब्राह्मणो हि परं तपः ।