भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2025, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2025

उन्हें दोनों कुण्डल और उत्तम कवच अवश्य दे दूँगा, जिससे तीनों लोकोंमें विख्यात हुई मेरी कीर्ति नष्ट न होने पाये ।। २६-२७ ।। मद्विधस्य यशस्यं हि न युक्तं प्राणरक्षणम् । युक्तं हि यशसा युक्तं मरणं लोकसम्मतम् ।। २८ ।। मेरे-जैसे शूरवीरको प्राण देकर भी यशकी ही रक्षा करनी चाहिये; अपयश लेकर प्राणोंकी रक्षा करनी कदापि उचित नहीं है। सुयशके साथ यदि मृत्यु हो जाय तो वह वीरोचित एवं सम्पूर्ण लोकके लिये सम्मानकी वस्तु है ।। २८ ।। सोऽहमिन्द्राय दास्यामि कुण्डले सह वर्मणा । यदि मां बलवृत्रघ्नो भिक्षार्थमुपयास्यति ।। २९ ।। ऐसी स्थितिमें यदि बलासुर और वृत्रासुरके विनाशक देवराज इन्द्र मेरे पास भिक्षाके लिये पधारेंगे तो मैं कवचसहित दोनों कुण्डल उन्हें अवश्य दे दूँगा ।। २९ ।। हितार्थं पाण्डुपुत्राणां कुण्डले मे प्रयाचितुम् । तन्मे कीर्तिकरं लोके तस्याकीर्तिर्भविष्यति ।। ३० ।। यदि इन्द्र पाण्डवोंके हितके लिये मेरे कुण्डल माँगने आयेंगे तो इससे संसारमें मेरी कीर्ति बढ़ेगी और उनका अपयश होगा ।। ३० ।। वृणोमि कीर्तिं लोके हि जीवितेनापि भानुमन् । कीर्तिमानश्नुते स्वर्गं हीनकीर्तिस्तु नश्यति ।। ३१ ।। अतः सूर्यदेव! मैं जीवन देकर भी जगत्में कीर्तिका ही वरण करूँगा। कीर्तिमान् पुरुष स्वर्गका सुख भोगता है। जिसकी कीर्ति नष्ट हो जाती है, वह स्वयं भी नष्ट ही है ।। ३१ ।। कीर्तिर्हि पुरुषं लोके संजीवयति मातृवत् । अकीर्तिर्जीवितं हन्ति जीवतोऽपि शरीरिणः ।। ३२ ।। कीर्ति इस संसारमें माताकी भाँति मनुष्यको नूतन जीवन प्रदान करती है। परंतु अकीर्ति जीवित पुरुषके भी जीवनको नष्ट कर देती है ।। ३२ ।। अयं पुराणः श्लोको हि स्वयं गीतो विभावसो । धात्रा लोकेश्वर यथा कीर्तिरायुर्नरस्य ह ।। ३३ ।। विभावसो! लोकेश्वर! साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा गाया हुआ यह प्राचीन श्लोक है कि कीर्ति मनुष्यकी आयु है ।। ३३ ।। पुरुषस्य परे लोके कीर्तिरेव परायणम् । इह लोके विशुद्धा च कीर्तिरायुर्विवर्द्धनी ।। ३४ ।। परलोकमें कीर्ति ही पुरुषके लिये सबसे महान् आश्रय है। इस लोकमें भी विशुद्ध कीर्ति आयु बढ़ानेवाली होती है ।। ३४ ।। सोऽहं शरीरजे दत्त्वा कीर्तिं प्राप्स्यामि शाश्वतीम् । दत्त्वा च विधिवद् दानं ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि ।। ३५ ।।

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