महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहुत्वा शरीरं संग्रामे कृत्वा कर्म सुदुष्करम् । विजित्य च परानाजौ यशः प्राप्स्यामि केवलम् ॥ ३६ ॥ अतः मैं अपने शरीरके साथ उत्पन्न हुए कवच-कुण्डल इन्द्रको देकर सनातन कीर्ति प्राप्त करूँगा। ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान देकर, अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके समराग्निमें शरीरकी आहुति देकर तथा शत्रुओंको संग्राममें जीतकर मैं केवल सुयशका उपार्जन करूँगा ॥ ३५-३६ ॥ भीतानामभयं दत्त्वा संग्रामे जीवितार्थिनाम् । वृद्धान् बालान् द्विजातींश्च मोक्षयित्वा महाभयात् ॥ ३७ ॥ प्राप्स्यामि परमं लोके यशः स्वर्ग्यमनुत्तमम् । जीवितेनापि मे रक्ष्या कीर्तिस्तद् विद्धि मे व्रतम् ॥ ३८ ॥ संग्राममें भयभीत होकर प्राणोंकी भीख माँगनेवाले सैनिकोंको अभय देकर तथा बालक, वृद्ध और ब्राह्मणोंको महान् भयसे छुड़ाकर संसारमें परम उत्तम स्वर्गीय यशका उपार्जन करूँगा। मुझे प्राण देकर भी अपनी कीर्ति सुरक्षित रखनी है। यही मेरा व्रत समझें ॥ ३७-३८ ॥ सोऽहं दत्त्वा मघवते भिक्षामेतामनुत्तमाम् । ब्राह्मणच्छद्मिने देव लोके गन्ता परां गतिम् ॥ ३९ ॥ इसलिये देव! इस प्रकारके व्रतवाला मैं ब्राह्मण-वेषधारी इन्द्रको यह परम श्रेष्ठ भिक्षा देकर जगत्में उत्तम गति प्राप्त करूँगा ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकर्णसंवादे त्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्यकर्णसंवादविषयक तीन सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०० ॥