भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 205

सर्वस्य जगतः श्रेष्ठा ब्राह्मणाः संगतास्त्वया ॥ ८ ॥ ‘आपके द्वारा सुरक्षित हो व्रत धारण करनेवाले ब्राह्मण इस पुण्य वनमें धर्मका अनुष्ठान कर रहे हैं। भार्गव, अंगिरस, वासिष्ठ, काश्यप, महान् सौभाग्यशाली अगस्त्य वंशी तथा श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले आत्रेय आदि सम्पूर्ण जगत्‌के श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ आकर तुमसे मिले हैं॥ ७-८॥

इदं तु वचनं पार्थ शृणुष्व गदतो मम । भ्रातृभिः सह कौन्तेय यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ॥ ९ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! भाइयोंसहित तुमसे मैं जो एक बात कह रहा हूँ, इसे ध्यान देकर सुनो॥ ९॥

ब्रह्म क्षत्रेण संसृष्टं क्षत्रं च ब्रह्मणा सह । उदीर्णे दहतः शत्रून् वनानीवाग्निमारुतौ ॥ १० ॥ ‘जब ब्राह्मण क्षत्रियसे और क्षत्रिय ब्राह्मणसे मिल जाय तो दोनों प्रचण्ड शक्तिशाली होकर उसी प्रकार अपने शत्रुओंको भस्म कर देते हैं, जैसे अग्नि और वायु मिलकर सारे वनको जला देते हैं॥ १०॥

नाब्राह्मणस्तात चिरं बुभूषे- दिच्छन्निमं लोकममुं च जेतुम् । विनीतधर्मार्थमपेतमोहं लब्ध्वा द्विजं नुदति नृपः सपत्नान् ॥ ११ ॥ ‘तात! इहलोक और परलोकपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाला राजा किसी ब्राह्मणको साथ लिये बिना अधिक कालतक न रहे। जिसे धर्म और अर्थकी शिक्षा मिली हो तथा जिसका मोह दूर हो गया हो, ऐसे ब्राह्मणको पाकर राजा अपने शत्रुओंका नाश कर देता है॥ ११॥

चरन् नैःश्रेयसं धर्मं प्रजापालनकारितम् । नाध्यगच्छद् बलिलोंके तीर्थमन्यत्र वै द्विजात् ॥ १२ ॥ ‘राजा बलिको प्रजापालनजनित कल्याणकारी धर्मका आचरण करनेके लिये ब्राह्मणका आश्रय लेनेके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं जान पड़ा था॥ १२॥

अनूनमासीदसुरस्य कामै- र्वैरोचनेः श्रीरपि चाक्षयाऽऽसीत् । लब्ध्वा महीं ब्राह्मणसम्प्रयोगात् तेष्वाचरन् दुष्टमथो व्यनश्यत् ॥ १३ ॥ ‘ब्राह्मणके सहयोगसे पृथ्वीका राज्य पाकर विरोचन-पुत्र बलि नामक असुरका जीवन सम्पूर्ण आवश्यक कामोपभोगकी सामग्रीसे सम्पन्न हो गया और अक्षय राज्यलक्ष्मी भी