भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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प्राप्त हो गयी। परंतु वह उन ब्राह्मणोंके साथ दुर्व्यवहार करनेपर नष्ट हो गया—उसका राज्यलक्ष्मीसे वियोग हो गया* ॥ १३ ॥ नाब्राह्मणं भूमिरियं सभूति- वर्णं द्वितीयं भजते चिराय । समुद्रनेमिर्नमते तु तस्मै यं ब्राह्मणः शास्ति नयैर्विनीतम् ॥ १४ ॥ ‘जिसे ब्राह्मणका सहयोग नहीं प्राप्त है, ऐसे क्षत्रियके पास यह ऐश्वर्यपूर्ण भूमि दीर्घ कालतक नहीं रहती। जिस नीतिज्ञ राजाको श्रेष्ठ ब्राह्मणका उपदेश प्राप्त है, उसके सामने समुद्रपर्यन्त पृथिवी नतमस्तक होती है ॥ १४ ॥ कुञ्जरस्येव संग्रामे परिगृह्याङ्कुशग्रहम् । ब्राह्मणैर्विप्रहीणस्य क्षत्रस्य क्षीयते बलम् ॥ १५ ॥ ‘जैसे संग्राममें हाथीसे महावतको अलग कर देनेपर उसकी सारी शक्ति व्यर्थ हो जाती है, उसी प्रकार ब्राह्मणरहित क्षत्रियका सारा बल क्षीण हो जाता है ॥ १५ ॥ ब्राह्मण्यनुपमा दृष्टिः क्षात्रमप्रतिमं बलम् । तौ यदा चरतः सार्धं तदा लोकः प्रसीदति ॥ १६ ॥ ‘ब्राह्मणोंके पास अनुपम दृष्टि (विचारशक्ति) होती है और क्षत्रियके पास अनुपम बल होता है। ये दोनों जब साथ-साथ कार्य करते हैं, तब सारा जगत् सुखी होता है ॥ १६ ॥ यथा हि सुमहानग्निः कक्षं दहति सानिलः । तथा दहति राजन्यो ब्राह्मणेन समं रिपुम् ॥ १७ ॥ ‘जैसे प्रचण्ड अग्नि वायुका सहारा पाकर सूखे जंगलको जला डालती है, उसी प्रकार ब्राह्मणकी सहायतासे राजा अपने शत्रुको भस्म कर देता है ॥ १७ ॥ ब्राह्मणेष्वेव मेधावी बुद्धिपर्येषणं चरेत् । अलब्धस्य च लाभाय लब्धस्य परिवृद्धये ॥ १८ ॥ ‘बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी वृद्धिके लिये ब्राह्मणोंसे बुद्धि ग्रहण करे ॥ १८ ॥ अलब्धलाभाय च लब्धवृद्धये यथार्हतीर्थप्रतिपादनाय । यशस्विनं वेदविदं विपश्चितं बहुश्रुतं ब्राह्मणमेव वासय ॥ १९ ॥ ‘राजन्! अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी वृद्धिके लिये यथायोग्य उपाय बतानेके निमित्त तुम अपने यहाँ यशस्वी, बहुश्रुत एवं वेदज्ञ विद्वान् ब्राह्मणको बसाओ ॥ १९ ॥ ब्राह्मणेषूत्तमा वृत्तिस्तव नित्यं युधिष्ठिर । तेन ते सर्वलोकेषु दीप्यते प्रथितं यशः ॥ २० ॥