महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2064, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवसुषेण इति ख्यातो वृष इत्येव च प्रभुः ॥ १४ ॥
इस प्रकार वह अमितपराक्रमी एवं सामर्थ्यशाली बालक सूतपुत्र बन गया। लोकमें 'वसुषेण' और 'वृष' इन दो नामोंसे उसकी प्रसिद्धि हुई ॥ १४ ॥
सूतस्य ववृधेऽङ्गेषु श्रेष्ठः पुत्रः स वीर्यवान् ।
चारेण विदितश्चासीत् पृथया दिव्यवर्मभृत् ॥ १५ ॥
अधिरथ सूतका वह पराक्रमी श्रेष्ठ पुत्र अंगदेशमें पालित होकर दिनोदिन बढ़ने लगा। कुन्तीने गुप्तचर भेजकर मालूम कर लिया था कि मेरा दिव्य कवचधारी पुत्र अधिरथके यहाँ पल रहा है ॥ १५ ॥
सूतस्त्वधिरथः पुत्रं विवृद्धं समयेन तम् ।
दृष्ट्वा प्रस्थापयामास पुरं वारणसाह्वयम् ॥ १६ ॥
अधिरथ सूतने अपने पुत्रको बड़ा हुआ देख उसे यथासमय हस्तिनापुर भेज दिया ॥ १६ ॥
तत्रोपसदनं चक्रे द्रोणस्येष्वस्त्रकर्मणि ।
सख्यं दुर्योधनेनैवमगमत् स च वीर्यवान् ॥ १७ ॥
वहाँ उसने धनुर्वेदकी शिक्षा लेनेके लिये आचार्य द्रोणकी शिष्यता स्वीकार की। इस प्रकार पराक्रमी कर्णकी दुर्योधनके साथ मित्रता हो गयी ॥ १७ ॥
द्रोणात् कृपाच्च रामाच्च सोऽस्त्रग्रामं चतुर्विधम् ।
लब्ध्वा लोकेऽभवत् ख्यातः परमेष्वासतां गतः ॥ १८ ॥
वह द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा परशुरामसे चारों प्रकारकी अस्त्रविद्या सीखकर संसारमें एक महान् धनुर्धरके रूपमें विख्यात हुआ ॥ १८ ॥
संधाय धार्तराष्ट्रेण पार्थानां विप्रिये रतः ।
योद्धुमाशंसते नित्यं फाल्गुनेन महात्मना ॥ १९ ॥
धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे मिलकर वह कुन्ती-कुमारोंका अनिष्ट करनेमें लगा रहता और सदा महामना अर्जुनसे युद्ध करनेकी इच्छा व्यक्त किया करता था ॥ १९ ॥
सदा हि तस्य स्पर्धाऽऽसीदर्जुनेन विशाम्पते ।
अर्जुनस्य च कर्णेन यतो दृष्टो बभूव सः ॥ २० ॥
राजन्! अर्जुन और कर्णने जबसे एक-दूसरेको देखा था, तभीसे कर्ण अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता था और अर्जुन भी कर्णके साथ बड़ी स्पर्धा रखते थे ॥ २० ॥
एतद् गुह्यं महाराज सूर्यस्यासीन्न संशयः ।
यः सूर्यसम्भवः कर्णः कुन्त्यां सूतकुले तथा ॥ २१ ॥
महाराज! निःसंदेह सूर्यका यही वह गुप्त रहस्य है कि कुन्तीके गर्भसे सूर्यद्वारा उत्पन्न कर्ण सूतकुलमें पला था ॥ २१ ॥
तं तु कुण्डलिनं दृष्ट्वा वर्मणा च समन्वितम् ।