भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2065, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2065

अवध्यं समरे मत्वा पर्यतप्यद् युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥
उसे दिव्य कुण्डल और कवचसे संयुक्त देख युद्धमें अवध्य जानकर राजा युधिष्ठिर सदा संतप्त होते रहते थे ॥ २२ ॥
यदा च कर्णो राजेन्द्र भानुमन्तं दिवाकरम् ।
स्तौति मध्यन्दिने प्राप्ते प्राञ्जलिः सलिले स्थितः ॥ २३ ॥
तत्रैनमुपतिष्ठन्ति ब्राह्मणा धनहेतुना ।
नादेयं तस्य तत्काले किञ्चिदस्ति द्विजातिषु ॥ २४ ॥
राजेन्द्र! जब कर्ण दोपहरके समय जलमें खड़ा हो हाथ जोड़कर अंशुमाली भगवान् दिवाकरकी स्तुति करता था, उस समय बहुत-से ब्राह्मण धनके लिये उसके पास आते थे। उस अवसरपर उसके पास कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जो ब्राह्मणोंके लिये अदेय हो ॥
तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा भिक्षां देहीत्युपस्थितः ।
स्वागतं चेति राधेयस्तमथ प्रत्यभाषत ॥ २५ ॥
इन्द्र भी उसी समय ब्राह्मण बनकर वहाँ उपस्थित हुए और बोले—‘मुझे भिक्षा दो।' यह सुनकर राधानन्दन कर्णने उत्तर दिया—‘विप्रवर! आपका स्वागत है' ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि राधाकर्णप्राप्तौ
नवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें राधाको कर्णकी प्राप्तिविषयक तीन सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/३ श्लोक हैं)