महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अवध्यं समरे मत्वा पर्यतप्यद् युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥
उसे दिव्य कुण्डल और कवचसे संयुक्त देख युद्धमें अवध्य जानकर राजा युधिष्ठिर सदा संतप्त होते रहते थे ॥ २२ ॥
यदा च कर्णो राजेन्द्र भानुमन्तं दिवाकरम् ।
स्तौति मध्यन्दिने प्राप्ते प्राञ्जलिः सलिले स्थितः ॥ २३ ॥
तत्रैनमुपतिष्ठन्ति ब्राह्मणा धनहेतुना ।
नादेयं तस्य तत्काले किञ्चिदस्ति द्विजातिषु ॥ २४ ॥
राजेन्द्र! जब कर्ण दोपहरके समय जलमें खड़ा हो हाथ जोड़कर अंशुमाली भगवान् दिवाकरकी स्तुति करता था, उस समय बहुत-से ब्राह्मण धनके लिये उसके पास आते थे। उस अवसरपर उसके पास कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जो ब्राह्मणोंके लिये अदेय हो ॥
तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा भिक्षां देहीत्युपस्थितः ।
स्वागतं चेति राधेयस्तमथ प्रत्यभाषत ॥ २५ ॥
इन्द्र भी उसी समय ब्राह्मण बनकर वहाँ उपस्थित हुए और बोले—‘मुझे भिक्षा दो।' यह सुनकर राधानन्दन कर्णने उत्तर दिया—‘विप्रवर! आपका स्वागत है' ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि राधाकर्णप्राप्तौ
नवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें राधाको कर्णकी प्राप्तिविषयक तीन सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/३ श्लोक हैं)
३१०-
दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः
इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना
वैशम्पायन उवाच
देवराजमनुप्राप्तं ब्राह्मणच्छद्मना वृतम् ।
दृष्ट्वा स्वागतमित्याह न बुबोधास्य मानसम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! देवराजको ब्राह्मणके छद्मवेषमें छिपकर आये देख कर्णने कहा—'ब्रह्मन्! आपका स्वागत है।' परंतु कर्णको उस समय इन्द्रके मनोभावका कुछ भी पता न चला ॥ १ ॥
हिरण्यकण्ठीः प्रमदा ग्रामान् वा बहुगोकुलान् ।
किं ददानीति तं विप्रमुवाचाधिरथिस्ततः ॥ २ ॥
तब अधिरथकुमारने उन ब्राह्मणरूपधारी इन्द्रसे कहा—'विप्रवर! मैं आपको क्या दूँ? सोनेके कण्ठोंसे विभूषित युवती स्त्रियाँ अथवा बहुसंख्यक गोधनोंसे भरे हुए अनेक ग्राम?' ॥ २ ॥
ब्राह्मण उवाच
हिरण्यकण्ठ्यः प्रमदा यच्चान्यत् प्रीतिवर्धनम् ।
नाहं दत्तमिहेच्छामि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् ॥ ३ ॥
ब्राह्मण बोले— वीरवर! तुम्हारी दी हुई सोनेके कंठोंसे विभूषित युवती स्त्रियाँ तथा दूसरी आनन्दवर्धक वस्तुएँ मैं नहीं लेना चाहता। इन वस्तुओंको उन याचकोंको दे दो, जो इनकी अभिलाषा लेकर आये हों ॥ ३ ॥
यदेतत् सहजं वर्म कुण्डले च तवानघ ।
एतदुत्कृत्य मे देहि यदि सत्यव्रतो भवान् ॥ ४ ॥
अनघ! यदि तुम सत्यव्रती हो, तो ये जो तुम्हारे शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए कवच और कुण्डल हैं, इन्हें काटकर मुझे दे दो ॥ ४ ॥
एतदिच्छाम्यहं क्षिप्रं त्वया दत्तं परंतप ।
एष मे सर्वलाभानां लाभः परमको मतः ॥ ५ ॥
परंतप! तुम्हारा दिया हुआ यही दान मैं शीघ्रतापूर्वक लेना चाहता हूँ। यही मेरे लिये सम्पूर्ण लाभोंमें सबसे बढ़कर लाभ है ॥ ५ ॥
कर्ण उवाच
अवनिं प्रमदा गाश्च निवापं बहुवार्षिकम् ।
तत् ते विप्र प्रदास्यामि न तु वर्म सकुण्डलम् ॥ ६ ॥
कर्णने कहा— ब्रह्मन्! यदि आप घर बनानेके लिये भूमि, गृहस्थी बसानेके लिये सुन्दरी तरुणी स्त्रियाँ, बहुत-सी गौएँ, खेत और बहुत वर्षोंतक चालू रहनेवाली जीवनवृत्ति लेना चाहें तो दे दूँगा; परंतु कवच और कुण्डल नहीं दे सकता ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं बहुविधैर्वाक्यैर्याच्यमानः स तु द्विजः ।
कर्णेन भरतश्रेष्ठ नान्यं वरमयाचत ॥ ७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर कर्णके प्रार्थना करनेपर भी उन ब्राह्मणदेवने दूसरा कोई वर नहीं माँगा ॥ ७ ॥
सान्त्वितश्च यथाशक्ति पूजितश्च यथाविधि ।
न चान्यं स द्विजश्रेष्ठः कामयामास वै वरम् ॥ ८ ॥
कर्णने उन्हें यथाशक्ति बहुत समझाया एवं विधि-पूर्वक उनका पूजन किया। तथापि उन द्विजश्रेष्ठने और किसी वरको लेनेसे अनिच्छा प्रकट कर दी ॥ ८ ॥
यदा नान्यं प्रवृणुते वरं वै द्विजसत्तमः ।
(विनास्य सहजं वर्म कुण्डले च विशाम्पते) ।
तदैनमब्रवीद् भूयो राधेयः प्रहसन्निव ॥ ९ ॥
राजन्! जब उन द्विजश्रेष्ठने कर्णके सहज कवच और कुण्डलके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं माँगी, तब राधानन्दन कर्णने उनसे हँसते हुए-से कहा— ॥ ९ ॥
सहजं वर्म मे विप्र कुण्डले चामृतोद्भवे ।
तेनावध्योऽस्मि लोकेषु ततो नैतज्जहाम्यहम् ॥ १० ॥
'विप्रवर! कवच तो मेरे शरीरके साथ ही उत्पन्न हुआ है और दोनों कुण्डल भी अमृतसे प्रकट हुए हैं। इन्हींके कारण मैं संसारमें अवध्य बना हुआ हूँ; अतः मैं इन सब वस्तुओंको त्याग नहीं सकता ॥ १० ॥
विशालं पृथिवीराज्यं क्षेमं निहतकण्टकम् ।
प्रतिगृह्णीष्व मत्तस्त्वं साधु ब्राह्मणपुङ्गव ॥ ११ ॥
'ब्राह्मणप्रवर! आप मुझसे समूची पृथ्वीका कल्याणमय, अकण्टक, विशाल एवं उत्तम साम्राज्य ले लें ॥ ११ ॥
कुण्डलाभ्यां विमुक्तोऽहं वर्मणा सहजेन च ।
गमनीयो भविष्यामि शत्रूणां द्विजसत्तम ॥ १२ ॥
'द्विजश्रेष्ठ इस सहज कवच और दोनों कुण्डलोंसे वंचित हो जानेपर मैं शत्रुओंका वध्य हो जाऊँगा (अतः इन्हें न माँगिये)' ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
यदान्यं न वरं वव्रे भगवान् पाकशासनः ।
ततः प्रहस्य कर्णस्तं पुनरित्यब्रवीद् वचः ॥ १३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इतना अनुनय-विनय करनेपर भी जब पाकशासन भगवान् इन्द्रने दूसरा कोई वर नहीं माँगा, तब कर्णने हँसकर पुनः इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥
विदितो देवदेवेश प्रागेवासि मम प्रभो ।
न तु न्याय्यं मया दातुं तव शक्र वृथा वरम् ॥ १४ ॥
‘देवदेवेश्वर! प्रभो! आप पधार रहे हैं, यह बात मुझे पहले ही ज्ञात हो गयी थी। पर देवेन्द्र! मैं आपको निष्फल कर दूँ, यह न्यायसंगत नहीं है ॥ १४ ॥
त्वं हि देवेश्वरः साक्षात् त्वया देयो वरो मम ।
अन्येषां चैव भूतानामीश्वरो ह्यसि भूतकृत् ॥ १५ ॥
‘आप साक्षात् देवेश्वर हैं। उचित तो यही है कि आप मुझे वर दें; क्योंकि आप अन्य सब भूतोंके ईश्वर तथा उन्हें उत्पन्न करनेवाले हैं ॥ १५ ॥
यदि दास्यामि ते देव कुण्डले कवचं तथा ।
वध्यतामुपयास्यामि त्वं च शक्रावहास्यताम् ॥ १६ ॥
तस्माद् विनिमयं कृत्वा कुण्डले वर्म चोत्तमम् ।
हरस्व शक्र कामं मे न दद्यामहमम्यथा ॥ १७ ॥
‘इन्द्रदेव! यदि मैं आपको अपने दोनों कुण्डल और कवच दे दूँगा तो मैं तो शत्रुओंका वध्य हो जाऊँगा और संसारमें आपकी हँसी होगी। इसलिये (कर्णने सूर्यकी आज्ञाको याद करके कहा—) शक्र! आप कुछ बदला देकर इच्छानुसार मेरे कुण्डल और उत्तम कवच ले जाइये; अन्यथा मैं इन्हें नहीं दे सकता’ ॥ १६-१७ ॥
शक्र उवाच
विदितोऽहं रवेः पूर्वमायानेव तवान्तिकम् ।
तेन ते सर्वमाख्यातमेवमेतन्न संशयः ॥ १८ ॥
**इन्द्र बोले—**कर्ण! जब मैं तुम्हारे पास आ रहा था, उसके पहले ही सूर्यदेवको यह बात मालूम हो गयी थी। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने ही तुमसे सारी बातें बता दी हैं ॥ १८ ॥
काममस्तु तथा तात तव कर्ण यथेच्छसि ।
वर्जयित्वा तु मे वज्रं प्रवृणीष्व यथेच्छसि ॥ १९ ॥
तात कर्ण! तुम्हारी रुचिके अनुसार इन वस्तुओंका परिवर्तन ही हो जाय। मेरे वज्रको छोड़कर तुम जो चाहो, वही आयुध मुझसे माँग लो ॥ १९ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः कर्णः प्रहृष्टस्तु उपसंगम्य वासवम् ।
अमोघां शक्तिमभ्येत्य वव्रे सम्पूर्णमानसः ॥ २० ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब कर्ण अत्यन्त प्रसन्न होकर देवराज इन्द्रके पास गया और सफलमनोरथ होकर उसने उनकी अमोघ शक्ति माँगी ॥ २० ॥
कर्ण उवाच
वर्मणा कुण्डलाभ्यां च शक्तिं मे देहि वासव । अमोघां शत्रुसंघानां घातिनीं पृतनामुखे ॥ २१ ॥ **कर्ण बोला—**वासव! मेरे कवच और कुण्डल लेकर आप मुझे अपनी वह अमोघ शक्ति प्रदान कीजिये जो सेनाके अग्रभागमें शत्रुसमुदायका संहार करनेवाली है ॥
ततः संचिन्त्य मनसा मुहूर्तमिव वासवः । शक्त्यर्थं पृथिवीपाल कर्णं वाक्यमथाब्रवीत् ॥ २२ ॥ राजन्! तब इन्द्रने शक्तिके विषयमें दो घड़ी-तक मन-ही-मन विचार करके कर्णसे इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥
कुण्डले मे प्रयच्छस्व वर्म चैव शरीरजम् । गृहाण कर्ण शक्तिं त्वमनेन समयेन च ॥ २३ ॥ ‘कर्ण! तुम मुझे अपने दोनों कुण्डल और सहज कवच दे दो और मेरी यह शक्ति ग्रहण कर लो। इसी शर्तके अनुसार हमलोगोंमें इन वस्तुओंका विनिमय (बदला) हो जाय ॥ २३ ॥
अमोघा हन्ति शतशः शत्रून् मम करच्युता । पुनश्च पाणिमभ्येति मम दैत्यान् विनिघ्नतः ॥ २४ ॥ ‘सूतनन्दन! दैत्योंका संहार करते समय मेरे हाथसे छूटनेपर यह अमोघ शक्ति सैकड़ों शत्रुओंको मार देती है और पुनः मेरे हाथमें चली आती है’ ॥ २४ ॥
सेयं तव करप्राप्ता हत्वैकं रिपुमूर्जितम् । गर्जन्तं प्रतपन्तं च मामेवैष्यति सूतज ॥ २५ ॥ ‘वही शक्ति तुम्हारे हाथमें जाकर किसी एक तेजस्वी, ओजस्वी, प्रतापी तथा गर्जना करनेवाले शत्रुको मारकर पुनः मेरे ही पास आ जायगी’ ॥ २५ ॥
कर्ण उवाच
एकमेवाहमिच्छामि रिपुं हन्तुं महाहवे । गर्जन्तं प्रतपन्तं च यतो मम भयं भवेत् ॥ २६ ॥ **कर्ण बोला—**देवेन्द्र! मैं महासमरमें अपने एक ही शत्रुको इसके द्वारा मारना चाहता हूँ जो बहुत गर्जना करनेवाला और प्रतापी है, तथा जिससे मुझे सदा भय बना रहता है ॥ २६ ॥
इन्द्र उवाच
एकं हनिष्यसि रिपुं गर्जन्तं बलिनं रणे । त्वं तु यं प्रार्थयस्येकं रक्ष्यते स महात्मना ॥ २७ ॥ यमाहुर्वेदविद्वांसो वरार्हमपराजितम् । नारायणमचिन्त्यं च तेन कृष्णेन रक्ष्यते ॥ २८ ॥ इन्द्रने कहा—कर्ण! तुम (इस शक्तिसे) रणभूमिमें गर्जना करनेवाले किसी एक बलवान् शत्रुको मार सकोगे, परंतु इस समय तुम जिस एक शत्रुको लक्ष्य करके यह अमोघ शक्ति माँग रहे हो वह तो उन परमात्माद्वारा सुरक्षित है, जिन्हें वेदवेत्ता विद्वान् पुरुषोत्तम अपराजित, हरि तथा अचिन्त्यस्वरूप नारायण कहते हैं। वे स्वयं श्रीकृष्ण हैं जिनके द्वारा उस वीरकी रक्षा हो रही है ॥ २७-२८ ॥
कर्ण उवाच
एवमप्यस्तु भगवन्नेकवीरवधे मम । अमोघां देहि मे शक्तिं यथा हन्यां प्रतापिनम् ॥ २९ ॥ कर्ण बोला—भगवन्! ऐसा ही हो। तो भी आप एक वीरके वधके लिये मुझे अपनी अमोघ शक्ति दे दीजिये, जिससे मैं अपने प्रतापी शत्रु का वध कर सकूँ ॥ २९ ॥ उत्कृत्य तु प्रदास्यामि कुण्डले कवचं च ते । निकृत्तेषु तु गात्रेषु न मे बीभत्सता भवेत् ॥ ३० ॥ मैं आपको अपने शरीरसे उधेड़कर कवच और कुण्डल तो दे दूँगा; परंतु उस समय मेरे अंगोंके कट जानेपर मेरा स्वरूप बीभत्स न होना चाहिये ॥ ३० ॥
इन्द्र उवाच
न ते बीभत्सता कर्ण भविष्यति कथञ्चन । व्रणश्चैव न गात्रेषु यस्त्वं नानृतमिच्छसि ॥ ३१ ॥ इन्द्रने कहा—कर्ण! तुम्हारा स्वरूप किसी प्रकार भी बीभत्स नहीं होगा। तुम्हारे अंगोंमें घावतक नहीं होगा; क्योंकि तुम असत्यकी इच्छा नहीं रखते हो ॥ ३१ ॥ यादृशस्ते पितुर्वर्णस्तेजश्च वदतां वर । तादृशेनैव वर्णेन त्वं कर्ण भविता पुनः ॥ ३२ ॥ विद्यमानेषु शस्त्रेषु यद्यमोघामसंशये । प्रमत्तो मोक्ष्यसे चापि त्वय्येवैषा पतिष्यति ॥ ३३ ॥ वक्ताओंमें श्रेष्ठ कर्ण! तुम्हारे पिताका जैसा वर्ण और तेज है, वैसे ही वर्ण और तेजसे तुम पुनः सम्पन्न हो जाओगे। जबतक तुम्हारे पास दूसरे शस्त्र रहें और प्राणसंकटकी परिस्थिति न आ जाय, तबतक तुम यदि प्रमादवश यह अमोघ शक्ति यों ही किसी शत्रुपर छोड़ दोगे तो यह उसे न मारकर तुम्हारे ही ऊपर आ पड़ेगी ॥ ३२-३३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2071)
कर्ण उवाच
संशयं परमं प्राप्य विमोक्ष्ये वासवीमिमाम् ।
यथा मामात्थ शक्र त्वं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ३४ ।।
कर्ण बोला—देवेन्द्र! आप जैसा मुझसे कह रहे हैं, उसके अनुसार प्राणसंकटकी अवस्थामें पड़कर ही मैं आपकी दी हुई इस शक्तिका उपयोग करूँगा, यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ।। ३४ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततः शक्तिं प्रज्वलितां प्रतिगृह्य विशाम्पते ।
शस्त्रं गृहीत्वा निशितं सर्वगात्राण्यकृन्तत ।। ३५ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर इन्द्रकी प्रज्वलित शक्ति लेकर कर्णने तीखी तलवार उठायी और कवच उधेड़नेके लिये अपने सब अंगोंको काटना आरम्भ किया ।। ३५ ।।
ततो देवा मानवा दानवाश्च
निकृन्तन्तं कर्णमात्मानमेवम् ।
दृष्ट्वा सर्वे सिंहनादान् प्रणेदु-
र्न ह्यस्यासीन्मुखजो वै विकारः ।। ३६ ।।
उस समय देवता, मनुष्य और दानव सब लोग इस प्रकार अपना शरीर काटते हुए कर्णको देखकर सिंहनाद करने लगे; परंतु कर्णके मुखपर तनिक भी विकार नहीं आया ।। ३६ ।।
ततो दिव्या दुन्दुभयः प्रणेदुः
पपातोच्चैः पुष्पवर्षं च दिव्यम् ।
दृष्ट्वा कर्णं शस्त्रसंकृत्तगात्रं
मुहुश्चापि स्मयमानं नृवीरम् ।। ३७ ।।
कर्णके सारे अंग शस्त्रोंके आघातसे कट गये थे, फिर भी वह नरवीर बारंबार मुसकरा रहा था। यह देखकर दिव्य दुन्दुभियाँ बज उठीं एवं आकाशसे दिव्य फूलोंकी वर्षा होने लगी ।। ३७ ।।
ततश्छित्त्वा कवचं दिव्यमङ्गात्
तथैवार्द्रं प्रददौ वासवाय ।
तथोत्कृत्य प्रददौ कुण्डले ते
कर्णात् तस्मात् कर्मणा तेन कर्णः ।। ३८ ।।
तदनन्तर अपने शरीरसे दिव्य कवचको उधेड़कर कर्णने इन्द्रके हाथमें दे दिया; वह कवच उस समय रक्तसे भीगा हुआ ही था। इसी प्रकार उसने कानोंके वे कुण्डल भी
काटकर दे दिये। अतः इस कर्णन (कर्तन) रूपी कर्मसे उसका नाम 'कर्ण' हुआ ।। ३८ ।।
ततः शक्रः प्रहसन् वञ्चयित्वा
कर्णं लोके यशसा योजयित्वा ।
कृतं कार्यं पाण्डवानां हि मेने
ततः पश्चाद् दिवमेवोत्पपात ।। ३९ ।।
इस प्रकार कर्णको (कवच और कुण्डलसे) वंचित करके एवं संसारमें उसका सुयश फैलाकर देवराज इन्द्र हँसते हुए स्वर्गलोकको चले गये। उन्हें मन-ही-मन यह विश्वास हो गया कि 'मैंने पाण्डवोंका कार्य पूरा कर दिया' ।। ३९ ।।
श्रुत्वा कर्णं मुषितं धार्तराष्ट्रा
दीनाः सर्वे भग्नदर्पा इवासन् ।
तां चावस्थां गमितं सूतपुत्रं
श्रुत्वा पार्था जहृषुः काननस्थाः ।। ४० ।।
धृतराष्ट्रके पुत्रोंने जब यह सुना कि कर्णको (कवच और कुण्डलोंसे) वंचित कर दिया गया तो वे सब अत्यन्त दीन-से हो गये; उनका घमंड चूर-चूर-सा हो गया। वनमें रहनेवाले कुन्तीपुत्रोंने जब सुना कि सूतपुत्र इस दशामें पहुँच गया है तब उन्हें बड़ा हर्ष हुआ ।। ४० ।।
जनमेजय उवाच
क्वस्था वीराः पाण्डवास्ते बभूवुः
कुतश्चैते श्रुतवन्तः प्रियं तत् ।
किं वाकार्षुद्द्वादशेऽब्दे व्यतीते
तन्मे सर्वं भगवान् व्याकरोतु ।। ४१ ।।
**जनमेजयने पूछा—**भगवन्! वे वीर पाण्डव उन दिनों कहाँ थे? उन्होंने वह प्रिय समाचार कैसे सुना और बारहवाँ वर्ष व्यतीत हो जानेपर क्या किया? ये सब बातें आप मुझे स्पष्टरूपसे बतायें ।। ४१ ।।
वैशम्पायन उवाच
लब्ध्वा कृष्णां सैन्धवं द्रावयित्वा
विप्रैः सार्धं काम्यकादाश्रमात् ते ।
मार्कण्डेयाच्छ्रुतवन्तः पुराणं
देवर्षीणां चरितं विस्तरेण ।। ४२ ।।
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! द्रौपदीको पाकर तथा जयद्रथको काम्यक वनसे भगाकर ब्राह्मणोंसहित समस्त पाण्डवोंने मार्कण्डेयजीके मुखसे पुराणकथा और देवताओं तथा ऋषियोंके विस्तृत चरित्र सुनते हुए इसे भी सुना था ।। ४२ ।।
(प्रत्याजग्मुः सरथाः सानुयात्राः
सर्वैः सार्धं सूतपौरोगवैस्ते ।
ततो युयुर्द्वैतवने नृवीरा
निस्तीर्यैवं वनवासं समग्रम् ॥)
इस प्रकार वनवासकी पूरी अवधि बिताकर वे नरवीर पाण्डव अपने रथ, अनुचर, सूत तथा रसोइयोंके साथ पुनः द्वैतवनमें लौट आये ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि कवचकुण्डलदाने
दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें कवच-कुण्डलदानविषयक तीन सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३१० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४३ १/३ श्लोक हैं)
(आरणेयपर्व)
(आरणेयपर्व)
एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः
ब्राह्मणकी अरणि एवं मन्थन-काष्ठका पता लगानेके लिये पाण्डवोंका मृगके पीछे दौड़ना और दुःखी होना
जनमेजय उवाच
एवं हृतायां भार्यायां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् ।
प्रतिपद्य ततः कृष्णां किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! इस प्रकार अपनी पत्नी द्रौपदीका अपहरण होनेपर अत्यन्त क्लेश उठाकर पाण्डवोंने जब उन्हें पुनः प्राप्त कर लिया, उसके बाद उन्होंने क्या किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं हृतायां कृष्णायां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् ।
विहाय काम्यकं राजा सह भ्रातृभिरच्युतः ॥ २ ॥
पुनर्द्वैतवनं रम्यमाजगाम युधिष्ठिरः ।
स्वादुमूलफलं रम्यं विचित्रबहुपादपम् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! पूर्वोक्त प्रकारसे द्रौपदीका हरण होनेपर भारी क्लेश उठानेके बाद जब पाण्डवोंने उन्हें पा लिया, तब धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ काम्यकवन छोड़कर पुनः रमणीय द्वैतवनमें ही चले आये। वहाँ स्वादिष्ट फल-मूलोंकी बहुतायत थी तथा बहुत-से विचित्र वृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २-३ ॥
अनुभुक्तफलाहाराः सर्व एव मिताशनाः ।
न्यवसन् पाण्डवास्तत्र कृष्णया सह भार्यया ॥ ४ ॥
वहाँ सब पाण्डव अपनी पत्नी द्रौपदीके साथ केवल फलाहार करके परिमित भोजनपर जीवन-निर्वाह करते हुए रहते थे ॥ ४ ॥
वसन् द्वैतवने राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनोऽर्जुनश्चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ५ ॥
ब्राह्मणार्थे पराक्रान्ता धर्मात्मानो यतव्रताः ।
क्लेशमार्च्छन्त विपुलं सुखोदर्कं परंतपाः ॥ ६ ॥
द्वैतवनमें रहते समय कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल-सहदेव—इन सभी शत्रुसंतापी संयम-नियम-परायण धर्मात्मा पाण्डवोंने एक दिन एक ब्राह्मणके लिये पराक्रम करते हुए महान् क्लेश उठाया, परंतु उसका भावी परिणाम सुखमय ही हुआ॥ ५-६॥
तस्मिन् प्रतिवसन्तस्ते यत् प्रापुः कुरुसत्तमाः ।
वने क्लेशं सुखोदर्कं तत् प्रवक्ष्यामि ते शृणु ॥ ७ ॥
राजन्! उस वनमें रहते हुए उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंने जो भविष्यमें सुख देनेवाला क्लेश उठाया, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो— ॥ ७ ॥
अरणीसहितं मन्थं ब्राह्मणस्य तपस्विनः ।
मृगस्य घर्षमाणस्य विषाणे समसज्जत ॥ ८ ॥
एक तपस्वी ब्राह्मणका (रस्सीमें बँधा) अरणीसहित मन्थनकाष्ठ एक वृक्षमें टंगा था; वहीं एक मृग आकर उस वृक्षसे अपना शरीर रगड़ने लगा। उस समय वे दोनों काष्ठ उस मृगके सींगमें अटक गये ॥ ८ ॥
तदादाय गतो राजंस्त्वरमाणो महामृगः ।
आश्रमान्तरितः शीघ्रं प्लवमानो महाजवः ॥ ९ ॥
राजन्! उन काष्ठोंको लेकर वह महामृग बड़ी उतावलीसे भागा और बड़े वेगसे चौकड़ी भरता हुआ शीघ्र ही आश्रमसे ओझल हो गया ॥ ९ ॥
ह्रियमाणं तु तं दृष्ट्वा स विप्रः कुरुसत्तम ।
त्वरितोऽभ्यागमत् तत्र अग्निहोत्रपरीप्सया ॥ १० ॥
कुरुश्रेष्ठ! उस ब्राह्मणने जब देखा कि मृग मेरी अरणी और मथानीको लेकर तेजीसे भागा जा रहा है, तब वह अग्निहोत्रकी रक्षाके लिये तुरंत वहीं (पाण्डवोंके आश्रममें) आया ॥ १० ॥
अजातशत्रुमासीनं भ्रातृभिः सहितं वने ।
आगम्य ब्राह्मणस्तूर्णं संतप्तश्चेदमब्रवीत् ॥ ११ ॥
वनमें भाइयोंके साथ बैठे हुए अजातशत्रु युधिष्ठिरके पास तुरंत आकर संतप्त हुए उस ब्राह्मणने इस प्रकार कहा— ॥ ११ ॥
अरणीसहितं मन्थं समासक्तं वनस्पतौ ।
मृगस्य घर्षमाणस्य विषाणे समसज्जत ॥ १२ ॥
तमादाय गतो राजंस्त्वरमाणो महामृगः ।
आश्रमात् त्वरितः शीघ्रं प्लवमानो महाजवः ॥ १३ ॥
‘राजन्! मैंने अपनी अरणी और मथानी एक वृक्षपर रख दी थी। एक मृग वहाँ आकर उस वृक्षसे शरीर रगड़ने लगा और उसके सींगमें वे दोनों काष्ठ फँस गये। वह महान् मृग उन
काष्ठोंको लेकर बड़ी उतावलीके साथ भाग गया है और अत्यन्त वेगवान् होनेके कारण चौकड़ी भरता हुआ शीघ्र ही आश्रमसे बहुत दूर निकल गया है ॥ १२-१३ ॥ तस्य गत्वा पदं राजन्नासाद्य च महामृगम् । अग्निहोत्रं न लुप्येत तदानयत पाण्डवाः ॥ १४ ॥ ‘महाराज युधिष्ठिर! तथा वीर पाण्डवो! तुम सब लोग उसके पदचिह्नोंको देखते हुए उस महामृगके पास पहुँचो और वे दोनों काष्ठ ले आओ, जिससे मेरा अग्निहोत्रकर्म लुप्त न हो’ ॥ १४ ॥ ब्राह्मणस्य वचः श्रुत्वा संतप्तोऽथ युधिष्ठिरः । धनुरादाय कौन्तेयः प्राद्रवद् भ्रातृभिः सह ॥ १५ ॥ ब्राह्मणकी बात सुनकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर बहुत दुःखी हुए और मृगका पता लगानेके लिये वे धनुष लेकर भाइयोंसहित दौड़े ॥ १५ ॥ सन्नद्धा धन्विनः सर्वे प्राद्रवन् नरपुङ्गवाः । ब्राह्मणार्थे यतन्तस्ते शीघ्रमन्वगमन् मृगम् ॥ १६ ॥ वे सभी नरश्रेष्ठ कवच बाँध एवं कमर कसकर धनुष लिये आश्रमसे दौड़े और ब्राह्मणकी कार्यसिद्धिके लिये प्रयत्नशील होकर तीव्र गतिसे मृगका पीछा करने लगे ॥ कर्णिनालीकनाराचानुत्सृजन्तो महारथाः । नाविध्यन् पाण्डवास्तत्र पश्यन्तो मृगमन्तिकात् ॥ १७ ॥ कुछ दूर जानेपर उन्हें वह मृग अपने पास ही दिखायी दिया। तब वे महारथी पाण्डव कर्णि, नालीक और नाराच नामक बाण उसपर छोड़ने लगे; किंतु वे देखते हुए भी वहाँ उस मृगको बींध न सके ॥ १७ ॥ तेषां प्रयतमानानां नादृश्यत महामृगः । अपश्यन्तो मृगं शान्ता दुःखं प्राप्ता मनस्विनः ॥ १८ ॥ घोर प्रयत्न करनेपर भी वह महामृग उनके हाथ न लगा; सहसा अदृश्य हो गया। मृगको न देखकर वे मनस्वी वीर हतोत्साह और दुःखी हो गये ॥ १८ ॥ शीतलच्छायमागम्य न्यग्रोधं गहने वने । क्षुत्पिपासापरीताङ्गाः पाण्डवाः समुपाविशन् ॥ १९ ॥ तत्पश्चात् उस गहन वनमें भूख-प्याससे पीड़ित अंगोंवाले पाण्डव एक शीतल छायावाले बरगदके पास आकर बैठ गये ॥ १९ ॥ तेषां समुपविष्टानां नकुलो दुःखितस्तदा । अब्रवीद् भ्रातरं श्रेष्ठममर्षात् कुरुनन्दनम् ॥ २० ॥ उनके बैठ जानेपर नकुल अत्यन्त दुःखी हो अमर्षमें आकर बड़े भाई कुरुनन्दन युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥ नास्मिन् कुले जातु ममज्ज धर्मो
न चालस्यादर्थलोपो बभूव ।
अनुत्तराः सर्वभूतेषु भूयः
सम्प्राप्ताः स्मः संशयं किंनु राजन् ॥ २१ ॥
'राजन्! हमारे कुलमें कभी आलस्यवश धर्मका लोप नहीं हुआ; अर्थका भी कभी नाश नहीं हुआ। हमने किसी भी प्राणीके प्रार्थना करनेपर कभी उसे कोरा जवाब नहीं दिया—निराश नहीं किया। फिर भी हम धर्मसंकटमें कैसे पड़ गये?' ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि मृगान्वेषणे
एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें मृगका अनुसंधानविषयक तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३११ ॥
३१२-
द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः
पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना
युधिष्ठिर उवाच
नापदामस्ति मर्यादा न निमित्तं न कारणम् ।
धर्मस्तु विभजत्यर्थमुभयोः पुण्यपापयोः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भैया! आपत्तियोंकी न तो कोई सीमा है, न कोई निमित्त दिखायी देता है और न कोई विशेष कारण ही परिलक्षित होता है। पहलेका किया हुआ पुण्य और पापरूप कर्म ही प्रारब्ध बनकर सुख और दुःखरूप फल बाँटता रहता है ॥ १ ॥
भीम उवाच
प्रातिकाम्यनयत् कृष्णां सभायां प्रेष्यवत् तदा ।
न मया निहतस्तत्र तेन प्राप्ताः स्म संशयम् ॥ २ ॥
**भीमसेनने कहा—**जब प्रातिकामीकी जगह दूत बनकर गया हुआ दुःशासन द्रौपदीको कौरवोंकी सभामें दासीकी भाँति बलपूर्वक खींच ले आया, उस समय मैंने जो उसका वध नहीं कर डाला; इसीके कारण हमलोग ऐसे धर्मसंकटमें पड़े हैं ॥ २ ॥
अर्जुन उवाच
वाचस्तीक्ष्णास्थिभेदिन्यः सूतपुत्रेण भाषिताः ।
अतितीव्रा मया क्षान्तास्तेन प्राप्ताः स्म संशयम् ॥ ३ ॥
**अर्जुन बोले—**सूतपुत्र कर्णके कहे हुए कठोर अस्थियोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले अत्यन्त कड़वे वचन सुनकर भी जो हमने सहन कर लिये; उसीसे आज हम धर्मसंकटकी अवस्थामें आ पहुँचे हैं ॥ ३ ॥
सहदेव उवाच
शकुनिस्त्वां यदाजैषीदक्षद्यूतेन भारत ।
स मया न हतस्तत्र तेन प्राप्ताः स्म संशयम् ॥ ४ ॥
**सहदेवने कहा—**भारत! जब शकुनिने आपको जूएमें जीत लिया और उस समय मैंने उसे मार नहीं डाला, उसीका यह फल है कि आज हमलोग धर्मसंकटमें पड़ गये हैं ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा नकुलं वाक्यमब्रवीत् ।
आरुह्य वृक्षं माद्रेय निरीक्षस्व दिशो दश ॥ ५ ॥
पानीयमन्तिके पश्य वृक्षांश्चाप्युदकाश्रितान् ।
एते हि भ्रातरः श्रान्तास्तव तात पिपासिताः ॥ ६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने नकुलसे कहा—‘माद्रीनन्दन! किसी वृक्षपर चढ़कर सब दिशाओंमें दृष्टिपात करो। कहीं आस-पास पानी हो, तो देखो अथवा जलके किनारे होनेवाले वृक्षोंपर भी दृष्टि डालो। तात! तुम्हारे ये भाई थके-माँदे और प्यासे हैं’ ॥ ५-६ ॥
नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा शीघ्रमारुह्य पादपम् ।
अब्रवीद् भ्रातरं ज्येष्ठमभिवीक्ष्य समन्ततः ॥ ७ ॥
तब नकुल ‘बहुत अच्छा’ कहकर शीघ्र ही एक पेड़पर चढ़ गये और चारों ओर दृष्टि डालकर अपने बड़े भाईसे बोले— ॥ ७ ॥
पश्यामि बहुलान् राजन् वृक्षानुदकसंश्रयान् ।
सारसानां च निर्ह्रादमत्रोदकमसंशयम् ॥ ८ ॥
‘राजन्! मैं ऐसे बहुतेरे वृक्ष देख रहा हूँ, जो जलके किनारे ही होते हैं। सारसोंकी आवाज भी सुनायी देती है; अतः निःसंदेह यहाँ आस-पास ही कोई जलाशय है’ ॥ ८ ॥
ततोऽब्रवीत् सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
गच्छ सौम्य ततः शीघ्रं तूणैः पानीयमानय ॥ ९ ॥
तब सत्यका पालन करनेवाले कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने नकुलसे कहा—‘सौम्य! शीघ्र जाओ और तरकसोंमें पानी भर लाओ’ ॥ ९ ॥
नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा भ्रातुर्ज्येष्ठस्य शासनात् ।
प्राद्रवद् यत्र पानीयं शीघ्रं चैवान्वपद्यत ॥ १० ॥
नकुल ‘बहुत अच्छा’ कहकर बड़े भाईकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक गये और जहाँ जलाशय था, वहाँ तुरंत पहुँच गये ॥ १० ॥
स दृष्ट्वा विमलं तोयं सारसैः परिवारितम् ।
पातुकामस्ततो वाचमन्तरिक्षात् स शुश्रुवे ॥ ११ ॥
वहाँ सारसोंसे घिरे हुए जलाशयका स्वच्छ जल देखकर नकुलको उसे पीनेकी इच्छा हुई। इतनेमें ही आकाशसे उनके कानोंमें एक स्पष्ट वाणी सुनायी दी ॥
यक्ष उवाच
मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः ।
प्रश्नानुक्त्वा तु माद्रेय ततः पिब हरस्व च ॥ १२ ॥
**यक्ष बोला—**तात! तुम इस सरोवरका पानी पीनेका साहस न करो। इसपर पहलेसे ही मेरा अधिकार हो चुका है। माद्रीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ ॥ १२ ॥
अनादृत्य तु तद् वाक्यं नकुलः सुपिपासितः । अपिबच्छीतलं तोयं पीत्वा च निपपात ह ॥ १३ ॥ नकुलकी प्यास बहुत बढ़ गयी थी। उन्होंने यक्षके कथनकी अवहेलना करके वहाँका शीतल जल पी लिया। पीते ही वे अचेत होकर गिर पड़े ॥ १३ ॥
चिरायमाणे नकुले कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अब्रवीद् भ्रातरं वीरं सहदेवमरिंदमम् ॥ १४ ॥ नकुलके लौटनेमें जब अधिक विलम्ब हो गया, तब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अपने शत्रुहन्ता वीर भ्राता सहदेवसे कहा— ॥ १४ ॥
भ्राता हि चिरयातो नः सहदेव तवाग्रजः । तथैवानय सोदर्यं पानीयं च त्वमानय ॥ १५ ॥ ‘सहदेव! हमारे अनुज और तुम्हारे अग्रज भ्राता नकुलको यहाँसे गये बहुत देर हो गयी। तुम जाकर अपने सहोदर भाईको बुला लाओ और पानी भी ले आओ’ ॥ १५ ॥
सहदेवस्तथेत्यक्त्वा तां दिशं प्रत्यपद्यत । ददर्श च हतं भूमौ भ्रातरं नकुलं तदा ॥ १६ ॥ तब सहदेव ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसी दिशाकी ओर चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा, भाई नकुल पृथ्वीपर मरे पड़े हैं ॥ १६ ॥
भ्रातृशोकाभिसंतप्तस्तृषया च प्रपीडितः । अभिदुद्राव पानीयं ततो वागभ्यभाषत ॥ १७ ॥ भाईके शोकसे उनका हृदय संतप्त हो उठा। साथ ही प्याससे भी वे बहुत कष्ट पा रहे थे; अतः पानीकी ओर दौड़े। उसी समय आकाशवाणी बोल उठी— ॥
मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा यथाकामं पिबस्व च हरस्व च ॥ १८ ॥ ‘तात! पानी पीनेका साहस न करो। यहाँ पहलेसे ही मेरा अधिकार हो चुका है। तुम पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर इच्छानुसार जल पीओ और साथ ले भी जाओ’ ॥ १८ ॥
अनादृत्य तु तद् वाक्यं सहदेवः पिपासितः । अपिबच्छीतलं तोयं पीत्वा च निपपात ह ॥ १९ ॥ प्यासे सहदेव उस वचनकी अवहेलना करके वहाँका ठंडा जल पीने लगे एवं पीते ही अचेत होकर गिर पड़े ॥ १९ ॥
अथाब्रवीत् स विजयं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भ्रातरौ ते चिरगतौ बीभत्सो शत्रुकर्शन ॥ २० ॥ तदनन्तर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने अर्जुनसे कहा—‘शत्रुनाशन बीभत्सो! तुम्हारे दोनों भाइयोंको गये बहुत देर हो गयी ॥ २० ॥
तौ चैवानय भद्रं ते पानीयं च त्वमानय । त्वं हि नस्तात सर्वेषां दुःखितानामपाश्रयः ॥ २१ ॥ ‘तुम्हारा कल्याण हो। तुम उन दोनोंको बुला लाओ और साथ ही पानी भी ले आओ। तात! तुम्हीं हम सब दुःखी बन्धुओंके सहारे हो’ ॥ २१ ॥ एवमुक्तो गुडाकेशः प्रगृह्य सशरं धनुः । आमुक्तखड्गो मेधावी तत् सरः प्रत्यपद्यत ॥ २२ ॥ युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर निद्राविजयी बुद्धिमान् अर्जुन धनुष-बाण और खड्ग लिये उस सरोवरके तटपर गये ॥ २२ ॥ ततः पुरुषशार्दूलौ पानीयहरणे गतौ । तौ ददर्श हतौ तत्र भ्रातरौ श्वेतवाहनः ॥ २३ ॥ श्वेतवाहन अर्जुनने जल लानेके लिये गये हुए उन दोनों पुरुषसिंह भाइयोंको वहाँ मरे हुए देखा ॥ २३ ॥ प्रसुप्ताविव तौ दृष्ट्वा नरसिंहः सुदुःखितः । धनुरुद्यम्य कौन्तेयो व्यलोकयत तद् वनम् ॥ २४ ॥ दोनोंको प्रगाढ़ निद्रामें सोये हुएकी भाँति देखकर मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी अर्जुनको बहुत दुःख हुआ। उन्होंने धनुष उठाकर उस वनका अच्छी तरह निरीक्षण किया ॥ २४ ॥ नापश्यत् तत्र किञ्चित् स भूतम्तस्मिन् महावने । सव्यसाची ततः श्रान्तः पानीयं सोऽभ्यधावत ॥ २५ ॥ जब उस विशाल वनमें उन्हें कोई भी हिंसक प्राणी नहीं दिखायी दिया, तब सव्यसाची अर्जुन थककर पानीकी ओर दौड़े ॥ २५ ॥ अभिधावंस्ततो वाक्यमन्तरिक्षात् स शुश्रुवे । किमासीदसि पानीयं नैतच्छक्यं बलात् त्वया ॥ २६ ॥ कौन्तेय यदि प्रश्नांस्तान् मयोक्तान् प्रतिपत्स्यसे । ततः पास्यसि पानीयं हरिष्यसि च भारत ॥ २७ ॥ दौड़ते समय उन्हें आकाशकी ओरसे आती हुई वाणी सुनायी दी—‘कुन्तीनन्दन! क्यों पानीके निकट जा रहे हो? तुम जबरदस्ती यह जल नहीं पी सकते। भारत! यदि मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे सको, तो यहाँका पानी पीओ और साथ ले भी जाओ’ ॥ २६-२७ ॥ वारितस्त्वब्रवीत् पार्थो दृश्यमानो निवारय । यावद् बाणैर्विनिर्भिन्नः पुनर्नैवं वदिष्यसि ॥ २८ ॥ इस प्रकार रोके जानेपर अर्जुनने कहा—‘जरा सामने आकर रोको। सामने आते ही बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े हो जानेपर फिर तुम इस प्रकार नहीं बोल पाओगे’ ॥ २८ ॥ एवमुक्त्वा ततः पार्थः शरैरस्त्रानुमन्त्रितैः ।
प्रववर्ष दिशः कृत्स्नाः शब्दवेधं च दर्शयन् ॥ २९ ॥ ऐसा कहकर अर्जुनने अपनी शब्दवेध-कलाका परिचय देते हुए दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंकी सब ओर झड़ी लगा दी ॥ २९ ॥
कर्णिनालीकनाराचानुत्सृजन् भरतर्षभ । स त्वमोघानिषून् मुक्त्वा तृष्णयाभिप्रपीडितः ॥ ३० ॥ अनेकैरिषुसङ्घातैरन्तरिक्षे ववर्ष ह । भरतश्रेष्ठ जनमेजय! अर्जुन उस समय कर्णि, नालीक तथा नाराच आदि बाणोंकी वर्षा कर रहे थे। प्याससे पीड़ित हुए अर्जुनने कितने ही अमोघ बाणोंका प्रयोग करके आकाशमें भी कई बार बाण-समूहकी वर्षा की ॥ ३० १/२ ॥
यक्ष उवाच
किं विघातेन ते पार्थ प्रश्नानुक्त्वा ततः पिब ॥ ३१ ॥ अनुक्त्वा च पिबन् प्रश्नान् पीत्वैव न भविष्यसि । यक्ष बोला—पार्थ! इस प्रकार प्राणियोंपर आघात करनेसे क्या लाभ? पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, फिर जल पीओ। यदि तुम प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही यहाँका जल पीओगे, तो पीते ही मर जाओगे ॥ ३१ १/२ ॥
एवमुक्तस्ततः पार्थः सव्यसाची धनंजयः ॥ ३२ ॥ अवज्ञायैव तां वाचं पीत्वैव निपपात ह । उसके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र सव्यसाची धनंजय उसके वचनोंकी अवहेलना करके जल पीने लगे और पीते ही अचेत होकर गिर पड़े ॥ ३२ १/२ ॥
अथाब्रवीद् भीमसेनं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३३ ॥ नकुलः सहदेवश्च बीभत्सुश्च परंतप । चिरं गतास्तोयहेतोर्न चागच्छन्ति भारत ॥ ३४ ॥ तांश्चैवानय भद्रं ते पानीयं च त्वमानय । तब कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भीमसेनसे कहा—'परंतप! भरतनन्दन! नकुल, सहदेव और अर्जुनको पानीके लिये गये बहुत देर हो गयी। वे अभीतक नहीं आ रहे हैं। तुम्हारा कल्याण हो। तुम जाकर उन्हें बुला लाओ और पानी भी ले आओ' ॥ ३३-३४ १/२ ॥
भीमसेनस्तथेत्युक्त्वा तं देशं प्रत्यपद्यत ॥ ३५ ॥ यत्र ते पुरुषव्याघ्रा भ्रातरोऽस्य निपातिताः । तान् दृष्ट्वा दुःखितो भीमस्तृषया च प्रपीडितः ॥ ३६ ॥ तब भीमसेन 'बहुत अच्छा' कहकर उस स्थान-पर गये, जहाँ वे पुरुषसिंह तीनों भाई पृथ्वीपर पड़े थे। उन्हें उस अवस्थामें देखकर भीमसेनको बड़ा दुःख हुआ। इधर प्यास भी उन्हें बहुत कष्ट दे रही थी ॥
अमन्यत महाबाहुः कर्म तद् यक्षरक्षसाम् । स चिन्तयामास तदा योद्धव्यं ध्रुवमद्य वै ॥ ३७ ॥ पास्यामि तावत् पानीयमिति पार्थो वृकोदरः । ततोऽभ्यधावत् पानीयं पिपासुः पुरुषर्षभः ॥ ३८ ॥ महाबाहु भीमसेनने मन-ही-मन यह निश्चय किया कि 'यह यक्षों तथा राक्षसोंका काम है।' फिर उन्होंने सोचा; 'आज निश्चय ही मुझे शत्रुके साथ युद्ध करना पड़ेगा, अतः पहले जल तो पी लूँ।' ऐसा निश्चय करके प्यासे नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार भीमसेन जलकी ओर दौड़े ॥
यक्ष उवाच
मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च ॥ ३९ ॥ **यक्ष बोला—**तात! पानी पीनेका साहस न करना। इस जलपर पहलेसे ही मेरा अधिकार स्थापित हो चुका है। कुन्तीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ ॥ ३९ ॥
एवमुक्तस्तदा भीमो यक्षेणामिततेजसा । अनुक्त्वैव तु तान् प्रश्नान् पीत्वैव निपपात ह ॥ ४० ॥ अमिततेजस्वी यक्षके ऐसा कहनेपर भी भीमसेन उन प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही जल पीने लगे और पीते ही मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ ४० ॥
ततः कुन्तीसुतो राजा प्रचिन्त्य पुरुषर्षभः । समुत्थाय महाबाहुर्दह्यमानेन चेतसा ॥ ४१ ॥ व्यपेतजननिर्घोषं प्रविवेश महावनम् । रुरुभिश्च वराहेश्च पक्षिभिश्च निषेवितम् ॥ ४२ ॥ तदनन्तर कुन्तीपुत्र पुरुषरत्न महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत देरतक सोच-विचार करके उठे और जलते हुए हृदयसे उन्होंने उस विशाल वनमें प्रवेश किया, जहाँ मनुष्योंकी आवाजतक नहीं सुनायी देती थी। वहाँ रुरु मृग, वराह तथा पक्षियोंके समुदाय ही निवास करते थे ॥ ४१-४२ ॥
नीलभास्वरवर्णैश्च पादपैरुपशोभितम् । भ्रमरैरुपगीतं च पक्षिभिश्च महायशाः ॥ ४३ ॥ नीले रंगके चमकीले वृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे। भ्रमरोंके गुंजन और विहंगोंके कलरवसे वह वनप्रान्त शब्दायमान हो रहा था ॥ ४३ ॥
स गच्छन् कानने तस्मिन् हेमजालपरिष्कृतम् । ददर्श तत् सरः श्रीमान् विश्वकर्मकृतं यथा ॥ ४४ ॥