भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2082

तौ चैवानय भद्रं ते पानीयं च त्वमानय । त्वं हि नस्तात सर्वेषां दुःखितानामपाश्रयः ॥ २१ ॥ ‘तुम्हारा कल्याण हो। तुम उन दोनोंको बुला लाओ और साथ ही पानी भी ले आओ। तात! तुम्हीं हम सब दुःखी बन्धुओंके सहारे हो’ ॥ २१ ॥ एवमुक्तो गुडाकेशः प्रगृह्य सशरं धनुः । आमुक्तखड्गो मेधावी तत् सरः प्रत्यपद्यत ॥ २२ ॥ युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर निद्राविजयी बुद्धिमान् अर्जुन धनुष-बाण और खड्ग लिये उस सरोवरके तटपर गये ॥ २२ ॥ ततः पुरुषशार्दूलौ पानीयहरणे गतौ । तौ ददर्श हतौ तत्र भ्रातरौ श्वेतवाहनः ॥ २३ ॥ श्वेतवाहन अर्जुनने जल लानेके लिये गये हुए उन दोनों पुरुषसिंह भाइयोंको वहाँ मरे हुए देखा ॥ २३ ॥ प्रसुप्ताविव तौ दृष्ट्वा नरसिंहः सुदुःखितः । धनुरुद्यम्य कौन्तेयो व्यलोकयत तद् वनम् ॥ २४ ॥ दोनोंको प्रगाढ़ निद्रामें सोये हुएकी भाँति देखकर मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी अर्जुनको बहुत दुःख हुआ। उन्होंने धनुष उठाकर उस वनका अच्छी तरह निरीक्षण किया ॥ २४ ॥ नापश्यत् तत्र किञ्चित् स भूतम्तस्मिन् महावने । सव्यसाची ततः श्रान्तः पानीयं सोऽभ्यधावत ॥ २५ ॥ जब उस विशाल वनमें उन्हें कोई भी हिंसक प्राणी नहीं दिखायी दिया, तब सव्यसाची अर्जुन थककर पानीकी ओर दौड़े ॥ २५ ॥ अभिधावंस्ततो वाक्यमन्तरिक्षात् स शुश्रुवे । किमासीदसि पानीयं नैतच्छक्यं बलात् त्वया ॥ २६ ॥ कौन्तेय यदि प्रश्नांस्तान् मयोक्तान् प्रतिपत्स्यसे । ततः पास्यसि पानीयं हरिष्यसि च भारत ॥ २७ ॥ दौड़ते समय उन्हें आकाशकी ओरसे आती हुई वाणी सुनायी दी—‘कुन्तीनन्दन! क्यों पानीके निकट जा रहे हो? तुम जबरदस्ती यह जल नहीं पी सकते। भारत! यदि मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे सको, तो यहाँका पानी पीओ और साथ ले भी जाओ’ ॥ २६-२७ ॥ वारितस्त्वब्रवीत् पार्थो दृश्यमानो निवारय । यावद् बाणैर्विनिर्भिन्नः पुनर्नैवं वदिष्यसि ॥ २८ ॥ इस प्रकार रोके जानेपर अर्जुनने कहा—‘जरा सामने आकर रोको। सामने आते ही बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े हो जानेपर फिर तुम इस प्रकार नहीं बोल पाओगे’ ॥ २८ ॥ एवमुक्त्वा ततः पार्थः शरैरस्त्रानुमन्त्रितैः ।