भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2081

अनादृत्य तु तद् वाक्यं नकुलः सुपिपासितः । अपिबच्छीतलं तोयं पीत्वा च निपपात ह ॥ १३ ॥ नकुलकी प्यास बहुत बढ़ गयी थी। उन्होंने यक्षके कथनकी अवहेलना करके वहाँका शीतल जल पी लिया। पीते ही वे अचेत होकर गिर पड़े ॥ १३ ॥

चिरायमाणे नकुले कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अब्रवीद् भ्रातरं वीरं सहदेवमरिंदमम् ॥ १४ ॥ नकुलके लौटनेमें जब अधिक विलम्ब हो गया, तब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अपने शत्रुहन्ता वीर भ्राता सहदेवसे कहा— ॥ १४ ॥

भ्राता हि चिरयातो नः सहदेव तवाग्रजः । तथैवानय सोदर्यं पानीयं च त्वमानय ॥ १५ ॥ ‘सहदेव! हमारे अनुज और तुम्हारे अग्रज भ्राता नकुलको यहाँसे गये बहुत देर हो गयी। तुम जाकर अपने सहोदर भाईको बुला लाओ और पानी भी ले आओ’ ॥ १५ ॥

सहदेवस्तथेत्यक्त्वा तां दिशं प्रत्यपद्यत । ददर्श च हतं भूमौ भ्रातरं नकुलं तदा ॥ १६ ॥ तब सहदेव ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसी दिशाकी ओर चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा, भाई नकुल पृथ्वीपर मरे पड़े हैं ॥ १६ ॥

भ्रातृशोकाभिसंतप्तस्तृषया च प्रपीडितः । अभिदुद्राव पानीयं ततो वागभ्यभाषत ॥ १७ ॥ भाईके शोकसे उनका हृदय संतप्त हो उठा। साथ ही प्याससे भी वे बहुत कष्ट पा रहे थे; अतः पानीकी ओर दौड़े। उसी समय आकाशवाणी बोल उठी— ॥

मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा यथाकामं पिबस्व च हरस्व च ॥ १८ ॥ ‘तात! पानी पीनेका साहस न करो। यहाँ पहलेसे ही मेरा अधिकार हो चुका है। तुम पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर इच्छानुसार जल पीओ और साथ ले भी जाओ’ ॥ १८ ॥

अनादृत्य तु तद् वाक्यं सहदेवः पिपासितः । अपिबच्छीतलं तोयं पीत्वा च निपपात ह ॥ १९ ॥ प्यासे सहदेव उस वचनकी अवहेलना करके वहाँका ठंडा जल पीने लगे एवं पीते ही अचेत होकर गिर पड़े ॥ १९ ॥

अथाब्रवीत् स विजयं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भ्रातरौ ते चिरगतौ बीभत्सो शत्रुकर्शन ॥ २० ॥ तदनन्तर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने अर्जुनसे कहा—‘शत्रुनाशन बीभत्सो! तुम्हारे दोनों भाइयोंको गये बहुत देर हो गयी ॥ २० ॥