महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2083, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रववर्ष दिशः कृत्स्नाः शब्दवेधं च दर्शयन् ॥ २९ ॥ ऐसा कहकर अर्जुनने अपनी शब्दवेध-कलाका परिचय देते हुए दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंकी सब ओर झड़ी लगा दी ॥ २९ ॥
कर्णिनालीकनाराचानुत्सृजन् भरतर्षभ । स त्वमोघानिषून् मुक्त्वा तृष्णयाभिप्रपीडितः ॥ ३० ॥ अनेकैरिषुसङ्घातैरन्तरिक्षे ववर्ष ह । भरतश्रेष्ठ जनमेजय! अर्जुन उस समय कर्णि, नालीक तथा नाराच आदि बाणोंकी वर्षा कर रहे थे। प्याससे पीड़ित हुए अर्जुनने कितने ही अमोघ बाणोंका प्रयोग करके आकाशमें भी कई बार बाण-समूहकी वर्षा की ॥ ३० १/२ ॥
यक्ष उवाच
किं विघातेन ते पार्थ प्रश्नानुक्त्वा ततः पिब ॥ ३१ ॥ अनुक्त्वा च पिबन् प्रश्नान् पीत्वैव न भविष्यसि । यक्ष बोला—पार्थ! इस प्रकार प्राणियोंपर आघात करनेसे क्या लाभ? पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, फिर जल पीओ। यदि तुम प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही यहाँका जल पीओगे, तो पीते ही मर जाओगे ॥ ३१ १/२ ॥
एवमुक्तस्ततः पार्थः सव्यसाची धनंजयः ॥ ३२ ॥ अवज्ञायैव तां वाचं पीत्वैव निपपात ह । उसके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र सव्यसाची धनंजय उसके वचनोंकी अवहेलना करके जल पीने लगे और पीते ही अचेत होकर गिर पड़े ॥ ३२ १/२ ॥
अथाब्रवीद् भीमसेनं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३३ ॥ नकुलः सहदेवश्च बीभत्सुश्च परंतप । चिरं गतास्तोयहेतोर्न चागच्छन्ति भारत ॥ ३४ ॥ तांश्चैवानय भद्रं ते पानीयं च त्वमानय । तब कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भीमसेनसे कहा—'परंतप! भरतनन्दन! नकुल, सहदेव और अर्जुनको पानीके लिये गये बहुत देर हो गयी। वे अभीतक नहीं आ रहे हैं। तुम्हारा कल्याण हो। तुम जाकर उन्हें बुला लाओ और पानी भी ले आओ' ॥ ३३-३४ १/२ ॥
भीमसेनस्तथेत्युक्त्वा तं देशं प्रत्यपद्यत ॥ ३५ ॥ यत्र ते पुरुषव्याघ्रा भ्रातरोऽस्य निपातिताः । तान् दृष्ट्वा दुःखितो भीमस्तृषया च प्रपीडितः ॥ ३६ ॥ तब भीमसेन 'बहुत अच्छा' कहकर उस स्थान-पर गये, जहाँ वे पुरुषसिंह तीनों भाई पृथ्वीपर पड़े थे। उन्हें उस अवस्थामें देखकर भीमसेनको बड़ा दुःख हुआ। इधर प्यास भी उन्हें बहुत कष्ट दे रही थी ॥