महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2084, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअमन्यत महाबाहुः कर्म तद् यक्षरक्षसाम् । स चिन्तयामास तदा योद्धव्यं ध्रुवमद्य वै ॥ ३७ ॥ पास्यामि तावत् पानीयमिति पार्थो वृकोदरः । ततोऽभ्यधावत् पानीयं पिपासुः पुरुषर्षभः ॥ ३८ ॥ महाबाहु भीमसेनने मन-ही-मन यह निश्चय किया कि 'यह यक्षों तथा राक्षसोंका काम है।' फिर उन्होंने सोचा; 'आज निश्चय ही मुझे शत्रुके साथ युद्ध करना पड़ेगा, अतः पहले जल तो पी लूँ।' ऐसा निश्चय करके प्यासे नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार भीमसेन जलकी ओर दौड़े ॥
यक्ष उवाच
मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च ॥ ३९ ॥ **यक्ष बोला—**तात! पानी पीनेका साहस न करना। इस जलपर पहलेसे ही मेरा अधिकार स्थापित हो चुका है। कुन्तीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ ॥ ३९ ॥
एवमुक्तस्तदा भीमो यक्षेणामिततेजसा । अनुक्त्वैव तु तान् प्रश्नान् पीत्वैव निपपात ह ॥ ४० ॥ अमिततेजस्वी यक्षके ऐसा कहनेपर भी भीमसेन उन प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही जल पीने लगे और पीते ही मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ ४० ॥
ततः कुन्तीसुतो राजा प्रचिन्त्य पुरुषर्षभः । समुत्थाय महाबाहुर्दह्यमानेन चेतसा ॥ ४१ ॥ व्यपेतजननिर्घोषं प्रविवेश महावनम् । रुरुभिश्च वराहेश्च पक्षिभिश्च निषेवितम् ॥ ४२ ॥ तदनन्तर कुन्तीपुत्र पुरुषरत्न महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत देरतक सोच-विचार करके उठे और जलते हुए हृदयसे उन्होंने उस विशाल वनमें प्रवेश किया, जहाँ मनुष्योंकी आवाजतक नहीं सुनायी देती थी। वहाँ रुरु मृग, वराह तथा पक्षियोंके समुदाय ही निवास करते थे ॥ ४१-४२ ॥
नीलभास्वरवर्णैश्च पादपैरुपशोभितम् । भ्रमरैरुपगीतं च पक्षिभिश्च महायशाः ॥ ४३ ॥ नीले रंगके चमकीले वृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे। भ्रमरोंके गुंजन और विहंगोंके कलरवसे वह वनप्रान्त शब्दायमान हो रहा था ॥ ४३ ॥
स गच्छन् कानने तस्मिन् हेमजालपरिष्कृतम् । ददर्श तत् सरः श्रीमान् विश्वकर्मकृतं यथा ॥ ४४ ॥