भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2069

अमोघां शक्तिमभ्येत्य वव्रे सम्पूर्णमानसः ॥ २० ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब कर्ण अत्यन्त प्रसन्न होकर देवराज इन्द्रके पास गया और सफलमनोरथ होकर उसने उनकी अमोघ शक्ति माँगी ॥ २० ॥

कर्ण उवाच

वर्मणा कुण्डलाभ्यां च शक्तिं मे देहि वासव । अमोघां शत्रुसंघानां घातिनीं पृतनामुखे ॥ २१ ॥ **कर्ण बोला—**वासव! मेरे कवच और कुण्डल लेकर आप मुझे अपनी वह अमोघ शक्ति प्रदान कीजिये जो सेनाके अग्रभागमें शत्रुसमुदायका संहार करनेवाली है ॥

ततः संचिन्त्य मनसा मुहूर्तमिव वासवः । शक्त्यर्थं पृथिवीपाल कर्णं वाक्यमथाब्रवीत् ॥ २२ ॥ राजन्! तब इन्द्रने शक्तिके विषयमें दो घड़ी-तक मन-ही-मन विचार करके कर्णसे इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥

कुण्डले मे प्रयच्छस्व वर्म चैव शरीरजम् । गृहाण कर्ण शक्तिं त्वमनेन समयेन च ॥ २३ ॥ ‘कर्ण! तुम मुझे अपने दोनों कुण्डल और सहज कवच दे दो और मेरी यह शक्ति ग्रहण कर लो। इसी शर्तके अनुसार हमलोगोंमें इन वस्तुओंका विनिमय (बदला) हो जाय ॥ २३ ॥

अमोघा हन्ति शतशः शत्रून् मम करच्युता । पुनश्च पाणिमभ्येति मम दैत्यान् विनिघ्नतः ॥ २४ ॥ ‘सूतनन्दन! दैत्योंका संहार करते समय मेरे हाथसे छूटनेपर यह अमोघ शक्ति सैकड़ों शत्रुओंको मार देती है और पुनः मेरे हाथमें चली आती है’ ॥ २४ ॥

सेयं तव करप्राप्ता हत्वैकं रिपुमूर्जितम् । गर्जन्तं प्रतपन्तं च मामेवैष्यति सूतज ॥ २५ ॥ ‘वही शक्ति तुम्हारे हाथमें जाकर किसी एक तेजस्वी, ओजस्वी, प्रतापी तथा गर्जना करनेवाले शत्रुको मारकर पुनः मेरे ही पास आ जायगी’ ॥ २५ ॥

कर्ण उवाच

एकमेवाहमिच्छामि रिपुं हन्तुं महाहवे । गर्जन्तं प्रतपन्तं च यतो मम भयं भवेत् ॥ २६ ॥ **कर्ण बोला—**देवेन्द्र! मैं महासमरमें अपने एक ही शत्रुको इसके द्वारा मारना चाहता हूँ जो बहुत गर्जना करनेवाला और प्रतापी है, तथा जिससे मुझे सदा भय बना रहता है ॥ २६ ॥

इन्द्र उवाच