भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2070

एकं हनिष्यसि रिपुं गर्जन्तं बलिनं रणे । त्वं तु यं प्रार्थयस्येकं रक्ष्यते स महात्मना ॥ २७ ॥ यमाहुर्वेदविद्वांसो वरार्हमपराजितम् । नारायणमचिन्त्यं च तेन कृष्णेन रक्ष्यते ॥ २८ ॥ इन्द्रने कहा—कर्ण! तुम (इस शक्तिसे) रणभूमिमें गर्जना करनेवाले किसी एक बलवान् शत्रुको मार सकोगे, परंतु इस समय तुम जिस एक शत्रुको लक्ष्य करके यह अमोघ शक्ति माँग रहे हो वह तो उन परमात्माद्वारा सुरक्षित है, जिन्हें वेदवेत्ता विद्वान् पुरुषोत्तम अपराजित, हरि तथा अचिन्त्यस्वरूप नारायण कहते हैं। वे स्वयं श्रीकृष्ण हैं जिनके द्वारा उस वीरकी रक्षा हो रही है ॥ २७-२८ ॥

कर्ण उवाच

एवमप्यस्तु भगवन्नेकवीरवधे मम । अमोघां देहि मे शक्तिं यथा हन्यां प्रतापिनम् ॥ २९ ॥ कर्ण बोला—भगवन्! ऐसा ही हो। तो भी आप एक वीरके वधके लिये मुझे अपनी अमोघ शक्ति दे दीजिये, जिससे मैं अपने प्रतापी शत्रु का वध कर सकूँ ॥ २९ ॥ उत्कृत्य तु प्रदास्यामि कुण्डले कवचं च ते । निकृत्तेषु तु गात्रेषु न मे बीभत्सता भवेत् ॥ ३० ॥ मैं आपको अपने शरीरसे उधेड़कर कवच और कुण्डल तो दे दूँगा; परंतु उस समय मेरे अंगोंके कट जानेपर मेरा स्वरूप बीभत्स न होना चाहिये ॥ ३० ॥

इन्द्र उवाच

न ते बीभत्सता कर्ण भविष्यति कथञ्चन । व्रणश्चैव न गात्रेषु यस्त्वं नानृतमिच्छसि ॥ ३१ ॥ इन्द्रने कहा—कर्ण! तुम्हारा स्वरूप किसी प्रकार भी बीभत्स नहीं होगा। तुम्हारे अंगोंमें घावतक नहीं होगा; क्योंकि तुम असत्यकी इच्छा नहीं रखते हो ॥ ३१ ॥ यादृशस्ते पितुर्वर्णस्तेजश्च वदतां वर । तादृशेनैव वर्णेन त्वं कर्ण भविता पुनः ॥ ३२ ॥ विद्यमानेषु शस्त्रेषु यद्यमोघामसंशये । प्रमत्तो मोक्ष्यसे चापि त्वय्येवैषा पतिष्यति ॥ ३३ ॥ वक्ताओंमें श्रेष्ठ कर्ण! तुम्हारे पिताका जैसा वर्ण और तेज है, वैसे ही वर्ण और तेजसे तुम पुनः सम्पन्न हो जाओगे। जबतक तुम्हारे पास दूसरे शस्त्र रहें और प्राणसंकटकी परिस्थिति न आ जाय, तबतक तुम यदि प्रमादवश यह अमोघ शक्ति यों ही किसी शत्रुपर छोड़ दोगे तो यह उसे न मारकर तुम्हारे ही ऊपर आ पड़ेगी ॥ ३२-३३ ॥