भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2087

‘साधारण मनुष्योंकी बातें तथा उनकी प्रतिज्ञाएँ तो झूठी निकल जाती हैं; परंतु तुमलोगोंके सम्बन्धमें जो दिव्य वाणियाँ हुई थीं, वे कैसे मिथ्या हो सकती हैं? ।। ६ १/२ ।। देवाश्चापि यदावोचन् सूतके त्वां धनंजय ।। ७ ।। सहस्राक्षादनवरः कुन्ति पुत्रस्तवेति वै । उत्तरे पारियात्रे च जगुर्भूतानि सर्वशः ।। ८ ।। विप्रणष्टां श्रियं चैषामाहर्ता पुनरञ्जसा । नास्य जेता रणे कश्चिदजेता नैष कस्यचित् ।। १९ ।। “धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि ‘कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि ‘ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे। युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे'” ।। ७—९ ।। सोऽयं मृत्युवशं यातः कथं जिष्णुर्महाबलः । अयं ममाशां संहृत्य शेते भूमौ धनंजयः ।। १० ।। आश्रित्य यं वयं नाथ दुःखान्येतानि सेहिम । ‘वे ही महाबली अर्जुन आज मृत्युके अधीन कैसे हो गये? ये वे ही धनंजय मेरी आशालताको छिन्न-भिन्न करके धरतीपर पड़े हैं; जिन्हें अपना रक्षक बनाकर और जिनका ही भारी भरोसा करके हमलोग ये सारे दुःख सहते आये हैं ।। १० १/२ ।। रणे प्रमत्तौ वीरौ च सदा शत्रुनिबर्हणौ ।। ११ ।। कथं रिपुवशं यातौ कुन्तीपुत्रौ महाबलौ । यौ सर्वास्त्राप्रतिहतौ भीमसेनधनंजयौ ।। १२ ।। ‘कुन्तीके ये दोनों महाबली पुत्र भीमसेन और अर्जुन—जो किसी भी अस्त्रसे प्रतिहत न होनेवाले, समरांगणमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले तथा सदैव शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर थे, वे आज सहसा शत्रुके अधीन कैसे हो गये? ।। ११-१२ ।। अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम दुर्हृदः । यमौ यदेतौ दृष्ट्वाद्य पतितौ नावदीर्यते ।। १३ ।। ‘मुझ दुष्टका हृदय निश्चय ही पत्थर और लोहेका बना हुआ है, जो कि आज इन दोनों भाई नकुल और सहदेवको धरतीपर पड़ा देख विदीर्ण नहीं हो जाता है ।। १३ ।। शास्त्रज्ञा देशकालज्ञास्तपोयुक्ताः क्रियान्विताः । अकृत्वा सदृशं कर्म किं शेध्वं पुरुषर्षभाः ।। १४ ।। ‘पुरुषसिंह बन्धुओ! तुमलोग शास्त्रोंके विद्वान् देशकालको समझनेवाले, तपस्वी और कर्मठ वीर थे। अपने योग्य पराक्रम किये बिना ही तुमलोग (प्राणहीन हो) कैसे सो रहे हो? ।। १४ ।।