भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2091

यक्षोऽहमस्मि भद्रं ते नास्मि पक्षी जलेचरः ।। ३६ ।। मयैते निहताः सर्वे भ्रातरस्ते महौजसः । यक्षने कहा— तुम्हारा कल्याण हो। मैं जलचर पक्षी नहीं हूँ, यक्ष हूँ। तुम्हारे ये सभी महान् तेजस्वी भाई मेरे द्वारा ही मारे गये हैं ।। ३६ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततस्तामशिवां श्रुत्वा वाचं स परुषाक्षराम् ।। ३७ ।। यक्षस्य ब्रुवतो राजन्नुपक्रम्य तदा स्थितः । विरूपाक्षं महाकायं यक्षं तालसमुच्छ्रयम् ।। ३८ ।। ज्वलनार्कप्रतीकाशमधृष्यं पर्वतोपमम् । वृक्षमाश्रित्य तिष्ठन्तं ददर्श भरतर्षभः ।। ३९ ।। मेघगम्भीरनादेन तर्जयन्तं महास्वनम् । वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! तत्पश्चात् उस समय इस प्रकार बोलनेवाले उस यक्षकी वह अमंगलमयी और कठोर वाणी सुनकर भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर उसके पास जाकर खड़े हो गये। उन्होंने देखा, एक विकट नेत्रोंवाला विशालकाय यक्ष वृक्षके ऊपर बैठा है। वह बड़ा ही दुर्धर्ष, ताड़के समान लंबा, अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी तथा पर्वतके समान ऊँचा है। वही अपनी मेघके समान गम्भीर नादयुक्त वाणीसे उन्हें फटकार रहा है। उसकी आवाज बहुत ऊँची है ।।

यक्ष उवाच

इमे ते भ्रातरो राजन् वार्यमाणा मयासकृत् ।। ४० ।। बलात् तोयं जिहीर्षन्तस्ततो वै मृदिता मया । न पेयमुदकं राजन् प्राणानिह परीप्सता ।। ४१ ।। पार्थ मा साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च ।। ४२ ।। यक्षने कहा— राजन्! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्ठिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है। कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ ।। ४०—४२ ।।

युधिष्ठिर उवाच

न चाहं कामये यक्ष तव पूर्वपरिग्रहम् । कामं नैतत् प्रशंसन्ति सन्तो हि पुरुषाः सदा ।। ४३ ।।