महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2090, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंन चेत् प्रश्नान् पृच्छतो व्याकरोषि ।। २९ ।।
यक्ष बोला—राजकुमार! मैं सेवार और मछली खानेवाला बगुला हूँ। मैंने ही तुम्हारे छोटे भाइयोंको यमलोक भेजा है; अतः मेरे पूछनेपर यदि तुम मेरे प्रश्नोंका उत्तर न दोगे, तो तुम भी यमलोकके पाँचवें अतिथि होओगे ।। २९ ।।
मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः ।
प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च ।। ३० ।।
तात! जल पीनेका साहस न करना। इसपर मेरा पहलेसे ही अधिकार हो गया है। कुन्तीकुमार! मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो और तब जल पीओ और ले भी जाओ ।। ३० ।।
युधिष्ठिर उवाच
रुद्राणां वा वसूनां वा मरुतां वा प्रधानभाक् ।
पृच्छामि को भवान् देवो नैतच्छकुनिना कृतम् ।। ३१ ।।
युधिष्ठिर बोले—मैं पूछता हूँ, तुम रुद्रों, वसुओं अथवा मरुद्गणोंमेंसे कौन-से प्रधान देवता हो? बताओ। यह काम किसी पक्षीका किया हुआ नहीं हो सकता? ।। ३१ ।।
हिमवान् पारियात्रश्च विन्ध्यो मलय एव च ।
चत्वारः पर्वताः केन पातिता भूरितेजसः ।। ३२ ।।
मेरे महातेजस्वी भाई हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्य तथा मलय—इन चारों पर्वतोंके समान हैं। इन्हें किसने मार गिराया है? ।। ३२ ।।
अतीव ते महत् कर्म कृतं च बलिनां वर ।
यान् न देवा न गन्धर्वा नासुराश्च न राक्षसाः ।। ३३ ।।
विषहेरन् महायुद्धे कृतं ते तन्महाद्भुतम् ।
न ते जानामि यत् कार्यं नाभिजानामि काङ्क्षितम् ।। ३४ ।।
बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर! तुमने यह अत्यन्त महान् कर्म किया है। बड़े-बड़े युद्धोंमें जिन वीरों-(के प्रभाव)-को देवता, गन्धर्व, असुर तथा राक्षस भी नहीं सह सकते थे, उन्हें गिराकर तुमने परम अद्भुत पराक्रम किया है। तुम्हारा कार्य क्या है? यह मैं नहीं जानता। तुम क्या चाहते हो? इसका भी मुझे पता नहीं है ।।
कौतूहलं महज्जातं साध्वसं चागतं मम ।
येनास्म्युद्विग्नहृदयः समुत्पन्नशिरोज्वरः ।। ३५ ।।
पृच्छामि भगवंस्तस्मात् को भवानिह तिष्ठति ।
तुम्हारे विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो गया है। तुमसे मुझे कुछ भय भी लगने लगा है, जिससे मेरा हृदय उद्विग्न हो उठा है और सिरमें संताप होने लगा है। अतः भगवन्! मैं विनयपूर्वक पूछता हूँ, तुम यहाँ कौन विराज रहे हो? ।। ३५ ।।
यक्ष उवाच