महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2089, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंहो ।। २२ ।। गान्धारराजरचितं सततं जिह्मबुद्धिना । यस्य कार्यमकार्यं वा सममेव भवत्युत ।। २३ ।। कस्तस्य विश्वसेद् वीरो दुष्कृतेरकृतात्मनः । अथवा पुरुषैर्गूढैः प्रयोगोऽयं दुरात्मनः ।। २४ ।। 'अथवा जिसकी बुद्धिमें सदा कुटिलता ही निवास करती है, उस गान्धारराज शकुनिकी भी यह करतूत हो सकती है। जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों बराबर हैं, उस अजितात्मा पापी शकुनिपर कौन वीर पुरुष विश्वास कर सकता है? अथवा गुप्तरूपसे नियुक्त किये हुए पुरुषोंद्वारा दुरात्मा दुर्योधनने ही यह हिंसात्मक प्रयोग किया होगा' ।। २३-२४ ।।
भवेदिति महाबुद्धिर्बहुधा तदचिन्तयत् । तस्यासीन्न विषेणेदमुदकं दूषितं यथा ।। २५ ।। इस प्रकार परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर भाँति-भाँतिकी चिन्ता करने लगे। (परीक्षा करनेपर) उन्हें इस बातका निश्चय हो गया था कि इस सरोवरके जलमें जहर नहीं मिलाया गया है ।। २५ ।।
मृतानामपि चैतेषां विकृतं नैव जायते । मुखवर्णः प्रसन्ना मे भ्रातॄणामित्यचिन्तयत् ।। २६ ।। 'क्योंकि मर जानेपर भी मेरे इन भाइयोंके शरीरमें कोई विकृति नहीं उत्पन्न हुई है। अब भी मेरे भाइयोंके मुखकी कान्ति प्रसन्न है।' इस तरह वे सोच-विचारमें ही डूबे रहे ।। २६ ।।
एकैकशश्चौघबलानिमान् पुरुषसत्तमान् । कोऽन्यः प्रतिसमासेत कालान्तकयमादृते ।। २७ ।। 'मेरे इन पुरुषरत्न भाइयोंमेंसे प्रत्येकके शरीरमें बलका अगाध सिन्धु लहराता था। आयु पूर्ण होनेपर सबका अन्त कर देनेवाले यमराजके सिवा दूसरा कौन इनसे भिड़ सकता था?' ।। २७ ।।
एतेन व्यवसायेन तत् तोयं व्यवगाढवान् । गाहमानश्च तत् तोयमन्तरिक्षात् स शुश्रुवे ।। २८ ।। इस प्रकार निश्चय करके युधिष्ठिर जलमें उतरे। पानीमें प्रवेश करते ही उनके कानोंमें आकाशवाणी सुनायी दी ।। २८ ।।
यक्ष उवाच
अहं बकः शैवलमत्स्यभक्षो नीता मया प्रेतवशं तवानुजाः । त्वं पञ्चमो भविता राजपुत्र