महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुधिष्ठिर उवाच पुत्र आत्मा मनुष्यस्य भार्या दैवकृतः सखा । उपजीवनं च पर्जन्यो दानमस्य परायणम् ॥ ७२ ॥ युधिष्ठिर बोले— पुत्र मनुष्यकी आत्मा है, स्त्री इसकी दैवकृत सहचरी है, मेघ उपजीवन है और दान इसका परम आश्रय है ॥ ७२ ॥
यक्ष उवाच धन्यानामुत्तमं किंस्विद् धनानां स्यात् किमुत्तमम् । लाभानामुत्तमं किं स्यात् सुखानां स्यात् किमुत्तमम् ॥ ७३ ॥ यक्षने पूछा— धन्यवादके योग्य पुरुषोंमें उत्तम गुण क्या है? धनोंमें उत्तम धन क्या है? लाभोंमें प्रधान लाभ क्या है? और सुखोंमें उत्तम सुख क्या है? ॥ ७३ ॥
युधिष्ठिर उवाच धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम् । लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा ॥ ७४ ॥ युधिष्ठिर बोले— धन्य पुरुषोंमें दक्षता ही उत्तम गुण है, धनोंमें शास्त्रज्ञान प्रधान है, लाभोंमें आरोग्य श्रेष्ठ है और सुखोंमें संतोष ही उत्तम सुख है ॥ ७४ ॥
यक्ष उवाच कश्च धर्मः परो लोके कश्च धर्मः सदाफलः । किं नयम्य न शोचन्ति कैश्च संधिर्न जीर्यते ॥ ७५ ॥ यक्षने पूछा— लोकमें श्रेष्ठ धर्म क्या है? नित्य फलवाला धर्म क्या है? किसको वशमें रखनेसे मनुष्य शोक नहीं करते? और किनके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती? ॥ ७५ ॥
युधिष्ठिर उवाच आनृशंस्यं परो धर्मस्त्रयीधर्मः सदाफलः । मनो यम्य न शोचन्ति संधिः सद्भिर्न जीर्यते ॥ ७६ ॥ युधिष्ठिर बोले— लोकमें दया श्रेष्ठ धर्म है, वेदोक्त धर्म नित्य फलवाला है, मनको वशमें रखनेसे मनुष्य शोक नहीं करते और सत्पुरुषोंके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती ॥ ७६ ॥
यक्ष उवाच किं नु हित्वा प्रियो भवति किं नु हित्वा न शोचति ।