भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2098

किं नु हित्वाऽर्थवान् भवति किं नु हित्वा सुखी भवेत् ॥ ७७ ॥ **यक्षने पूछा—**किस वस्तुको त्यागकर मनुष्य प्रिय होता है? किसको त्यागकर शोक नहीं करता? किसको त्यागकर वह अर्थवान् होता है? और किसको त्यागकर सुखी होता है? ॥ ७७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति । कामं हित्वाऽर्थवान् भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत् ॥ ७८ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**मानको त्याग देनेपर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोधको त्यागकर शोक नहीं करता, कामको त्यागकर वह अर्थवान् होता है और लोभको त्यागकर सुखी होता है ॥ ७८ ॥

यक्ष उवाच

किमर्थं ब्राह्मणे दानं किमर्थं नटनर्तके । किमर्थं चैव भृत्येषु किमर्थं चैव राजसु ॥ ७९ ॥ **यक्षने पूछा—**ब्राह्मणको किसलिये दान दिया जाता है? नट और नर्तकोंको क्यों दान देते हैं? सेवकोंको दान देनेका क्या प्रयोजन है? और राजाओंको क्यों दान दिया जाता है? ॥ ७९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

धर्मार्थं ब्राह्मणे दानं यशोऽर्थं नटनर्तके । भृत्येषु भरणार्थं वै भयार्थं चैव राजसु ॥ ८० ॥ **युधिष्ठिर बोले—**ब्राह्मणको धर्मके लिये दान दिया जाता है, नट-नर्तकोंको यशके लिये दान (धन) देते हैं, सेवकोंको उनके भरण-पोषणके लिये दान (वेतन) दिया जाता है और राजाओंको भयके कारण दान (कर) देते हैं ॥ ८० ॥

यक्ष उवाच

केनस्विदावृतो लोकः केनस्विन्न प्रकाशते । केन त्यजति मित्राणि केन स्वर्गं न गच्छति ॥ ८१ ॥ **यक्षने पूछा—**जगत् किस वस्तुसे ढका हुआ है? किसके कारण वह प्रकाशित नहीं होता? मनुष्य मित्रोंको किसलिये त्याग देता है? और स्वर्गमें किस कारण नहीं जाता? ॥ ८१ ॥