भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते । विविध सवारियाँ और नाना प्रकारके वस्त्रोंसे जिनका सत्कार होता था, उन्हीं भीमसेनको वनमें कष्ट उठाते देख शत्रुओंके प्रति आपका क्रोध प्रज्वलित क्यों नहीं होता? ।। २२ १/२ ।। अयं कुरून् रणे सर्वान् हन्तुमुत्सहते प्रभुः ।। २३ ।। त्वत्प्रतिज्ञां प्रतीक्षंस्तु सहतेऽयं वृकोदरः । ये शक्तिशाली भीमसेन युद्धमें समस्त कौरवोंको नष्ट कर देनेका उत्साह रखते हैं, परंतु आपकी प्रतिज्ञा-पूर्तिकी प्रतीक्षा करनेके कारण अबतक शत्रुओंके अपराधको सहन करते हैं ।। २३ १/२ ।। योऽर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विबाहुर्बहुबाहुना ।। २४ ।। शरावमर्दे शीघ्रत्वात् कालान्तकयमोपमः । यस्य शस्त्रप्रतापेन प्रणताः सर्वपार्थिवाः ।। २५ ।। यज्ञे तव महाराज ब्राह्मणानुपतस्थिरे । तमिमं पुरुषव्याघ्रं पूजितं देवदानवैः ।। २६ ।। ध्यायन्तमर्जुनं दृष्ट्वा कस्माद् राजन् न कुप्यसि । राजन्! आपके जो भाई अर्जुन दो ही भुजाओंसे युक्त होनेपर भी सहस्र भुजाओंसे विभूषित कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी हैं, बाण चलानेमें अत्यन्त फुर्ती रखनेके कारण जो शत्रुओंके लिये काल, अन्तक और यमके समान भयंकर हैं; महाराज! जिनके शस्त्रोंके प्रतापसे समस्त भूपाल नतमस्तक हो आपके यज्ञमें ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये उपस्थित हुए थे, उन्हीं इन देव-दानवपूजित पुरुषसिंह अर्जुनको चिन्तामग्न देखकर आप शत्रुओंपर क्रोध क्यों नहीं करते? ।। २४—२६ १/२ ।। दृष्ट्वा वनगतं पार्थमदुःखार्हं सुखोचितम् ।। २७ ।। न च ते वर्धते मन्युस्तेन मुह्यामि भारत । भारत! दुःखके अयोग्य और सुख भोगनेके योग्य अर्जुनको वनमें दुःख भोगते देखकर भी जो शत्रुओंके प्रति आपका क्रोध नहीं उमड़ता, इससे मैं मोहित हो रही हूँ ।। २७ १/२ ।। यो देवांश्च मनुष्यांश्च सर्पांश्चैकरथोऽजयत् ।। २८ ।। तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते । जिन्होंने एकमात्र रथकी सहायतासे देवताओं, मनुष्यों और नागोंपर विजय पायी है, उन्हीं अर्जुनको वनवासका दुःख भोगते देख आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ता? ।। २८ १/२ ।। यो यानैरुद्धताकारैरर्हयैर्नागैश्च संवृतः ।। २९ ।। प्रसह्य वित्तान्यादत्त पार्थिवेभ्यः परंतप । क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्चबाणशतानि यः ।। ३० ।।