भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 212

तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते । परंतप! जिन्होंने पराजित नरेशोंके दिये हुए अद्भुत आकारवाले रथों, घोड़ों और हाथियोंसे घिरे हुए कितने ही राजाओंसे बलपूर्वक धन लिये थे, जो एक ही वेगसे पाँच सौ बाणोंका प्रहार करते हैं, उन्हीं अर्जुनको वनवासका कष्ट भोगते देख शत्रुओंपर आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ता? ।। २९-३०½ ।। श्यामं बृहन्तं तरुणं चर्मिणामुत्तमं रणे ।। ३१ ।। नकुलं ते वने दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते । जो युद्धमें ढाल और तलवारसे लड़नेवाले वीरोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनकी कद ऊँची है तथा जो श्यामवर्णके तरुण हैं, उन्हीं नकुलको आज वनमें कष्ट उठाते देखकर आपको क्रोध क्यों नहीं होता? ।। ३१½ ।। दर्शनीयं च शूरं च माद्रीपुत्रं युधिष्ठिर ।। ३२ ।। सहदेवं वने दृष्ट्वा कस्मात् क्षमसि पार्थिव । महाराज युधिष्ठिर! माद्रीके परम सुन्दर पुत्र शूरवीर सहदेवको वनवासका दुःख भोगते देखकर आप शत्रुओंको क्षमा कैसे कर रहे हैं? ।। ३२½ ।। नकुलं सहदेवं च दृष्ट्वा ते दुःखितावुभौ ।। ३३ ।। अदुःखार्हौ मनुष्येन्द्र कस्मान्मन्युर्न वर्धते । नरेन्द्र! नकुल और सहदेव दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं। इन दोनोंको आज दुःखी देखकर आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ रहा है? ।। ३३½ ।। द्रुपदस्य कुले जातां स्नुषां पाण्डोर्महात्मनः ।। ३४ ।। धृष्टद्युम्नस्य भगिनीं वीरपत्नीमनुव्रताम् । मां वै वनगतां दृष्ट्वा कस्मात् क्षमसि पार्थिव ।। ३५ ।। मैं द्रुपदके कुलमें उत्पन्न हुई महात्मा पाण्डुकी पुत्रवधू, वीर धृष्टद्युम्नकी बहिन तथा वीरशिरोमणि पाण्डवोंकी पतिव्रता पत्नी हूँ। महाराज! मुझे इस प्रकार वनमें कष्ट उठाती देखकर भी आप शत्रुओंके प्रति क्षमाभाव कैसे धारण करते हैं? ।। ३४-३५ ।। नूनं च तव वै नास्ति मन्युर्भरतसत्तम । यत् ते भ्रातॄंश्च मां चैव दृष्ट्वा न व्यथते मनः ।। ३६ ।। भरतश्रेष्ठ! निश्चय ही आपके हृदयमें क्रोध नहीं है, क्योंकि मुझे और अपने भाइयोंको भी कष्टमें पड़ा देख आपके मनमें व्यथा नहीं होती है! ।। ३६ ।। न निर्मन्युःक्षत्रियोऽस्ति लोके निर्वचनं स्मृतम् । तदद्य त्वयि पश्यामि क्षत्रिये विपरीतवत् ।। ३७ ।। संसारमें कोई भी क्षत्रिय क्रोधरहित नहीं होता, क्षत्रिय शब्दकी व्युत्पत्ति ही ऐसी है, जिससे उसका सक्रोध होना सूचित होता है।* परंतु आज आप-जैसे क्षत्रियमें मुझे यह