महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रोधका अभाव क्षत्रियत्वके विपरीत-सा दिखायी देता है ।। ३७ ।।
यो न दर्शयते तेजः क्षत्रियः काल आगते ।
सर्वभूतानि तं पार्थ सदा परिभवन्त्युत ।। ३८ ।।
कुन्तीनन्दन! जो क्षत्रिय समय आनेपर अपने प्रभावको नहीं दिखाता, उसका सब प्राणी सदा तिरस्कार करते हैं ।। ३८ ।।
तत् त्वया न क्षमा कार्या शत्रून् प्रति कथंचन ।
तेजसैव हि ते शक्या निहन्तुं नात्र संशयः ।। ३९ ।।
महाराज! आपको शत्रुओंके प्रति किसी प्रकार भी क्षमाभाव नहीं धारण करना चाहिये। तेजसे ही उन सबका वध किया जा सकता है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।। ३९ ।।
तथैव यः क्षमाकाले क्षत्रियो नोपशाम्यति ।
अप्रियः सर्वभूतानां सोऽमुत्रेह च नश्यति ।। ४० ।।
इसी प्रकार जो क्षत्रिय क्षमा करनेके योग्य समय आनेपर शान्त नहीं होता, वह सब प्राणियोंके लिये अप्रिय हो जाता है और इहलोक तथा परलोकमें भी उसका विनाश ही होता है ।। ४० ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीपरितापवाक्ये
सप्तविंशोऽध्यायः ।। २७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्रौपदीके अनुतापपूर्णवचनविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २७ ।।
* क्षरते इति क्षत्रम्—जो दुष्टोंका क्षरण—नाश करता है, वह क्षत्रिय है।