भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2118

धर्मानुगतया बुद्ध्या न किञ्चित् साहसं कृतम् ।। २४ ।।

'महाराज! गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले अर्जुनने आपके आदेशकी प्रतीक्षा तथा

अपनी धर्मानुगामिनी बुद्धिके कारण ही अबतक कोई साहसका कार्य नहीं किया

है ।। २४ ।।

सहदेवो मया नित्यं नकुलश्च निवारितौ ।

शक्तौ विध्वंसने तेषां शत्रूणां भीमविक्रमौ ।। २५ ।।

'भयंकर पराक्रमी नकुल और सहदेव उन सब शत्रुओंका विध्वंस करनेमें समर्थ हैं। इन

दोनोंको मैं ही सदा रोकता आया हूँ ।। २५ ।।

न वयं तत् प्रहास्यामो यस्मिन् योक्ष्यति नो भवान् ।

भवान् विधत्तां तत् सर्वं क्षिप्रं जेष्यामहे रिपून् ।। २६ ।।

'आप हमें जिस कार्यमें लगा देंगे, उसे हमलोग पूरा किये बिना नहीं छोड़ेंगे। अतः आप

युद्धकी सारी व्यवस्था कीजिये। हम शत्रुओंपर शीघ्र ही विजय पायेंगे' ।। २६ ।।

इत्युक्ते भीमसेनेन ब्राह्मणाः परमाशिषा ।

उक्त्वा चापृच्छ्य भरतान्यथास्वान्स्वान्ययुर्गृहान् ।। २७ ।।

भीमसेनके ऐसा कहनेपर सब ब्राह्मण पाण्डवोंको उत्तम आशीर्वाद देकर और उन

भरतवंशियोंसे अनुमति लेकर अपने-अपने घरोंको चले गये ।। २७ ।।

सर्वे वेदविदो मुख्या यतयो मुनयस्तथा ।

आसेदुस्ते यथान्यायं पुनर्दर्शनकाङ्क्षया ।। २८ ।।

वेदोंके ज्ञाता समस्त प्रधान-प्रधान संन्यासी तथा मुनिलोग पाण्डवोंसे फिर मिलनेकी

इच्छा रखकर न्यायानुसार अपने योग्य स्थानोंमें रहने लगे ।। २८ ।।

सह धौम्येन विद्वांसस्तथा पञ्च च पाण्डवाः ।

उत्थाय प्रययुर्वीराः कृष्णामादाय धन्विनः ।। २९ ।।

धौम्यसहित विद्वान् एवं वीर पाँचों पाण्डव द्रौपदीको साथ लिये धनुष धारण किये

वहाँसे उठकर चल दिये ।। २९ ।।

क्रोशमात्रमुपागम्य तस्माद् देशान्निमित्ततः ।

श्वोभूते मनुजव्याघ्राश्छन्नवासार्थमुद्यताः ।। ३० ।।

पृथक्शास्त्रविदः सर्वे सर्वे मन्त्रविशारदाः ।

संधिविग्रहकालज्ञा मन्त्राय समुपाविशन् ।। ३१ ।।

किसी कारणवश उस स्थानसे एक कोस दूर जाकर वे नरश्रेष्ठ ठहर गये और आगामी

दूसरे दिनसे अज्ञातवास आरम्भ करनेके लिये उद्यत हो परस्पर सलाह करनेके निमित्त

आस-पास बैठ गये। वे सभी पृथक्-पृथक् शास्त्रोंके ज्ञाता, मन्त्रणा करनेमें कुशल तथा

संधि-विग्रह आदिके अवसरको जाननेवाले थे ।। ३०-३१ ।।