महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरंगकी मनोहर गोटियोंको चमकीले बिन्दुओंसे युक्त पासोंके अनुसार चलाता रहूँगा ॥ २४-२५ ॥ विराटराजं रमयन् सामात्यं सहबान्धवम् । न च मां वेत्स्यते कश्चित् तोषयिष्ये च तं नृपम् ॥ २६ ॥ मैं राजा विराटको उनके मन्त्रियों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित पासोंके खेलसे प्रसन्न करता रहूँगा। इस रूपमें मुझे कोई पहचान न सकेगा और मैं उन मत्स्यनरेशको भलीभाँति संतुष्ट रखूँगा ॥ २६ ॥ आसं युधिष्ठिरस्याहं पुरा प्राणसमः सखा । इति वक्ष्यामि राजानं यदि मां सोऽनुयोक्ष्यते ॥ २७ ॥ यदि वे राजा मुझसे पूछेंगे कि आप कौन हैं, तो मैं उन्हें बताऊँगा कि मैं पहले महाराज युधिष्ठिरका प्राणोंके समान प्रिय सखा था ॥ २७ ॥ इत्येतद् वो मयाऽऽख्यातं विहरिष्याम्यहं यथा । इस प्रकार मैंने तुमलोगोंको बता दिया कि विराटनगरमें मैं किस प्रकार रहूँगा ॥ २७ ½ ॥
(वैशम्पायन उवाच
एवं निर्दिश्य चात्मानं भीमसेनमुवाच ह ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार अज्ञातवासमें अपने द्वारा किये जानेवाले कार्यको बतलाकर युधिष्ठिर भीमसेनसे बोले।
युधिष्ठिर उवाच
भीमसेन कथं कर्म मात्स्यराष्ट्रे करिष्यसि ॥ हत्वा क्रोधवशांस्तत्र पर्वते गन्धमादने । यक्षान् क्रोधाभिताम्राक्षान् राक्षसांश्चापि पौरुषान् । प्रादाः पाञ्चालकन्यायै पद्मानि सुबहून्यपि ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**भीमसेन! तुम मत्स्यदेशमें किस प्रकार कोई कार्य कर सकोगे? तुमने गन्धमादन पर्वतपर क्रोधसे सदा लाल आँखें किये रहनेवाले क्रोधवश नामक यक्षों और महापराक्रमी राक्षसोंका वध करके पांचालराजकुमारी द्रौपदीको बहुत-से कमल लाकर दिये थे। बकं राक्षसराजानं भीषणं पुरुषादकम् । जघ्निवानसि कौन्तेय ब्राह्मणार्थमरिंदम ॥ क्षेमा चाभयसंवीता ह्येकचक्रा त्वया कृता ॥ शत्रुहन्ता भीम! ब्राह्मणपरिवारकी रक्षाके लिये तुमने भयानक आकृतिवाले नरभक्षी राक्षसराज बकको भी मार डाला था और इस प्रकार एकचक्रा नगरीको भयरहित एवं