महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
रंगकी मनोहर गोटियोंको चमकीले बिन्दुओंसे युक्त पासोंके अनुसार चलाता रहूँगा ॥ २४-२५ ॥ विराटराजं रमयन् सामात्यं सहबान्धवम् । न च मां वेत्स्यते कश्चित् तोषयिष्ये च तं नृपम् ॥ २६ ॥ मैं राजा विराटको उनके मन्त्रियों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित पासोंके खेलसे प्रसन्न करता रहूँगा। इस रूपमें मुझे कोई पहचान न सकेगा और मैं उन मत्स्यनरेशको भलीभाँति संतुष्ट रखूँगा ॥ २६ ॥ आसं युधिष्ठिरस्याहं पुरा प्राणसमः सखा । इति वक्ष्यामि राजानं यदि मां सोऽनुयोक्ष्यते ॥ २७ ॥ यदि वे राजा मुझसे पूछेंगे कि आप कौन हैं, तो मैं उन्हें बताऊँगा कि मैं पहले महाराज युधिष्ठिरका प्राणोंके समान प्रिय सखा था ॥ २७ ॥ इत्येतद् वो मयाऽऽख्यातं विहरिष्याम्यहं यथा । इस प्रकार मैंने तुमलोगोंको बता दिया कि विराटनगरमें मैं किस प्रकार रहूँगा ॥ २७ ½ ॥
(वैशम्पायन उवाच
एवं निर्दिश्य चात्मानं भीमसेनमुवाच ह ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार अज्ञातवासमें अपने द्वारा किये जानेवाले कार्यको बतलाकर युधिष्ठिर भीमसेनसे बोले।
युधिष्ठिर उवाच
भीमसेन कथं कर्म मात्स्यराष्ट्रे करिष्यसि ॥ हत्वा क्रोधवशांस्तत्र पर्वते गन्धमादने । यक्षान् क्रोधाभिताम्राक्षान् राक्षसांश्चापि पौरुषान् । प्रादाः पाञ्चालकन्यायै पद्मानि सुबहून्यपि ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**भीमसेन! तुम मत्स्यदेशमें किस प्रकार कोई कार्य कर सकोगे? तुमने गन्धमादन पर्वतपर क्रोधसे सदा लाल आँखें किये रहनेवाले क्रोधवश नामक यक्षों और महापराक्रमी राक्षसोंका वध करके पांचालराजकुमारी द्रौपदीको बहुत-से कमल लाकर दिये थे। बकं राक्षसराजानं भीषणं पुरुषादकम् । जघ्निवानसि कौन्तेय ब्राह्मणार्थमरिंदम ॥ क्षेमा चाभयसंवीता ह्येकचक्रा त्वया कृता ॥ शत्रुहन्ता भीम! ब्राह्मणपरिवारकी रक्षाके लिये तुमने भयानक आकृतिवाले नरभक्षी राक्षसराज बकको भी मार डाला था और इस प्रकार एकचक्रा नगरीको भयरहित एवं
कल्याणयुक्त बनाया था। हिडिम्बं च महावीर्यं किर्मीरं चैव राक्षसम् । त्वया हत्वा महाबाहो वनं निष्कण्टकं कृतम् ।। महाबाहो! तुमने महावीर हिडिम्ब और राक्षस किर्मीरको मारकर वनको निष्कण्टक बनाया था। आपदं चापि सम्प्राप्ता द्रौपदी चारुहासिनी । जटासुरवधं कृत्वा त्वया च परिमोक्षिता ।। मत्स्यराजान्तिके तात वीर्यपूर्णोऽत्यमर्षणः । ) वृकोदर विराटे त्वं रंस्यसे केन हेतुना ।। २८ ।। संकटमें पड़ी हुई मनोहर हास्यवाली द्रौपदीको भी तुमने जटासुरका वध करके छुड़ाया था। तात भीमसेन! तुम अत्यन्त बलवान् एवं अमर्षशाली हो। राजा विराटके यहाँ कौन-सा कार्य करके तुम प्रसन्नतापूर्वक रह सकोगे—यह बतलाओ ।। २८ ।।
इति श्रीमन्महाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरादिमन्त्रणे प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी परस्पर मन्त्रणासे सम्बन्ध रखनेवाला पहला अध्याय पूरा हुआ ।। १ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३४ १/२ श्लोक हैं।)
* – विश्वकोषके अनुसार 'कंक' शब्द यमराजका वाचक है। यमराजका ही दूसरा नाम धर्म है और वे ही युधिष्ठिररूपमें अवतीर्ण हुए थे। 'आत्मा वै जायते पुत्रः' इस उक्तिके अनुसार भी धर्म एवं धर्मपुत्र युधिष्ठिरमें कोई अन्तर नहीं है। यह समझकर ही अपनी सत्यवादिताकी रक्षा करते हुए युधिष्ठिरने 'कंक' नामसे अपना परिचय दिया। इसके सिवा उन्होंने जो अपनेको युधिष्ठिरका प्राणोंके समान प्रिय सखा बताया, वह भी असत्य नहीं है। युधिष्ठिर नामक शरीरको ही यहाँ युधिष्ठिर समझना चाहिये। आत्माकी सत्तासे ही शरीरका संचालन होता है। अतः आत्मा उसके साथ रहनेके कारण उसका सखा है। आत्मा सबसे बढ़कर प्रिय है ही; अतः यहाँ युधिष्ठिरका आत्मा युधिष्ठिर-शरीरका प्रिय सखा कहा गया है।
अध्याय (पृष्ठ 2128)
द्वितीयोऽध्यायः
भीमसेन और अर्जुनद्वारा विराटनगरमें किये जानेवाले अपने अनुकूल कार्योंका निर्देश
भीमसेन उवाच
पौरोगवो ब्रुवाणोऽहं बल्लवो नाम भारत।
उपस्थास्यामि राजानं विराटमिति मे मतिः॥ १॥
**भीमसेनने कहा—**भरतवंशशिरोमणे! मैं पौरोगव³ (पाकशालाका अध्यक्ष) बनकर और बल्लव³ नामसे अपना परिचय देकर राजा विराटके दरबारमें उपस्थित होऊँगा। मेरा यही विचार है॥ १॥
सूपानस्य करिष्यामि कुशलोऽस्मि महानसे।
कृतपूर्वाणि यान्यस्य व्यञ्जनानि सुशिक्षितैः॥ २॥
तान्यप्यभिभविष्यामि प्रीतिं संजनयन्नहम्।
मैं रसोई बनानेके काममें चतुर हूँ। अपने ऊपर राजाके मनमें अत्यन्त प्रेम उत्पन्न करनेके उद्देश्यसे उनके लिये सूप (दाल, कढ़ी एवं साग आदि) तैयार करूँगा और पाककलामें भलीभाँति शिक्षा पाये हुए चतुर रसोइयोंने राजाके लिये पहले जो-जो व्यंजन बनाये होंगे, उन्हें भी अपने बनाये हुए व्यंजनोंसे तुच्छ सिद्ध कर दूँगा॥ २½॥
आहरिष्यामि दारूणां निचयान् महतोऽपि च॥ ३॥
यत् प्रेक्ष्य विपुलं कर्म राजा संयोक्ष्यते स माम्।
अमानुषाणि कुर्वाणस्तानि कर्माणि भारत॥ ४॥
इतना ही नहीं, मैं रसोईके लिये लकड़ियोंके बड़े-से-बड़े गठ्ठोंको भी उठा लाऊँगा, जिस महान् कर्मको देखकर राजा विराट मुझे अवश्य रसोइयेके कामपर नियुक्त कर लेंगे। भारत! मैं वहाँ ऐसे-ऐसे अद्भुत कार्य करता रहूँगा, जो साधारण मनुष्योंकी शक्तिके बाहर है॥ ३-४॥
राज्ञस्तस्य परे प्रेष्या मंस्यन्ते मां यथा नृपम्।
भक्ष्यान्नरसपानानां भविष्यामि तथेश्वरः॥ ५॥
इससे राजा विराटके दूसरे सेवक राजाके ही समान मेरा सम्मान करेंगे और मैं भक्ष्य, भोज्य, रस तथा पेय पदार्थोंका इच्छानुसार उपयोग करनेमें समर्थ होऊँगा॥ ५॥
द्विपा वा बलिनो राजन् वृषभा वा महाबलाः।
विनिग्राह्या यदि मया निग्रहीष्यामि तानपि॥ ६॥
राजन्! बलवान् हाथी अथवा महाबली बैल भी यदि काबूमें करनेके लिये मुझे सौंपे जायँगे तो मैं उन्हें भी बाँधकर अपने वशमें कर लूँगा ॥ ६ ॥
ये च केचिन्नियोत्स्यन्ति समाजेषु नियोधकाः ।
तानहं हि नियोत्स्यामि रतिं तस्य विवर्धयन् ॥ ७ ॥
तथा जो कोई भी मल्लयुद्ध करनेवाले पहलवान जनसमाजमें दंगल करना चाहेंगे, राजाका प्रेम बढ़ानेके, लिये मैं उनसे भी भिड़ जाऊँगा ॥ ७ ॥
न त्वेतान् युद्ध्यमानान् वै हनिष्यामि कथञ्चन ।
तथैतान् पातयिष्यामि यथा यास्यन्ति न क्षयम् ॥ ८ ॥
परंतु कुश्ती करनेवाले इन पहलवानोंको मैं किसी प्रकार जानसे नहीं मारूँगा; अपितु इस प्रकार नीचे गिराऊँगा, जिससे उनकी मृत्यु न हो ॥ ८ ॥
आरालिको गोविकर्ता सूपकर्ता नियोधकः ।
आसं युधिष्ठिरस्याहमिति वक्ष्यामि पृच्छतः ॥ ९ ॥
महाराजके पूछनेपर मैं यह कहूँगा कि मैं राजा युधिष्ठिरके यहाँ आरालिक (मतवाले हाथियोंको भी काबूमें करनेवाला गजशिक्षक), गोविकर्ता (महाबली वृषभोँको भी पछाड़कर उन्हें नाथनेवाला), सूपकर्ता (दाल-साग आदि भाँति-भाँतिके व्यंजन बनानेवाला) तथा नियोधक (दंगली पहलवान) रहा हूँ ॥ ९ ॥
आत्मानमात्मना रक्षंश्चरिष्यामि विशाम्पते ।
इत्येतत् प्रतिजानामि विहरिष्याम्यहं यथा ॥ १० ॥
राजन्! अपने-आप अपनी रक्षा करते हुए मैं विराटके नगरमें विचरूँगा। मुझे विश्वास है कि इस प्रकार मैं वहाँ सुखपूर्वक रह सकूँगा ॥ १० ॥
युधिष्ठिर उवाच
यमग्निर्ब्राह्मणो भूत्वा समागच्छन्नृणां वरम् ।
दिधक्षुः खाण्डवं दावं दाशार्हसहितं पुरा ॥ ११ ॥
महाबलं महाबाहुमजितं कुरुनन्दनम् ।
सोऽयं किं कर्म कौन्तेयः करिष्यति धनंजयः ॥ १२ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**जो मनुष्योंमें श्रेष्ठ महाबली और महाबाहु है, पहले भगवान् श्रीकृष्णके साथ बैठे हुए जिस अर्जुनके पास खाण्डववनको जलानेकी इच्छासे ब्राह्मणका रूप धारण करके साक्षात् अग्निदेव पधारे थे, जो कुरुकुलको आनन्द देनेवाला तथा किसीसे भी परास्त न होनेवाला है, वह कुन्तीनन्दन धनंजय विराटनगरमें कौन-सा कार्य करेगा? ॥ ११-१२ ॥
योऽयमासाद्य तं दावं तर्पयामास पावकम् ।
विजित्यैकरथेनेन्द्रं हत्वा पन्नगराक्षसान् ॥ १३ ॥
वासुकेः सर्पराजस्य स्वसारं हृतवांश्च यः । श्रेष्ठो यः प्रतियोधानां सोऽर्जुनः किं करिष्यति ॥ १४ ॥ जिसने खाण्डवदाहके समय वहाँ पहुँचकर एकमात्र रथका आश्रय ले इन्द्रको पराजित कर तथा नागों एवं राक्षसोंको मारकर अग्निदेवको तृप्त किया और अपने अप्रतिम सौन्दर्यसे नागराज वासुकिकी बहिन उलूपीका चित्त चुरा लिया एवं जो सम्मुख युद्ध करनेवाले वीरोंमें सबसे श्रेष्ठ है, वह अर्जुन वहाँ क्या काम करेगा? ॥ १३-१४ ॥ सूर्यः प्रतपतां श्रेष्ठो द्विपदां ब्राह्मणो वरः । आशीविषश्च सर्पाणामग्निस्तेजस्विनां वरः ॥ १५ ॥ आयुधानां वरं वज्रं ककुद्मी च गवां वरः । ह्रदानामुदधिः श्रेष्ठः पर्जन्यो वर्षतां वरः ॥ १६ ॥ धृतराष्ट्रश्च नागानां हस्तिष्वैरावणो वरः । पुत्रः प्रियाणामधिको भार्या च सुहृदां वरा ॥ १७ ॥ (गिरीणां प्रवरो मेरुर्देवानां मधुसूदनः । ग्रहाणां प्रवरश्चन्द्रः सरसां मानसं वरम् ॥) यथैतानि विशिष्ठानि जात्यां जात्यां वृकोदर । एवं युवा गुडाकेशः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ १८ ॥ जैसे तपनेवाले तेजस्वी पदार्थोंमें सूर्य श्रेष्ठ हैं, मनुष्योंमें ब्राह्मणका स्थान ऊँचा है, जैसे सर्पोंमें आशीविष जातिवाले सर्प महान् हैं, तेजस्वियोंमें अग्नि श्रेष्ठ हैं, अस्त्र-शस्त्रोंमें वज्रका स्थान ऊँचा है, गौओंमें ऊँचे कंधेवाला साँड़ बड़ा माना गया है, जलाशयोंमें समुद्र सबसे महान् है, वर्षा करनेवाले मेघोंमें पर्जन्य श्रेष्ठ हैं, नागोंमें धृतराष्ट्र तथा हाथियोंमें ऐरावत बड़ा है, जैसे प्रिय सम्बन्धियोंमें पुत्र सबसे अधिक प्रिय है और अकारण हित चाहनेवाले सुहृदोंमें धर्मपत्नी सबसे बढ़कर है, जैसे पर्वतोंमें मेरु श्रेष्ठ है, देवताओंमें मधुसूदन भगवान् विष्णु श्रेष्ठ हैं, ग्रहोंमें चन्द्रमा श्रेष्ठ हैं और सरोवरोंमें मानसरोवर श्रेष्ठ है। भीमसेन! अपनी-अपनी जातिमें जिस प्रकार ये पूर्वोक्त वस्तुएँ विशिष्ट मानी गयी हैं, वैसे ही सम्पूर्ण धनुर्धारियोंमें युवावस्थासे सम्पन्न यह गुडाकेश (निद्राविजयी) अर्जुन श्रेष्ठ है ॥ १५—१८ ॥ सोऽयमिन्द्रादनवरो वासुदेवान्महाद्युतिः । गाण्डीवधन्वा बीभत्सुः श्वेताश्वः किं करिष्यति ॥ १९ ॥ यह देवराज इन्द्र और भगवान् श्रीकृष्णसे किसी बातमें कम नहीं है। श्वेत घोड़ोंवाले रथपर चलनेवाला यह महातेजस्वी गाण्डीवधारी बीभत्सु (अर्जुन) वहाँ कौन-सा कार्य करेगा? ॥ १९ ॥ उषित्वा पञ्च वर्षाणि सहस्राक्षस्य वेश्मनि । अस्त्रयोगं समासाद्य स्ववीर्यान्मानुषाद्भुतम् । दिव्यान्यस्त्राणि चाप्तानि देवरूपेण भास्वता ॥ २० ॥
इसने पाँच वर्षोंतक देवराज इन्द्रके भवनमें रहकर ऐसे दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं, जिनका मनुष्योंमें होना एक अद्भुत-सी बात है। अपने देवोपम स्वरूपसे प्रकाशित होनेवाले अर्जुनने अनेक दिव्यास्त्र पाये हैं॥ २०॥
यं मन्ये द्वादशं रुद्रमादित्यानां त्रयोदशम् ।
वसूनां नवमं मन्ये ग्रहाणां दशमं तथा ॥ २१ ॥
जिस अर्जुनको मैं बारहवाँ रुद्र और तेरहवाँ आदित्य मानता हूँ, नवम वसु तथा दसवाँ ग्रह स्वीकार करता हूँ॥ २१॥
यस्य बाहू समौ दीर्घौ ज्याघातकठिनत्वचौ ।
दक्षिणे चैव सव्ये च गवामिव वहः कृतः ॥ २२ ॥
जिसकी दोनों भुजाएँ एक-सी विशाल हैं; प्रत्यंचाके आघातसे उनकी त्वचा कठोर हो गयी है। जैसे बैलोंके कंधोंपर जुआठेकी रगड़से चिह्न बन जाता है, उसी प्रकार जिसकी दाहिनी और बायीं भुजाओंपर प्रत्यंचाकी रगड़से चिह्न बन गये हैं॥ २२॥
हिमवानिव शैलानां समुद्रः सरितामिव ।
त्रिदशानां यथा शक्रो वसूनामिव हव्यवाट् ॥ २३ ॥
मृगाणामिव शार्दूलो गरुडः पततामिव ।
वरः संनह्यमानानां सोऽर्जुनः किं करिष्यति ॥ २४ ॥
जैसे पर्वतोंमें हिमालय, सरिताओंमें समुद्र, देवताओंमें इन्द्र, वसुओंमें हव्यवाहक अग्नि, मृगोंमें सिंह तथा पक्षियोंमें गरुड़ श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कवचधारी वीरोंमें जिसका स्थान सबसे ऊँचा है, वह अर्जुन विराटनगरमें जाकर क्या काम करेगा?॥ २३-२४॥
अर्जुन उवाच
प्रतिज्ञां षण्ढकोऽस्मीति करिष्यामि महीपते ।
ज्याघातौ हि महान्तौ मे संवर्तुं नृप दुष्करौ ॥ २५ ॥
वलयैश्छादयिष्यामि बाहू किणकृताविमौ ।
**अर्जुनने कहा—**महाराज! मैं राजाकी सभामें यह दृढ़तापूर्वक कहूँगा कि मैं षण्ढक (नपुंसक) हूँ। राजन्! यद्यपि मेरी दायीं-बायीं भुजाओंमें धनुषकी डोरीकी रगड़से जो महान् चिह्न बन गये हैं, उन्हें छिपाना बहुत कठिन है तथापि कंगन आदि आभूषणोंसे मैं इन ज्याघातचिह्नित भुजाओंको ढक-लूँगा॥ २५½॥
कर्णयोः प्रतिमुच्याहं कुण्डले ज्वलनप्रभे ॥ २६ ॥
पिनद्धकम्बुः पाणिभ्यां तृतीयां प्रकृतिं गतः ।
वेणीकृतशिरा राजन् नाम्ना चैव बृहन्नला ॥ २७ ॥
मैं दोनों कानोंमें अग्निके समान कान्तिमान् कुण्डल पहनकर हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ धारण कर लूँगा। इस प्रकार तीसरी प्रकृति (नपुंसकभाव)-को अपनाकर सिरपर चोटी गूँथ
लूँगा और अपनेको बृहन्नला नामसे घोषित करूँगा<sup>३</sup> ॥ २६-२७ ॥
पठन्नाख्यायिकाश्चैव स्त्रीभावेन पुनः पुनः ।
रमयिष्ये महीपालमन्यांश्चान्तःपुरे जनान् ॥ २८ ॥
स्त्रीभावसे अपने स्वरूपको छिपाकर बारंबार पूर्ववर्ती राजाओंके चरित्रोंका गान करके महाराज विराट तथा अन्तःपुरकी अन्यान्य स्त्रियोंका मनोरंजन करूँगा ॥ २८ ॥
गीतं नृत्यं विचित्रं च वादित्रं विविधं तथा ।
शिक्षयिष्याम्यहं राजन् विराटस्य पुरस्त्रियः ॥ २९ ॥
राजन्! मैं विराटनगरकी स्त्रियोंको गीत गाने, विचित्र ढंगसे नृत्य करने तथा भाँति-भाँतिके बाजे बजानेकी शिक्षा दूँगा ॥ २९ ॥
प्रजानां समुदाचारं बहु कर्म कृतं वदन् ।
छादयिष्यामि कौन्तेय माययाऽऽत्मानमात्मना ॥ ३० ॥
कुन्तीनन्दन! प्रजाजनोंके उत्तम आचार-विचार और उनके किये हुए अनेक प्रकारके सत्कर्मोंका वर्णन करता हुआ मैं मायामय नपुंसकवेशसे बुद्धिद्वारा अपने यथार्थ स्वरूपको छिपाये रखूँगा ॥ ३० ॥
युधिष्ठिरस्य गेहे वै द्रौपद्याः परिचारिका ।
उषितास्मीति वक्ष्यामि पृष्टो राज्ञा च पाण्डव ॥ ३१ ॥
पाण्डुनन्दन! यदि राजा विराटने मेरा परिचय पूछा, तो मैं कह दूँगा कि मैं महाराज युधिष्ठिरके घरमें महारानी द्रौपदीकी परिचारिका<sup>३</sup> रह चुकी हूँ ॥ ३१ ॥
एतेन विधिना छन्नः कृतकेन यथानलः ।
विहरिष्यामि राजेन्द्र विराटभवने सुखम् ॥ ३२ ॥
राजेन्द्र! इस प्रकार कृत्रिम वेशभूषासे राखमें छिपी हुई अग्निके समान अपनेको छिपाकर मैं विराटके महलमें सुखपूर्वक निवास करूँगा ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरादिमन्त्रणे
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी मन्त्रणाविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं।)
१. पुरोगु कहते हैं वायुको, उसके पुत्र होनेसे भीमसेनका ‘पौरोगव’ नाम सत्य एवं सार्थक है।
३. बल्लवका अर्थ है सूपकर्ता अर्थात् रसोइया। रसोईके काममें निपुण होनेसे उनका यह नाम यथार्थ ही है।
अध्याय (पृष्ठ 2133)
तृतीयोऽध्यायः
नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीद्वारा अपने-अपने भावी कर्तव्योंका दिग्दर्शन
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर-
स्तथार्जुनो धर्मभृतां वरिष्ठः ।
वाक्यं तथासौ विरराम भूयो
नृपोऽपरं भ्रातरमाबभाषे ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा पुरुषोंमें महान् वीर अर्जुन इस प्रकार कहकर चुप हो गये। तब राजा युधिष्ठिर पुनः दूसरे भाईसे बोले ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
किं त्वं नकुल कुर्वाणस्तत्र तात चरिष्यसि ।
कर्म तत् त्वं समाचक्ष्व राज्ये तस्य महीपतेः ।
सुकुमारश्च शूरश्च दर्शनीयः सुखोचितः ॥ २ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**नकुल! तुम राजा विराटके राज्यमें कौन-सा कार्य करते हुए निवास करोगे? वह कार्य बताओ। तात! तुम तो शूरवीर होनेके साथ ही अत्यन्त सुकुमार, परम दर्शनीय और सर्वथा सुख भोगनेके ही योग्य हो ॥ २ ॥
नकुल उवाच
अश्वबन्धो भविष्यामि विराटनृपतेरहम् ।
सर्वथा ज्ञानसम्पन्नः कुशलः परिरक्षणे ॥ ३ ॥
**नकुल बोले—**राजन्! मैं राजा विराटके यहाँ अश्वबन्ध (घोड़ोंको वशमें करनेवाला सवार) होकर रहूँगा। मैं अश्वविज्ञानसे सम्पन्न और घोड़ोंकी रक्षाके कार्यमें कुशल हूँ ॥ ३ ॥
ग्रन्थिको नाम नाम्नाहं कर्मैतत् सुप्रियं मम ।
कुशलोऽस्म्यश्वशिक्षायां तथैवाश्वचिकित्सने ।
प्रियाश्च सततं मेऽश्वाः कुरुराज यथा तव ॥ ४ ॥
मैं राजसभामें ग्रन्थिक नामसे अपना परिचय दूँगा। घोड़ोंकी देखभालका काम मुझे अत्यन्त प्रिय है। उन्हें भाँति-भाँतिकी चालें सिखाने और उनकी चिकित्सा करनेमें भी मैं निपुण हूँ। कुरुराज! आपकी ही भाँति मुझे भी घोड़े सदैव प्रिय रहे हैं* ॥ ४ ॥
ये मामामन्त्रयिष्यन्ति विराटनगरे जनाः ।
तेभ्य एवं प्रवक्ष्यामि विहरिष्याम्यहं यथा ।। ५ ।। पाण्डवेन पुरा तात अश्वेष्वधिकृतः पुरा । विराटनगरे छन्नश्चरिष्यामि महीपते ।। ६ ।। विराटनगरमें जो लोग मुझसे पूछेंगे, उन्हें मैं इस प्रकार उत्तर दूँगा—‘तात! पहले पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरने मुझे अश्वोंका अध्यक्ष बनाकर रख रखा था।’ महीपते! मैं जिस प्रकार वहाँ विहार करूँगा, वह सब मैंने आपको बता दिया। राजा विराटके नगरमें अपनेको छिपाये रखकर ही मैं सर्वत्र विचरूँगा ।। ५-६ ।।
युधिष्ठिर उवाच सहदेव कथं तस्य समीपे विहरिष्यसि । किं वा त्वं कर्म कुर्वाणः प्रच्छन्नो विहरिष्यसि ।। ७ ।। युधिष्ठिरने सहदेवसे पूछा—भैया सहदेव! तुम राजा विराटके समीप कैसे जाओगे उनके यहाँ क्या काम करते हुए गुप्तरूपसे निवास करोगे? ।। ७ ।।
सहदेव उवाच गोसंख्याता भविष्यामि विराटस्य महीपतेः । प्रतिषेद्धा च दोग्धा च संख्याने कुशलो गवाम् ।। ८ ।। सहदेवने कहा—महाराज! मैं राजा विराटके यहाँ गौओंकी गिनती—जाँच-पड़ताल करनेवाला गो-शालाध्यक्ष होकर रहूँगा। मैं गौओंको नियन्त्रणमें रखने और दुहनेका काम अच्छी तरह जानता हूँ। उन्हें गिनने और उनकी परख-पहचानके काममें भी कुशल हूँ ।। ८ ।।
तन्तिपाल इति ख्यातो नाम्नाहं विदितस्त्वथ । निपुणं च चरिष्यामि व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। ९ ।। मैं वहाँ तन्तिपाल नामसे प्रसिद्ध होऊँगा। इसी नामसे मुझे सब लोग जानेंगे। मैं बड़ी चतुराईसे अपनेको छिपाये रखकर वहाँ सब ओर विचरूँगा; अतः मेरे विषयमें आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ।। ९ ।।
(अरोगा बहुलाः पुष्टाः क्षीरवत्यो बहुप्रजाः । निष्पन्नसत्त्वाः सुभृता व्यपेतज्वरकिल्बिषाः ।। नष्टचोरभया नित्यं व्याधिव्याघ्रविवर्जिताः । गावश्च सुसुखा राजन् निरुद्विग्ना निरामयाः ।। भविष्यन्ति मया गुप्ता विराटपशवो नृप ।।) राजन्! मेरे द्वारा रक्षित होकर राजा विराटके पशु तथा गौएँ नीरोग, संख्यामें अधिक, हृष्ट-पुष्ट, अधिक दूध देनेवाली, बहुत संतानोंवाली, सत्त्वयुक्त, अच्छी तरह सम्हाल होनेसे
रोगरूप पापसे रहित, चोरोंके भयसे मुक्त तथा सदा व्याधि एवं बाघ आदिके भयसे रक्षित
होंगी। महाराज! वे उद्वेगरहित, सुखी और निरामय तो होंगी ही।
अहं हि सततं गोषु भवता प्रहितः पुरा ।
तत्र मे कौशलं सर्वमवबुद्धं विशाम्पते ॥ १० ॥
भूपाल! पहले आपने मुझे सदा गौओंकी देखभालके कार्यमें नियुक्त किया है। इस
कार्यमें मैं कितना दक्ष हूँ, यह सब आपको विदित ही है ॥ १० ॥
लक्षणं चरितं चापि गवां यच्चापि मङ्गलम् ।
तत् सर्वं मे सुविदितमन्यच्चापि महीपते ॥ ११ ॥
वृषभानपि जानामि राजन् पूजितलक्षणान् ।
येषां मूत्रमुपाघ्राय अपि वन्ध्या प्रसूयते ॥ १२ ॥
महीपते! गौओंके जो लक्षण और चरित्र मंगल-कारक होते हैं, वे सब मुझे भलीभाँति
मालूम हैं। उनके विषयमें और भी बहुत-सी बातें मैं जानता हूँ। राजन्! इसके सिवा मैं ऐसे
प्रशंसनीय लक्षणोंवाले साँड़ोंको भी जानता हूँ, जिनके मूत्रको सूँघ लेनेमात्रसे वन्ध्या स्त्री
भी गर्भवती हो सकती है ॥ ११-१२ ॥
सोऽहमेवं चरिष्यामि प्रीतिरत्र हि मे सदा ।
न च मां वेत्स्यते कश्चित् तोषयिष्ये च पार्थिवम् ॥ १३ ॥
इस प्रकार मैं गौओंकी सेवा करूँगा। इस कार्यमें मुझे सदासे प्रेम रहा है। वहाँ मुझे
कोई पहचान नहीं सकेगा। मैं अपने कार्यसे राजा विराटको संतुष्ट कर लूँगा* ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
इयं हि नः प्रिया भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ।
मातेव परिपाल्या च पूज्या ज्येष्ठेव च स्वसा ॥ १४ ॥
केन स्म द्रौपदी कृष्णा कर्मणा विचरिष्यति ।
न हि किञ्चिद् विजानाति कर्म कर्तुं यथा स्त्रियः ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर बोले—यह द्रुपदकुमारी कृष्णा हमलोगोंकी प्यारी भार्या है। इसका गौरव
हमारे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर है। यह माता (पृथ्वी)-की भाँति पालन करनेयोग्य तथा बड़ी
बहन (धेनु)-के समान आदरणीय है। यह तो दूसरी स्त्रियोंकी भाँति कोई काम-काज भी
नहीं जानती; फिर वहाँ किस कर्मका आश्रय लेकर निवास करेगी? ॥ १४-१५ ॥
सुकुमारी च बाला च राजपुत्री यशस्विनी ।
पतिव्रता महाभागा कथं नु विचरिष्यति ॥ १६ ॥
इसका शरीर अत्यन्त सुकुमार है। इसकी अवस्था नयी है। यह यशस्विनी राजकुमारी
परम सौभाग्यवती तथा पतिव्रता है। भला, यह विराटनगरमें किस प्रकार रहेगी? ॥ १६ ॥
माल्यगन्धानलङ्कारान् वस्त्राणि विविधानि च ।
एतान्येवाभिजानाति यतो जाता हि भामिनी ॥ १७ ॥ इस भामिनीने जबसे जन्म लिया है, तबसे अबतक माला, सुगन्धित पदार्थ, भाँति-भाँतिके गहने तथा अनेक प्रकारके वस्त्रोंको ही जाना है। इसने कभी कष्टका अनुभव नहीं किया है ॥ १७ ॥
द्रौपद्युवाच
सैरन्ध्रयो रक्षिता लोके भुजिष्याः सन्ति भारत । नैवमन्याः स्त्रियो यान्ति इति लोकस्य निश्चयः ॥ साहं ब्रुवाणा सैरन्ध्री कुशला केशकर्मणि ॥ १८ ॥ युधिष्ठिरस्य गेहे वै द्रौपद्याः परिचारिका । उषितास्मीति वक्ष्यामि पृष्टा राज्ञा च भारत ॥ १९ ॥ द्रौपदीने कहा— भारत! इस जगत्में बहुत-सी ऐसी स्त्रियाँ हैं, जिनका दूसरोंके घरोंमें पालन होता है और जो शिल्पकर्मोंद्वारा जीवननिर्वाह करती हैं। वे अपने सदाचारसे स्वतः सुरक्षित होती हैं। ऐसी स्त्रियोंको सैरन्ध्री कहते हैं। लोगोंको अच्छी तरह मालूम है कि सैरन्ध्रीकी भाँति दूसरी स्त्रियाँ बाहरकी यात्रा नहीं करतीं, [अतः सैरन्ध्रीके वेशमें मुझे कोई पहचान नहीं सकेगा।] इसलिये मैं सैरन्ध्री कहकर अपना परिचय दूँगी। बालोंको सँवारने और वेणी-रचना आदिके कार्योंमें मैं बहुत निपुण हूँ। यदि राजा मुझसे पूछेंगे, तो कह दूँगी कि 'मैं महाराज युधिष्ठिरके महलमें महारानी द्रौपदीकी परिचारिका बनकर रही हूँ' ॥ १८-१९ ॥
आत्मगुप्ता चरिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २० ॥ सुदेष्णां प्रत्युपस्थास्ये राजभार्यां यशस्विनीम् । सा रक्षिष्यति मां प्राप्तां मा भूत् ते दुःखमीदृशम् ॥ २१ ॥ मैं अपनी रक्षा स्वयं कर लूँगी। आप जो मुझसे पूछते हैं कि तुम वहाँ क्या करोगी? कैसे रहोगी? उसके उत्तरमें निवेदन है कि मैं यशस्विनी राजपत्नी सुदेष्णाके पास जाऊँगी। मुझे अपने पास आयी हुई जानकर वे रख लेंगी और सब प्रकारसे मेरी रक्षा करेंगी। अतः आपके मनमें इस बातका दुःख नहीं होना चाहिये कि द्रौपदी कैसे सुरक्षित रह सकेगा ॥ २०-२१ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कल्याणं भाषसे कृष्णे कुले जातासि भामिनि । न पापमभिजानासि साध्वी साधुव्रते स्थिता ॥ २२ ॥ युधिष्ठिर बोले— कृष्णे! तुमने भली बात कही, इसमें कल्याण ही भरा है। क्यों न हो, तुम ऊँचे कुलमें उत्पन्न जो हुई हो! भामिनि! तुम्हें पापका रंचमात्र भी ज्ञान नहीं है। तुम साध्वी हो और उत्तम व्रतके पालनमें तत्पर रहती हो ॥ २२ ॥
यथा न दुर्हृदः पापा भवन्ति सुखिनः पुनः । कुर्यास्तत् त्वं हि कल्याणि लक्षयेयुर्न ते तथा ॥ २३ ॥ कल्याणि! वहाँ ऐसा बर्ताव करना, जिससे वे पापी शत्रु फिर सुखी होनेका अवसर न पा सकें; वे तुम्हें किसी तरह पहचान न सकें ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरादिमन्त्रणे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी परस्पर मन्त्रणाविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/३ श्लोक हैं।)
१. इस प्रसंगमें अर्जुनने अपनेको षण्ढक और बृहन्नला कहा है। षण्ढक शब्दका अर्थ है नपुंसक। अर्जुन इस समय उर्वशीके शापसे नपुंसक हो गये थे। बृहन्नलाका मूल शब्द बृहन्नल है। विद्वानोंने 'र' और 'ल' को एक-सा माना है; अतः बृहन्नलका अर्थ बृहन्नर अर्थात् श्रेष्ठ या महान् मानव है। भगवान् नारायणके सखा होनेके कारण अर्जुन नरश्रेष्ठ हैं ही।
२. परिचारिकाका एक अर्थ है सेविका और दूसरा अर्थ है सब ओर विचरण करनेवाली। इस प्रकार अर्जुनने गूढ़ अभिप्राययुक्त परिचारिका शब्दद्वारा अपनेको द्रौपदीका पति सूचित किया है।
* नकुलने अपना नाम ग्रन्थिक बताया और अपनेको अश्वोंका अधिकारी कहा है। ग्रन्थिकका अर्थ है आयुर्वेद तथा अध्वर्युविद्यासम्बन्धी ग्रन्थोंको जाननेवाला। श्रुतिमें अश्विनीकुमारोंको देवताओंका वैद्य तथा अध्वर्यु कहा गया है। 'अश्विनौ वै देवाना भिषजावश्विनावध्वर्यू'। नकुल अश्विनीकुमारोंके पुत्र हैं; अतः उनका अपनेको ग्रन्थिक कहना उपयुक्त ही है। 'नास्ति श्वो येषां ते अश्वाः' जिनके कलतक जीवित रहनेकी आशा न हो, वे अश्व हैं—इस व्युत्पत्तिके अनुसार जीवनकी आशा छोड़कर युद्धमें डटे रहनेवाले वीरोंको अश्व कहते हैं। नकुल उनके अधिकारी अर्थात् वीरोंमें प्रधान हैं। अतः उनका यह परिचय यथार्थ ही है।
* 'तस्य वाक्तन्तिर्नामानि दामानि' इस श्रुतिके अनुसार तन्ति शब्द वाणीका वाचक है। तन्तिपाल कहकर सहदेवने गूढ़रूपसे युधिष्ठिरको यह बताया कि मैं आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करूँगा। साधारण लोगोंकी दृष्टिमें तन्तिपालका अर्थ है, बैलोंको बाँधनेकी रस्सीको सुरक्षित रखनेवाला। अतः सहदेवने भी अपना परिचय यथार्थ ही दिया।
अध्याय (पृष्ठ 2138)
चतुर्थोऽध्यायः
धौम्यका पाण्डवोंको राजाके यहाँ रहनेका ढंग बताना और सबका अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको जाना
युधिष्ठिर उवाच
कर्माण्युक्तानि युष्माभिर्यानि यानि करिष्यथ ।
मम चापि यथा बुद्धिरुचिता विधिनिश्चयात् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**विराटके यहाँ रहकर तुम्हें जो-जो कार्य करने हैं, वे सब तुमने बताये। मुझे भी अपनी बुद्धिके अनुसार जो कार्य उचित प्रतीत हुआ, वह कह चुका। जान पड़ता है, विधाताका यही निश्चय है ॥ १ ॥
पुरोहितोऽयमस्माकमग्निहोत्राणि रक्षतु ।
सूदपौरोगवैः सार्द्धं द्रुपदस्य निवेशने ॥ २ ॥
इन्द्रसेनमुखाश्चैमे रथानादाय केवलान् ।
यान्तु द्वारवतीं शीघ्रमिति मे वर्तते मतिः ॥ ३ ॥
अब मेरी सलाह यह है कि ये पुरोहित धौम्यजी रसोइयों तथा पाकशालाध्यक्षके साथ राजा द्रुपदके घर जाकर रहें और वहाँ हमारे अग्निहोत्रकी अग्नियोंकी रक्षा करें तथा ये इन्द्रसेन आदि सेवकगण केवल रथोंको लेकर शीघ्र यहाँसे द्वारकाको चले जायँ ॥ २-३ ॥
इमाश्च नार्यो द्रौपद्याः सर्वाश्च परिचारिकाः ।
पाञ्चालानेव गच्छन्तु सूदपौरोगवैः सह ॥ ४ ॥
और ये जो द्रौपदीकी सेवा करनेवाली स्त्रियाँ हैं, वे सब रसोइयों और पाकशालाध्यक्षके साथ पांचालदेशको ही चली जायँ ॥ ४ ॥
सर्वैरपि च वक्तव्यं न प्राज्ञायन्त पाण्डवाः ।
गता ह्यस्मानपाहाय सर्वे द्वैतवनादिति ॥ ५ ॥
वहाँ सब लोग यही कहें—'हमें पाण्डवोंका कुछ भी पता नहीं है। वे सब द्वैतवनसे ही हमें छोड़कर न जाने कहाँ चले गये' ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं तेऽन्योन्यमामन्त्र्य कर्माण्युक्त्वा पृथक् पृथक् ।
धौम्यमामन्त्रयामासुः स च तान् मन्त्रमब्रवीत् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार आपसमें एक-दूसरेकी सलाह लेकर और अपने पृथक्-पृथक् कर्म बतलाकर पाण्डवोंने पुरोहित धौम्यकी भी सम्मति ली। तब पुरोहित धौम्यने उन्हें इस प्रकार सलाह दी ॥ ६ ॥
धौम्य उवाच
विहितं पाण्डवाः सर्वं ब्राह्मणेषु सुहृत्सु च ।
याने प्रहरणे चैव तथैवाग्निषु भारत ॥ ७ ॥
त्वया रक्षा विधातव्या कृष्णायाः फाल्गुनेन च ।
विदितं वो यथा सर्वं लोकवृत्तमिदं तव ॥ ८ ॥
**धौम्यजी बोले—**पाण्डवो! ब्राह्मणों, सुहृदों, सवारी या युद्ध-यात्रा, आयुध या युद्ध तथा अग्नियोंके प्रति जो शास्त्रविहित कर्तव्य हैं, उन्हें तुम अच्छी तरह जानते हो और तदनुकूल तुमने जो व्यवस्था की है, वह सब ठीक है। भारत! अब मैं तुमसे यह कहना चाहता हूँ कि तुम और अर्जुन सावधान रहकर सदा द्रौपदीकी रक्षा करना। लोकव्यवहारकी सभी बातें अथवा साधारण लोगोंके व्यवहार तुम सब लोगोंको विदित हैं ॥ ७-८ ॥
विदिते चापि वक्तव्यं सुहृद्भिरनुरागतः ।
एष धर्मश्च कामश्च अर्थश्चैव सनातनः ॥ ९ ॥
विदित होनेपर भी हितैषी सुहृदोंका कर्तव्य है कि वे स्नेहवश हितकी बात बतावें। यही सनातन धर्म है और इसीसे काम एवं अर्थकी प्राप्ति होती है ॥ ९ ॥
अतोऽहमपि वक्ष्यामि हेतुमत्र निबोधत ।
हन्तेमां राजवसतिं राजपुत्रा ब्रवीम्यहम् ॥ १० ॥
यथा राजकुलं प्राप्य सर्वान् दोषांस्तरिष्यथ ।
दुर्वसं चैव कौरव्य जानता राजवेश्मनि ॥ ११ ॥
इसलिये मैं भी जो युक्तियुक्त बातें बताऊँगा, उन्हें यहाँ ध्यान देकर सुनो। राजपुत्रो! मैं यह बता रहा हूँ कि राजाके घरमें रहकर कैसा बर्ताव करना चाहिये? उसके अनुसार राजकुलमें रहते हुए भी तुमलोग वहाँके सब दोषोंसे पार हो जाओगे। कुरुनन्दन! विवेकी पुरुषके लिये भी राजमहलमें निवास करना अत्यन्त कठिन है ॥ १०-११ ॥
अमानितैर्मानितैर्वा अज्ञातैः परिवत्सरम् ।
ततश्चतुर्दशे वर्षे चरिष्यथ यथासुखम् ॥ १२ ॥
वहाँ तुम्हारा अपमान हो या सम्मान, सब कुछ सहकर एक वर्षतक अज्ञातभावसे रहना चाहिये। तदनन्तर चौदहवें वर्षमें तुमलोग अपनी इच्छाके अनुसार सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे ॥ १२ ॥
दृष्टद्वारो लभेद द्रष्टुं राजस्वेषु न विश्वसेत् ।
तदेवासनमन्विच्छेद् यत्र नाभिपतेत् परः ॥ १३ ॥
राजासे मिलना हो, तो पहले द्वारपालसे मिलकर राजाको सूचना देनी चाहिये और मिलनेके लिये उनकी आज्ञा मँगा लेनी चाहिये। इन राजाओंपर पूर्ण विश्वास कभी न करे। अपने लिये वही आसन पसंद करे, जिसपर दूसरा कोई बैठनेवाला न हो ॥ १३ ॥
यो न यानं न पर्यङ्कं न पीठं न गजं रथम् । आरोहेत् सम्मतोऽस्मीति स राजवसतिं वसेत् ॥ १४ ॥ जो 'मैं राजाका प्रिय व्यक्ति हूँ', यों मानकर कभी राजाकी सवारी, पलंग, पादुका, हाथी एवं रथ आदिपर नहीं चढ़ता है, वही राजाके घरमें कुशलपूर्वक रह सकता है ॥ १४ ॥
यत्र यत्रैनमासीनं शङ्केरन् दुष्टचारिणः । न तत्रोपविशेद् यो वै स राजवसतिं वसेत् ॥ १५ ॥ जिन-जिन स्थानोंपर बैठनेसे दुराचारी मनुष्य संदेह करते हों, वहाँ-वहाँ जो कभी नहीं बैठता, वही राजभवनमें रह सकता है ॥ १५ ॥
न चानुशिष्याद् राजानमपृच्छन्तं कदाचन । तूष्णीं त्वेनमुपासीत काले समभिपूजयेत् ॥ १६ ॥ बिना पूछे राजाको कभी कर्तव्यका उपदेश न दे। मौनभावसे ही उसकी सेवा करे और उपयुक्त अवसरपर राजाकी प्रशंसा भी करे ॥ १६ ॥
असूयन्ति हि राजानो जनाननृतवादिनः । तथैव चावमन्यन्ते मन्त्रिणं वादिनं मृषा ॥ १७ ॥
झूठ बोलनेवाले मनुष्योंके प्रति राजालोग दोषदृष्टि कर लेते हैं। इसी प्रकार वे मिथ्यावादी मन्त्रीका भी अपमान करते हैं॥ १७॥
नैषां दारेषु कुर्वीत मैत्रीं प्राज्ञः कदाचन।
अन्तःपुरचरा ये च द्वेष्टि यानहितांश्च ये॥ १८॥
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह राजाओंकी रानियोंसे मेल-जोल न करे और जो रनिवासमें आते-जाते हों, राजा जिनसे द्वेष रखते हों तथा जो लोग राजाका अहित चाहनेवाले हों, उनसे भी मैत्री स्थापित न करे॥
विदिते चास्य कुर्वीत कार्याणि सुलघून्यपि।
एवं विचरतो राज्ञि न क्षतिर्जायते क्वचित्॥ १९॥
छोटे-से-छोटे कार्य भी राजाको जनाकर ही करे। राजदरबारमें ऐसा आचरण करनेवाले मनुष्योंको कभी हानि नहीं उठानी पड़ती॥ १९॥
गच्छन्नपि परां भूमिमपृष्टो ह्यनियोजितः।
जात्यन्ध इव मन्येत मर्यादामनुचिन्तयन्॥ २०॥
बैठनेके लिये अपनेको ऊँचा आसन प्राप्त होता हो, तो भी जबतक राजा न पूछे— बैठनेका आदेश न दें, तबतक राजदरबारकी मर्यादाका ख्याल करके अपनेको जन्मान्ध-सा माने, मानो उस आसनको वह देखता ही न हो। इस भावसे खड़ा रहकर राजाज्ञाकी प्रतीक्षा करता रहे॥ २०॥
न हि पुत्रं न नप्तारं न भ्रातरमरिंदमः।
समतिक्रान्तमर्यादं पूजयन्ति नराधिपाः॥ २१॥
क्योंकि शत्रुविजयी राजालोग मर्यादाका उल्लंघन करनेवाले अपने पुत्र, नाती-पोते और भाईका भी आदर नहीं करते॥ २१॥
यत्नाच्चोपचरेदेनमग्निवद् देववत् त्विह।
अनृतेनोपचीर्णो हि हन्यादेव न संशयः॥ २२॥
इस जगत्में राजाको अग्निके समान दाहक मानकर उसके अत्यन्त निकट न रहे और देवताके समान निग्रह तथा अनुग्रहमें समर्थ जानकर उसकी कभी अवहेलना न करे। इस प्रकार यत्नपूर्वक उसकी परिचर्यामें संलग्न रहे। इसमें संदेह नहीं कि जो मिथ्या एवं कपटपूर्ण उपचारके द्वारा राजाकी सेवा करता है, वह एक दिन अवश्य उसके हाथसे मारा जाता है॥ २२॥
यद् यद् भर्तारनुयुञ्जीत तत् तदेवानुवर्तयेत्।
प्रमादमवलेपं च कोपं च परिवर्जयेत्॥ २३॥
राजा जिस-जिस कार्यके लिये आज्ञा दे, उसीका पालन करे। लापरवाही, घमंड और क्रोधको सर्वथा त्याग दे॥ २३॥
समर्थनासु सर्वासु हितं च प्रियमेव च।
संवर्णयेत् तदेवास्य प्रियादपि हितं भवेत् ॥ २४ ॥ कर्तव्य और अकर्तव्यके निर्णयके सभी अवसरोंपर हितकारक और प्रिय वचन कहे। यदि दोनों सम्भव न हों, तो प्रिय वचनका त्याग करके भी जो हितकारक हो, वही बात कहे (हितविरोधी प्रिय वचन कदापि न कहे) ॥ २४ ॥
अनुकूलो भवेच्चास्य सर्वार्थेषु कथासु च । अप्रियं चाहितं यत् स्यात् तदस्मै नानुवर्णयेत् ॥ २५ ॥ सभी विषयों तथा सब बातोंमें राजाके अनुकूल रहे। कथावार्तामें भी राजाके सामने ऐसी बातोंकी बार-बार चर्चा न करे, जो उसे अप्रिय एवं अहितकर प्रतीत होती हों ॥ २५ ॥
नाहमस्य प्रियोऽस्मीति मत्वा सेवेत पण्डितः । अप्रमत्तश्च सततं हितं कुर्यात् प्रियं च यत् ॥ २६ ॥ विद्वान् पुरुष 'मैं राजाका प्रिय व्यक्ति नहीं हूँ', ऐसा मानता हुआ सदा सावधान रहकर उसकी सेवा करे। राजाके लिये जो हितकर और प्रिय हो, वही कार्य करे ॥ २६ ॥
नास्यानिष्टानि सेवेत नाहितैः सह संवदेत् । स्वस्थानान्न विकम्पेत स राजवसतिं वसेत् ॥ २७ ॥ जो चीज राजाको पसंद न हो, उसका कदापि सेवन न करे। उसके शत्रुओंसे बातचीत न करे और अपने स्थानसे कभी विचलित न हो। ऐसा बर्ताव करनेवाला मनुष्य ही राजाके यहाँ सकुशल रह सकता है ॥ २७ ॥
दक्षिणं वाथ वामं वा पार्श्वमासीत पण्डितः । रक्षिणां ह्यात्तशस्त्राणां स्थानं पश्चात् विधीयते ॥ २८ ॥ विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह राजाके दाहिने या बायें भागमें बैठे; क्योंकि राजाके पीछे अस्त्र-शस्त्रधारी अंगरक्षक सैनिकोंका स्थान होता है ॥ २८ ॥
नित्यं हि प्रतिषिद्धं तु पुरस्तादासनं महत् । न च संदर्शने किञ्चित् प्रवृत्तमपि संजयेत् ॥ २९ ॥ राजाके सामने किसीके लिये भी ऊँचा आसन लगाना सर्वथा निषिद्ध है। उसकी आँखोंके सामने यदि कोई पुरस्कार-वितरण या वेतनदान आदिका कार्य हो रहा हो, तो उसमें बिना बुलाये स्वयं पहले लेनेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये ॥ २९ ॥
अपि ह्येतद् दरिद्राणां व्यलीकस्थानमुत्तमम् । न मृषाभिहितं राज्ञां मनुष्येषु प्रकाशयेत् ॥ ३० ॥ क्योंकि ऐसी ढिठाई तो दरिद्रोंको भी बहुत अप्रिय जान पड़ती है; फिर राजाओंकी तो बात ही क्या है? राजाओंकी किसी झूठी बातको दूसरे मनुष्योंके सामने प्रकाशित न करें ॥ ३० ॥
असूयन्ति हि राजानो नराननृतवादिनः । तथैव चावमन्यन्ते नरान् पण्डितमानिनः ॥ ३१ ॥
क्योंकि झूठ बोलनेवाले मनुष्योंसे राजालोग द्वेष मान लेते हैं। इसी तरह जो लोग अपनेको पण्डित मानते हैं, उनका भी राजा तिरस्कार करते हैं।। ३१ ।।
शूरोऽस्मीति न दृप्तः स्याद् बुद्धिमानिति वा पुनः।
प्रियमेवाचरन् राज्ञः प्रियो भवति भोगवान् ।। ३२ ।।
'मैं शूरवीर हूँ अथवा बड़ा बुद्धिमान् हूँ', ऐसा घमंड न करे। जो सदा राजाको प्रिय लगनेवाले कार्य ही करता है, वही उसका प्रेमपात्र तथा ऐश्वर्यभोगसे सम्पन्न होता है ।। ३२ ।।
ऐश्वर्यं प्राप्य दुष्प्रापं प्रियं प्राप्य च राजतः ।
अप्रमत्तो भवेद् राज्ञः प्रियेषु च हितेषु च ।। ३३ ।।
राजासे दुर्लभ ऐश्वर्य तथा प्रिय भोग प्राप्त होनेपर मनुष्य सदा सावधान होकर उसके प्रिय एवं हितकर कार्योंमें संलग्न रहे ।। ३३ ।।
यस्य कोपो महाबाधः प्रसादश्च महाफलः ।
कस्तस्य मनसापीच्छेदनर्थं प्राज्ञसम्मतः ।। ३४ ।।
जिसका क्रोध बड़ा भारी संकट उपस्थित कर देता है और जिसकी प्रसन्नता महान् फल—ऐश्वर्य-भोग देनेवाली है, उस राजाका कौन बुद्धिमान् पुरुष मनसे भी अनिष्ट साधन करना चाहेगा? ।। ३४ ।।
न चोष्ठौ न भुजौ जानू न च वाक्यं समाक्षिपेत् ।
सदा वातं च वाचं च ष्ठीवनं चाचरेच्छनैः ।। ३५ ।।
राजाके समक्ष अपने दोनों हाथ, ओठ और घुटनोंको व्यर्थ न हिलावे; बकवाद न करे। सदा शनैः-शनैः बोले। धीरेसे थूके और दूसरोंको पता न चले, इस प्रकार अधोवायु छोड़े ।। ३५ ।।
हास्यवस्तुषु चान्यस्य वर्तमानेषु केषुचित् ।
नातिगाढं प्रहृष्येत न चाप्युन्मत्तवद्धसेत् ।। ३६ ।।
न चातिधैर्येण चरेद् गुरुतां हि व्रजेत् ततः ।
स्मितं तु मृदुपूर्वेण दर्शयेत् प्रसादजम् ।। ३७ ।।
किसी दूसरे व्यक्तिके सम्बन्धमें कोई हास्यजनक वस्तु दिखायी दे, तो अधिक हर्ष न प्रकट करे एवं पागलोंकी तरह अट्टहास न करे तथा अत्यन्त धैर्यके कारण जडवत् निश्चेष्ट होकर भी न रहे। इससे वह गौरव (सम्मान) को प्राप्त होता है। मनमें प्रसन्नता होनेपर मुखसे मृदुल (मन्द) मुसकानका ही प्रदर्शन करे ।। ३६-३७ ।।
लाभे न हर्षयेद् यस्तु न व्यथेद् योऽवमानितः ।
असम्मूढश्च यो नित्यं स राजवसतिं वसेत् ।। ३८ ।।
जो अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होनेपर (अधिक) हर्षित नहीं होता अथवा अपमानित होनेपर अधिक व्यथाका अनुभव नहीं करता और सदा मोहशून्य होकर विवेकसे काम लेता
है, वही राजाके यहाँ सुखपूर्वक रह सकता है ॥ ३८ ॥ राजानं राजपुत्रं वा संवर्णयति यः सदा । अमात्यः पण्डितो भूत्वा स चिरं तिष्ठते प्रियः ॥ ३९ ॥ जो बुद्धिमान् सचिव सदा राजा अथवा राजकुमारकी प्रशंसा करता रहता है, वही राजाके यहाँ उसका प्रीतिपात्र होकर दीर्घकालतक टिक सकता है ॥ ३९ ॥ प्रगृहीतश्च योऽमात्यो निगृहीतस्त्वकारणैः । न निर्वदति राजानं लभते सम्पदं पुनः ॥ ४० ॥ प्रत्यक्षं च परोक्षं च गुणवादी विचक्षणः । उपजीवी भवेद् राज्ञो विषये योऽपि वा भवेत् ॥ ४१ ॥ यदि कोई मन्त्री पहले राजाका कृपापात्र रहा हो और पीछे अकारण उसे दण्ड भोगना पड़ा हो, उस दशामें भी जो राजाकी निन्दा नहीं करता, वह पुनः अपने पूर्व वैभवको प्राप्त कर लेता है। जो बुद्धिमान् राजाके आश्रित रहकर जीवननिर्वाह अथवा उसके राज्यमें निवास करता है, उसे राजाके सामने अथवा पीठ पीछे भी उसके गुणोंकी ही चर्चा करनी चाहिये ॥ ४०-४१ ॥ अमात्यो हि बलाद् भोक्तुं राजानं प्रार्थयेत यः । न स तिष्ठेच्चिरं स्थानं गच्छेच्च प्राणसंशयम् ॥ ४२ ॥ जो मन्त्री राजाको बलपूर्वक अपने अधीन करना चाहता है, वह अधिक समयतक अपने पदपर नहीं टिक सकता। इतना ही नहीं, उसके प्राणोंपर भी संकट आ जाता है ॥ ४२ ॥ श्रेयः सदाऽऽत्मनो दृष्ट्वा परं राज्ञा न संवदेत् । विशेषयेच्च राजानं योग्यभूमिषु सर्वदा ॥ ४३ ॥ अपनी भलाई अथवा लाभ देखकर दूसरेको सदा राजाके साथ न मिलावे; न बातचीत करावे। उपयुक्त स्थान और अवसर देखकर सदा राजाकी विशेषता प्रकट करे ॥ ४३ ॥ अम्लानोबलवाञ्छूरश्छायेवानुगतः सदा । सत्यवादी मृदुर्दान्तः स राजवसतिं वसेत् ॥ ४४ ॥ जो उत्साहसम्पन्न, बुद्धि-बलसे युक्त, शूरवीर, सत्यवादी, कोमलस्वभाव और जितेन्द्रिय होकर सदा छायाकी भाँति राजाका अनुसरण करता है, वही राजदरबारमें टिक सकता है ॥ ४४ ॥ अन्यस्मिन् प्रेष्यमाणे तु पुरस्ताद् यः समुत्पतेत् । अहं किं करवाणीति स राजवसतिं वसेत् ॥ ४५ ॥ जब दूसरेको किसी कार्यके लिये भेजा जा रहा हो, उस समय जो स्वयं ही उठकर आगे जाय और पूछे—'मेरे लिये क्या आज्ञा है', वही राजभवनमें निवास कर सकता है ॥ ४५ ॥ आन्तरे चैव बाह्ये च राज्ञा यश्चाथ सर्वदा ।
आदिष्टो नैव कम्पेत स राजवसतिं वसेत् ॥ ४६ ॥ जो राजाके द्वारा आन्तरिक (धन एवं स्त्री आदिकी रक्षा) और बाह्य (शत्रुविजय आदि) कार्योंके लिये आदेश मिलनेपर कभी शंकित या भयभीत नहीं होता, वही राजाके यहाँ रह सकता है ॥ ४६ ॥
यो वै गृहेभ्यः प्रवसन् प्रियाणां नानुसंस्मरेत् । दुःखेन सुखमन्विच्छेत् स राजवसतिं वसेत् ॥ ४७ ॥ जो घर-बार छोड़कर परदेशमें पड़ा रहनेपर भी प्रियजनों एवं अभीष्ट भोगोंका स्मरण नहीं करता और कष्ट सहकर सुख पानेकी इच्छा करता है, वही राजदरबारमें टिक सकता है ॥ ४७ ॥
समवेषं न कुर्वीत नोच्चैः संनिहितो वसेत् । न मन्त्रं बहुधा कुर्यादेवं राज्ञः प्रियो भवेत् ॥ ४८ ॥ राजाके समान वेशभूषा न धारण करे। उसके अत्यन्त निकट न रहे। उसके सामने उच्च आसनपर न बैठे। अपने साथ राजाने जो गुप्त सलाह की हो, उसे दूसरोंपर प्रकट न करे। ऐसा करनेसे ही मनुष्य राजाका प्रिय हो सकता है ॥ ४८ ॥
न कर्मणि नियुक्तः सन् धनं किञ्चिदपि स्पृशेत् । प्राप्नोति हि हरन् द्रव्यं बन्धनं यदि वा वधम् ॥ ४९ ॥ यदि राजाने किसी कामपर नियुक्त किया हो, तो उसमें घूसके रूपमें थोड़ा भी धन न ले; क्योंकि जो इस प्रकार चोरीसे धन लेता है, उसे एक दिन बन्धन अथवा वधका दण्ड भोगना पड़ता है ॥ ४९ ॥
यानं वस्त्रमलङ्कारं यच्चान्यत् सम्प्रयच्छति । तदेव धारयेन्नित्यमेवं प्रियतरो भवेत् ॥ ५० ॥ राजा प्रसन्न होकर सवारी, वस्त्र, आभूषण तथा और भी जो कोई वस्तु दे, उसीको सदा धारण करे या उपयोगमें लावे। ऐसा करनेसे वह राजाका अधिक प्रिय होता है ॥ ५० ॥
एवं संयम्य चित्तानि यत्नतः पाण्डुनन्दनाः । संवत्सरमिमं तात तथाशीला बुभूषत । अथ स्वविषयं प्राप्य यथाकामं करिष्यथ ॥ ५१ ॥ तात युधिष्ठिर एवं पाण्डवो! इस प्रकार प्रयत्न-पूर्वक अपने मनको वशमें रखकर पूर्वोक्त रीतिसे उत्तम बर्ताव करते हुए इस तेरहवें वर्षको व्यतीत करो और इसी रूपमें रहकर ऐश्वर्य पानेकी इच्छा करो। तदनन्तर अपने राज्यमें आकर इच्छानुसार व्यवहार करना ॥ ५१ ॥
युधिष्ठिर उवाच
अनुशिष्टाः स्म भद्रं ते नैतद् वक्तास्ति कश्चन ।