महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2149, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवसामेहापरां रात्रिं बलवान् मे परिश्रमः ॥ ६ ॥ ‘महाराज! देखिये, यहाँ अनेक प्रकारके खेत और उनमें पहुँचनेके लिये बहुत-सी पगडंडियाँ दिखायी देती हैं। जान पड़ता है, विराटकी राजधानी अभी दूर होगी। मुझे बड़ी थकावट हो रही है, अतः हम एक रात और यहीं रहें’ ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
धनंजय समुद्यम्य पाञ्चालीं वह भारत । राजधान्यां निवत्स्यामो विमुक्ताश्च वनादितः ॥ ७ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**धनंजय! तुम द्रौपदीको कंधेपर उठाकर ले चलो। भारत! इस वनसे निकलकर अब हमलोग राजधानीमें ही निवास करेंगे ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
तामादायार्जुनस्तूर्णं द्रौपदीं गजराडिव । सम्प्राप्य नगराध्याशमवतारयदर्जुनः ॥ ८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तब गजराजके समान पराक्रमी अर्जुनने तुरंत ही द्रौपदीको उठा लिया और नगरके निकट पहुँचकर उन्हें कंधेसे उतारा ॥ ८ ॥
स राजधानीं सम्प्राप्य कौन्तेयोऽर्जुनमब्रवीत् । क्वायुधानि समासज्ज्य प्रवेक्ष्यामः पुरं वयम् ॥ ९ ॥ राजधानीके समीप पहुँचकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अर्जुनसे कहा—‘भैया! हम अपने अस्त्र-शस्त्र कहाँ रखकर नगरमें प्रवेश करें? ॥ ९ ॥
सायुधाश्च प्रवेक्ष्यामो वयं तात पुरं यदि । समुद्वेगं जनस्यास्य करिष्यामो न संशयः ॥ १० ॥ ‘तात! यदि अपने आयुधोंके साथ हम नगरमें प्रवेश करेंगे, तो निःसंदेह यहाँके निवासियोंको उद्वेग (भय) में डाल देंगे ॥ १० ॥
गाण्डीवं च महत् गाढं लोके च विदितं नृणाम् । तच्चेदायुधमादाय गच्छामो नगरं वयम् । क्षिप्रमस्मान् विजानीयुर्मनुष्या नात्र संशयः ॥ ११ ॥ ‘तुम्हारा गाण्डीव धनुष तो बहुत बड़ा और भारी है। संसारके सब लोगोंमें उसकी प्रसिद्धि है। ऐसी दशामें यदि हम अस्त्र-शस्त्र लेकर नगरमें चलेंगे, तो यहाँ सब लोग हमें शीघ्र ही पहचान लेंगे। इसमें संशय नहीं है ॥ ११ ॥
ततो द्वादश वर्षाणि प्रवेष्टव्यं वने पुनः । एकस्मिन्नपि विज्ञाते प्रतिज्ञातं हि नस्तथा ॥ १२ ॥ ‘यदि हममेंसे एक भी पहचान लिया गया, तो हमें दुबारा बारह वर्षोंके लिये वनमें प्रवेश करना पड़ेगा; क्योंकि हमने ऐसी ही प्रतिज्ञा कर रखी है’ ॥ १२ ॥