महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्जुन उवाच
इयं कूटे मनुष्येन्द्र गहना महती शमी । भीमशाखा दुरारोहा श्मशानस्य समीपतः ॥ १३ ॥ अर्जुनने कहा— राजन्! श्मशानभूमिके समीप एक टीलेपर यह शमीका बहुत बड़ा सघन वृक्ष है। इसकी शाखाएँ बड़ी भयानक हैं, इससे इसपर चढ़ना कठिन है ॥ ५३ ॥
न चापि विद्यते कश्चिन्मनुष्य इति मे मतिः । योऽस्मान् निदधतो द्रष्टा भवेच्छस्त्राणि पाण्डवाः ॥ १४ ॥ पाण्डवो! मेरा विश्वास है कि यहाँ कोई ऐसा मनुष्य नहीं है, जो हमें अपने अस्त्र-शस्त्रोंको यहाँ रखते समय देख सके ॥ १४ ॥
उत्पथे हि वने जाता मृगव्यालनिषेविते । समीपे च श्मशानस्य गहनस्य विशेषतः ॥ १५ ॥ समाधायायुधं शम्यां गच्छामो नगरं प्रति । एवमत्र यथायोगं विहरिष्याम भारत ॥ १६ ॥ यह वृक्ष रास्तेसे बहुत दूर जंगलमें है। इसके आसपास हिंसक जीव और सर्प आदि रहते हैं। विशेषतः यह दुर्गम श्मशानभूमिके निकट है; (अतः यहाँतक किसीके आने या वृक्षपर चढ़नेकी सम्भावना नहीं है;) इसलिये इसी शमीवृक्षपर हम अपने अस्त्र-शस्त्र रखकर नगरमें चलें। भारत! ऐसा करके हम यहाँ जैसा सुयोग होगा, उसके अनुसार विचरण करेंगे ॥ १५-१६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स राजानं धर्मराजं युधिष्ठिरम् । प्रचक्रमे निधानाय शस्त्राणां भरतर्षभ ॥ १७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! धर्मराज राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर अर्जुन वहाँ अस्त्र-शस्त्रोंको रखनेके प्रयत्नमें लग गये ॥ १७ ॥
येन देवान् मनुष्यांश्च सर्वांश्चैकरथोऽजयत् । स्फीताञ्जनपदांश्चान्यानजयत् कुरुपुङ्गवः ॥ १८ ॥ तदुदारं महाघोषं सम्पन्नबलसूदनम् । अपज्यमकरोत् पार्थो गाण्डीवं सुभयंकरम् ॥ १९ ॥ कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने जिस धनुषके द्वारा एकमात्र रथका आश्रय ले सम्पूर्ण देवताओं और मनुष्योंपर विजय पायी थी तथा अन्यान्य अनेक समृद्धिशाली जनपदोंपर विजय-पताका फहरायी थी, जिस धनुषने दिव्य बलसे सम्पन्न असुरों आदिकी सेनाओंका संहार किया था, जिसकी टंकारध्वनि बहुत दूरतक फैलती है, उस उदार तथा अत्यन्त भयंकर गाण्डीव धनुषकी प्रत्यंचा अर्जुनने उतार डाली ॥ १८-१९ ॥