महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरंतु उस वनमें श्रेष्ठ यक्षके रूपमें आये हुए उन धर्मराजने मेरे भाइयोंको उसी प्रकार धराशायी कर दिया, जैसे वज्रधारी इन्द्र महान् संग्राममें दानवोंको मार गिराते हैं। तब मैंने वहाँ जाकर उनके प्रश्नोंका उत्तर दे उन वरदायक गुरुरूप पिताको संतुष्ट किया।
स मे प्रसन्नो भगवान् वरं ददौ परिष्वजंश्चाह तथैव सौहृदात् । वृणीष्व यद् वाञ्छसि पाण्डुनन्दन स्थितोऽन्तरिक्षे वरदोऽस्मि पश्यताम् ॥
उस समय प्रसन्न हो भगवान् धर्मने बड़े स्नेहसे मुझे हृदयसे लगाया और वर देनेके लिये उद्यत हो मुझसे कहा—'पाण्डुनन्दन! तुम जो कुछ चाहते हो, वह मुझसे माँग लो। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आकाशमें खड़ा हूँ। मेरी ओर देखो।'
स वै मयोक्तो वरदः पिता प्रभुः सदैव मे धर्मरता मतिर्भवेत् । इमे च जीवन्तु ममानुजाः प्रभो वपुश्च रूपं च बलं तथाप्नुयुः ॥
तब मैंने अपने वरदायक पिता भगवान् धर्मराजसे कहा—'प्रभो! मेरी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहे तथा ये मेरे छोटे भाई जीवित हो जायें और पहले-जैसा रूप, युवावस्था एवं बल प्राप्त कर लें।
क्षमा च कीर्तिश्च यथेष्टतो भवेद् व्रतं च सत्यं च समाप्तिरेव च । वरो ममैषोऽस्तु यथानुकीर्तितो न तन्मृषा देववरो यदब्रवीत् ॥
'हमलोगोंमें इच्छानुसार क्षमा और कीर्ति हो और हम अपने सत्यव्रतको पूर्ण कर लें; यही वर हमें प्राप्त होना चाहिये।' जैसा कि मैंने बताया, वैसा ही वर उन्होंने दिया। देवेश्वर धर्मने जैसा कहा है, वह कभी मिथ्या नहीं हो सकता।
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा धर्मात्मा धर्ममेवानुचिन्तयन् । तदैव तत्प्रसादेन रूपमेवाभजत् स्वकम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिर उस समय धर्मका ही बार-बार चिन्तन करने लगे। तब धर्मदेवके प्रसादसे उन्होंने तत्काल अपने अभीष्ट स्वरूपको प्राप्त कर लिया।
स वै द्विजातिस्तरुणस्त्रिदण्डधृक् कमण्डलूष्णीषधरोऽन्वजायत ।