महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2161, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुरक्तमाञ्जिष्ठवराम्बरः शिखी पवित्रपाणिर्ददृशे तदद्भुतम् ।। वे कमण्डलु और पगड़ी धारण किये त्रिदण्डधारी तरुण ब्राह्मण बन गये। उनके शरीरपर मँजीठके रंगे सुन्दर लाल वस्त्र शोभा पाने लगे तथा मस्तकपर शिखा दिखायी देने लगी। वे हाथमें कुश लिये अद्भुत रूपमें दृष्टिगोचर होने लगे।
तथैव तेषामपि धर्मचारिणां यथेप्सिता ह्याभरणाम्बरस्रजः । क्षणेन राजन्नभवन्महात्मनां प्रशस्तधर्माग्र्यफलाभिकाङ्क्षिणाम् ॥) राजन्! इसी प्रकार उत्तम धर्मके श्रेष्ठ फलकी अभिलाषा रखनेवाले उन सभी धर्मचारी महात्मा पाण्डवोंको क्षणभरमें उनके अभीष्ट वेशके अनुरूप वस्त्र, आभूषण और माला आदि वस्तुएँ प्राप्त हो गयीं।
ततो विराटं प्रथमं युधिष्ठिरो राजा सभायामुपविष्टमाव्रजत् । वैदूर्यरूपान् प्रतिमुच्य काञ्चना- नक्षान् स कक्षे परिगृह्य वाससा ।। १ ।। तदनन्तर वैदूर्यके समान हरी, सुवर्णके समान पीली (तथा लाल और काली) चौसरकी गोटियोंसहित पासोंको कपड़ेमें बाँधकर बगलमें दबाये हुए राजा युधिष्ठिर सबसे पहले राजाके दरबारमें गये। उस समय राजा विराट सभामें बैठे थे ।। १ ।।
नराधिपो राष्ट्रपतिं यशस्विनं महायशाः कौरववंशवर्धनः । महानुभावो नरराजसत्कृतो दुरासदस्तीक्ष्णविषो यथोरगः ।। २ ।। बलेन रूपेण नरर्षभो महा- नपूर्वरूपेण यथामरस्तथा । महाभ्रजालैरिव संवृतो रवि- र्यथानलो भस्मवृतश्च वीर्यवान् ।। ३ ।। वे बड़े यशस्वी और मत्स्यराष्ट्रके अधिपति थे। राजा युधिष्ठिर भी महान् यशस्वी, कौरववंशकी मर्यादाको बढ़ानेवाले तथा महानुभाव (अत्यन्त प्रभावशाली) थे। सब राजे-महाराजे उनका सत्कार करते थे। तीखे विषवाले सर्पकी भाँति वे दुर्धर्ष थे। बल और रूपकी दृष्टिसे मनुष्योंमें सबसे श्रेष्ठ और महान् थे। अपने अपूर्व रूपके कारण वे देवताके समान जान पड़ते थे। महामेघमालाओंसे आवृत सूर्य तथा राखमें छिपी हुई अग्निके समान उनका तेजस्वी रूप वेशभूषासे आच्छादित था। वे बड़े पराक्रमी थे ।। २-३ ।।