भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2162

तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य पाण्डवं विराटराडिन्दुमिवाभ्रसंवृतम्। समागतं पूर्णशशिप्रभाननं महानुभावं न चिरेण दृष्टवान्॥ ४॥ उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहा था। बादलोंसे ढके हुए चन्द्रमाकी भाँति शोभायमान महानुभाव पाण्डुनन्दनको आते देख राजा विराटकी दृष्टि सहसा उनकी ओर आकृष्ट हो गयी। निकट आनेपर शीघ्र ही उन्होंने बड़े गौरसे उनकी ओर देखा॥ ४॥

मन्त्रिद्विजान् सूतमुखान् विशस्तथा ये चापि केचित् परितः समासते। पप्रच्छ कोऽयं प्रथमं समेयिवान् नृपोपमोऽयं समवेक्षते सभाम्॥ ५॥ मन्त्री, ब्राह्मण, सूत-मागध आदि, वैश्यगण तथा अन्य जो कोई भी सभासद् उनके दायें-बायें सब ओर बैठे थे, उन सबसे राजाने पूछा—'ये कौन हैं? जो पहले-पहल यहाँ पधारे हैं? ये तो किसी राजाकी भाँति मेरी सभाको निहार रहे हैं'॥ ५॥

न तु द्विजोऽयं भविता नरोत्तमः पतिः पृथिव्या इति मे मनोगतम्। न चास्य दासो न रथो न कुञ्जरः समीपतो भ्राजति चायमिन्द्रवत्॥ ६॥ इनका वेश तो ब्राह्मणका-सा है, किंतु ये ब्राह्मण नहीं हो सकते। ये नरश्रेष्ठ तो कहींके भूपति ही होंगे; ऐसा विचार मेरे मनमें उठ रहा है। परंतु इनके साथ दास, रथ और हाथी-घोड़े आदि कुछ भी नहीं हैं। फिर भी ये निकटसे इन्द्रके समान सुशोभित हो रहे हैं॥ ६॥

शरीरलिङ्गैरुपसूचितो ह्ययं मूर्द्धाभिषिक्त इति मे मनोगतम्। समीपमायाति च मे गतव्यथो यथा गजस्तामरसीं मदोत्कटः॥ ७॥ 'इनके शरीरमें जो लक्षण दृष्टिगोचर हो रहे हैं, उनसे यह सूचित होता है कि ये मूर्द्धाभिषिक्त सम्राट् हैं। मेरे मनमें तो यही बात आती है। जैसे मतवाला हाथी बेखटके किसी कमलिनीके पास जाता हो, उसी प्रकार ये बिना किसी संकोचके—व्यथारहित होकर मेरी सभामें आ रहे हैं'॥ ७॥

वितर्कयन्तं तु नर्षभस्तथा युधिष्ठिरोऽभ्येत्य विराटमब्रवीत्। सम्राड्विजानात्विह जीवनार्थिनं विनष्टसर्वस्वमुपागतं द्विजम्॥ ८॥