महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सुरक्तमाञ्जिष्ठवराम्बरः शिखी पवित्रपाणिर्ददृशे तदद्भुतम् ।। वे कमण्डलु और पगड़ी धारण किये त्रिदण्डधारी तरुण ब्राह्मण बन गये। उनके शरीरपर मँजीठके रंगे सुन्दर लाल वस्त्र शोभा पाने लगे तथा मस्तकपर शिखा दिखायी देने लगी। वे हाथमें कुश लिये अद्भुत रूपमें दृष्टिगोचर होने लगे।
तथैव तेषामपि धर्मचारिणां यथेप्सिता ह्याभरणाम्बरस्रजः । क्षणेन राजन्नभवन्महात्मनां प्रशस्तधर्माग्र्यफलाभिकाङ्क्षिणाम् ॥) राजन्! इसी प्रकार उत्तम धर्मके श्रेष्ठ फलकी अभिलाषा रखनेवाले उन सभी धर्मचारी महात्मा पाण्डवोंको क्षणभरमें उनके अभीष्ट वेशके अनुरूप वस्त्र, आभूषण और माला आदि वस्तुएँ प्राप्त हो गयीं।
ततो विराटं प्रथमं युधिष्ठिरो राजा सभायामुपविष्टमाव्रजत् । वैदूर्यरूपान् प्रतिमुच्य काञ्चना- नक्षान् स कक्षे परिगृह्य वाससा ।। १ ।। तदनन्तर वैदूर्यके समान हरी, सुवर्णके समान पीली (तथा लाल और काली) चौसरकी गोटियोंसहित पासोंको कपड़ेमें बाँधकर बगलमें दबाये हुए राजा युधिष्ठिर सबसे पहले राजाके दरबारमें गये। उस समय राजा विराट सभामें बैठे थे ।। १ ।।
नराधिपो राष्ट्रपतिं यशस्विनं महायशाः कौरववंशवर्धनः । महानुभावो नरराजसत्कृतो दुरासदस्तीक्ष्णविषो यथोरगः ।। २ ।। बलेन रूपेण नरर्षभो महा- नपूर्वरूपेण यथामरस्तथा । महाभ्रजालैरिव संवृतो रवि- र्यथानलो भस्मवृतश्च वीर्यवान् ।। ३ ।। वे बड़े यशस्वी और मत्स्यराष्ट्रके अधिपति थे। राजा युधिष्ठिर भी महान् यशस्वी, कौरववंशकी मर्यादाको बढ़ानेवाले तथा महानुभाव (अत्यन्त प्रभावशाली) थे। सब राजे-महाराजे उनका सत्कार करते थे। तीखे विषवाले सर्पकी भाँति वे दुर्धर्ष थे। बल और रूपकी दृष्टिसे मनुष्योंमें सबसे श्रेष्ठ और महान् थे। अपने अपूर्व रूपके कारण वे देवताके समान जान पड़ते थे। महामेघमालाओंसे आवृत सूर्य तथा राखमें छिपी हुई अग्निके समान उनका तेजस्वी रूप वेशभूषासे आच्छादित था। वे बड़े पराक्रमी थे ।। २-३ ।।
तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य पाण्डवं विराटराडिन्दुमिवाभ्रसंवृतम्। समागतं पूर्णशशिप्रभाननं महानुभावं न चिरेण दृष्टवान्॥ ४॥ उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहा था। बादलोंसे ढके हुए चन्द्रमाकी भाँति शोभायमान महानुभाव पाण्डुनन्दनको आते देख राजा विराटकी दृष्टि सहसा उनकी ओर आकृष्ट हो गयी। निकट आनेपर शीघ्र ही उन्होंने बड़े गौरसे उनकी ओर देखा॥ ४॥
मन्त्रिद्विजान् सूतमुखान् विशस्तथा ये चापि केचित् परितः समासते। पप्रच्छ कोऽयं प्रथमं समेयिवान् नृपोपमोऽयं समवेक्षते सभाम्॥ ५॥ मन्त्री, ब्राह्मण, सूत-मागध आदि, वैश्यगण तथा अन्य जो कोई भी सभासद् उनके दायें-बायें सब ओर बैठे थे, उन सबसे राजाने पूछा—'ये कौन हैं? जो पहले-पहल यहाँ पधारे हैं? ये तो किसी राजाकी भाँति मेरी सभाको निहार रहे हैं'॥ ५॥
न तु द्विजोऽयं भविता नरोत्तमः पतिः पृथिव्या इति मे मनोगतम्। न चास्य दासो न रथो न कुञ्जरः समीपतो भ्राजति चायमिन्द्रवत्॥ ६॥ इनका वेश तो ब्राह्मणका-सा है, किंतु ये ब्राह्मण नहीं हो सकते। ये नरश्रेष्ठ तो कहींके भूपति ही होंगे; ऐसा विचार मेरे मनमें उठ रहा है। परंतु इनके साथ दास, रथ और हाथी-घोड़े आदि कुछ भी नहीं हैं। फिर भी ये निकटसे इन्द्रके समान सुशोभित हो रहे हैं॥ ६॥
शरीरलिङ्गैरुपसूचितो ह्ययं मूर्द्धाभिषिक्त इति मे मनोगतम्। समीपमायाति च मे गतव्यथो यथा गजस्तामरसीं मदोत्कटः॥ ७॥ 'इनके शरीरमें जो लक्षण दृष्टिगोचर हो रहे हैं, उनसे यह सूचित होता है कि ये मूर्द्धाभिषिक्त सम्राट् हैं। मेरे मनमें तो यही बात आती है। जैसे मतवाला हाथी बेखटके किसी कमलिनीके पास जाता हो, उसी प्रकार ये बिना किसी संकोचके—व्यथारहित होकर मेरी सभामें आ रहे हैं'॥ ७॥
वितर्कयन्तं तु नर्षभस्तथा युधिष्ठिरोऽभ्येत्य विराटमब्रवीत्। सम्राड्विजानात्विह जीवनार्थिनं विनष्टसर्वस्वमुपागतं द्विजम्॥ ८॥
इस प्रकार तर्क-वितर्कमें पड़े हुए राजा विराटके पास आकर नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरने कहा—'महाराज! आपको विदित हो; मैं एक ब्राह्मण हूँ, मेरा सर्वस्व नष्ट हो गया है; अतः मैं आपके यहाँ जीवननिर्वाहके लिये आया हूँ ॥ ८ ॥
इहाहमिच्छामि तवानघान्तिके वस्तुं यथा कामचरस्तथा विभो । तमब्रवीत् स्वागतमित्यनन्तरं राजा प्रहृष्टः प्रतिसंगृहाण च ॥ ९ ॥ तं राजसिंहं प्रतिगृह्य राजा प्रीत्याऽऽत्मना चैनमिदं बभाषे । कामेन ताताभिवदाम्यहं त्वां कस्यासि राज्ञो विषयादिहागतः ॥ १० ॥
'अनघ! मैं यहाँ आपके समीप रहना चाहता हूँ। प्रभो! जैसी आपकी इच्छा होगी, उसी प्रकार सब कार्य करते हुए मैं यहाँ रहूँगा।' युधिष्ठिरकी बात सुनकर राजा विराट बहुत प्रसन्न हुए और बोले—'ब्रह्मन्! आपका स्वागत है।' तदनन्तर उन्होंने राजाओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरको सादर ग्रहण किया। ग्रहण करके राजा विराटने प्रसन्न मनसे उनसे इस प्रकार कहा—'तात! मैं प्रेमपूर्वक आपसे पूछता हूँ, आप इस समय किस राजाके राज्यसे यहाँ आये हैं? ॥ ९-१० ॥
गोत्रं च नामापि च शंस तत्त्वतः
किं चापि शिल्पं तव विद्यते कृतम् ॥ ११ ॥
‘अपने गोत्र और नाम भी ठीक-ठीक बताइये। साथ ही यह भी कहें कि आपने किस विद्या या कलामें कुशलता प्राप्त की है ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
युधिष्ठिरस्यासमहं पुरा सखा
वैयाघ्रपद्यः पुनरस्मि विप्रः ।
अक्षान् प्रयोक्तुं कुशलोऽस्मि देविनां
कङ्केति नाम्नास्मि विराट विश्रुतः ॥ १२ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**महाराज विराट! मैं वैयाघ्रपद-गोत्रमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण हूँ। लोगोंमें ‘कंक’ नामसे मेरी प्रसिद्धि है। मैं पहले राजा युधिष्ठिरके साथ रहता था। वे मुझे अपना सखा मानते थे। मैं चौसर खेलनेवालोंके बीच पासे फेंकनेकी कलामें कुशल हूँ ॥ १२ ॥
विराट उवाच
ददामि ते हन्त वरं यमिच्छसि
प्रशाधि मत्स्यान् वशगो ह्यहं तव ।
प्रियाश्च धूर्ता मम देविनः सदा
भवांश्च देवोपम राज्यमर्हति ॥ १३ ॥
विराट बोले—ब्रह्मन्! मैं आपको वर देता हूँ; आप जो चाहें, माँग लें। समूचे मत्स्यदेशपर शासन करें। मैं आपके वशमें हूँ; क्योंकि द्यूतक्रीडामें निपुण, चतुर, चालाक मनुष्य मुझे सदा प्रिय हैं। देवोपम ब्राह्मण! आप तो राज्य पानेके योग्य हैं ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
प्राप्तो विवादः प्रथमं विशाम्पते
न विद्यते कं च न मत्स्य हीनतः ।
न मे जितः कश्चन धारयेद् धनं
वरो ममैषोऽस्तु तव प्रसादजः ॥ १४ ॥
युधिष्ठिरने कहा—मत्स्यराज! नरनाथ! मुझे किसी हीन वर्णके मनुष्यसे विवाद न करना पड़े, यह मैं पहला वर माँगता हूँ तथा मुझसे पराजित होनेवाला कोई भी मनुष्य हारे हुए धनको अपने पास न रखे (मुझे दे दे)। आपकी कृपासे यह दूसरा वर मुझे प्राप्त हो जाय, तो मैं रह सकता हूँ ॥ १४ ॥
विराट उवाच
हन्यामवश्यं यदि तेऽप्रियं चरेत्
प्रव्राजयेयं विषयाद् द्विजांस्तथा ।
शृण्वन्तु मे जानपदाः समागताः
कङ्को यथाहं विषये प्रभुस्तथा ॥ १५ ॥
विराट बोले—ब्रह्मन्! यदि कोई ब्राह्मणेतर मनुष्य आपका अप्रिय करेगा तो उसे मैं निश्चय ही प्राण-दण्ड दूँगा। यदि ब्राह्मणोंने आपका अपराध किया तो उन्हें देशसे निकाल दूँगा। [युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर राजा विराट अन्य सभासदोंसे बोले—] मेरे राज्यमें निवास करनेवाले और इस सभामें आये हुए लोगो! मेरी बात सुनो, जैसे मैं इस मत्स्यदेशका स्वामी हूँ, वैसे ही ये कंक भी हैं ॥ १५ ॥
समानयानो भवितासि मे सखा
प्रभूतवस्त्रो बहुपानभोजनः ।
पश्येस्त्वमन्तश्च बहिश्च सर्वदा
कृतं च ते द्वारमपावृतं मया ॥ १६ ॥
[फिर वे युधिष्ठिरसे बोले—] कंक! आजसे आप मेरे सखा हैं। जैसी सवारीमें मैं चलता हूँ, वैसी ही आपको भी मिलेगी। पहननेके वस्त्र और भोजन-पान आदिका प्रबन्ध भी
आपके लिये पर्याप्त मात्रामें रहेगा। बाहरके राज्य-कोश, उद्यान और सेना आदि तथा भीतरके धन-दारा आदिकी भी देख-भाल आप ही करें। मेरे आदेशसे आपके लिये राजमहलका द्वार सदा खुला रहेगा; आपसे कोई परदा नहीं रखा जायगा ॥ १६ ॥
ये त्वानुवादेऽयुरवृत्तिकर्शिता ब्रूयाश्च तेषां वचनेन मां सदा । दास्यामि सर्वं तदहं न संशयो न ते भयं विद्यति संनिधौ मम ॥ १७ ॥
जो लोग जीविकाके अभावमें कष्ट पा रहे हों और अनुवादके लिये अर्थात् पहलेके स्थायी तौरपर दिये हुए खेत और बगीचे आदिको पुनः उपयोगमें लानेके निमित्त नूतन राजाज्ञा प्राप्त करनेके लिये आपके पास आवें, उनके अनुरोधपूर्ण वचनसे आप सदा उनकी प्रार्थना मुझे सुना सकते हैं। विश्वास रखिये, आपके कथनानुसार उन याचकोंको मैं सब कुछ दूँगा; इसमें संशय नहीं है। आपको मेरे पास आने या कुछ कहनेमें भयभीत होनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
(एवं तु राज्ञः प्रथमः समागमो बभूव मात्स्यस्य युधिष्ठिरस्य च । विराटराजस्य हि तेन संगमो बभूव विष्णोरिव वज्रपाणिना ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार वहाँ राजा युधिष्ठिर तथा मत्स्यनरेशकी प्रथम भेंट हुई। जैसे भगवान् विष्णुका वज्रधारी इन्द्रसे मिलन हुआ हो, उसी प्रकार विराटनरेशका राजा युधिष्ठिरके साथ समागम हुआ।
तमासनस्थं प्रियरूपदर्शनं निरीक्षमाणो न ततर्प भूमिपः । सभां च तां प्रज्वलयन् युधिष्ठिरः श्रिया यथा शक्र इव त्रिविष्टपम् ॥)
युधिष्ठिरके स्वरूपका दर्शन विराटराजको बहुत प्रिय लगा। जब वे आसनपर बैठ गये, तब राजा विराट उन्हें एकटक निहारने लगे। उनके दर्शनसे वे तृप्त ही नहीं होते थे। जैसे इन्द्र अपनी कान्तिसे स्वर्गकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार राजा युधिष्ठिर उस सभाको प्रकाशित कर रहे थे।
एवं स लब्ध्वा तु वरं समागमं विराटराजेन नरर्षभस्तदा । उवास धीरः परमार्चितः सुखी
न चापि कश्चिच्चरितं बुबोध तत् ॥ १८ ॥
धीर स्वभाववाले नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर उस समय राजा विराटके साथ इस प्रकार अच्छे ढंगसे मिलकर और उनके द्वारा परम आदर-सत्कार पाकर वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे। उनका वह चरित्र किसीको भी मालूम नहीं हुआ ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरप्रवेशो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिरप्रवेशविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2168)
अष्टमोऽध्यायः
भीमसेनका राजा विराटकी सभामें प्रवेश और राजाके द्वारा आश्वासन पाना
वैशम्पायन उवाच
अथापरो भीमबलः श्रियाज्वल-
न्नुपाययौ सिंहविलासविक्रमः ।
खजां च दर्बीं च करेण धारय-
न्नसिं च कालाङ्गमकोशमव्रणम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर द्वितीय पाण्डव भयंकर बलशाली भीमसेन सिंहकी-सी मस्त चालसे चलते हुए राजाके दरबारमें आये। वे अपने सहज तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उन्होंने हाथमें मथानी, करछी और शाक काटनेके लिये एक काले रंगका तीखी धारवाला छुरा ले रखा था। उनका वह छुरा टूटा-फूटा न था और न उसके ऊपर कोई आवरण था ॥ १ ॥
स सूदरूपः परमेण वर्चसा
रविर्यथा लोकमिमं प्रकाशयन् ।
स कृष्णवासा गिरिराजसारवां-
स्तं मत्स्यराजं समुपेत्य तस्थिवान् ॥ २ ॥
वे यद्यपि रसोइयेके वेशमें थे, तो भी अपने उत्कृष्ट तेजसे इस लोकको प्रकाशित करनेवाले सूर्यदेवकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। उनके वस्त्र काले थे और उनका शरीर पर्वतराज मेरुके समान सुदृढ़ था। वे मत्स्यराज विराटके समीप आकर खड़े हो गये ॥ २ ॥
तं प्रेक्ष्य राजा रमयन्नुपागतं
ततोऽब्रवीज्जानपदान् समागतान् ।
सिंहोन्नतांसोऽयमतीव रूपवान्
प्रदृश्यते को नु नरर्षभो युवा ॥ ३ ॥
अपने पास आये हुए भीमसेनको देखकर उन्हें प्रसन्न करते हुए राजा विराट मत्स्य जनपदके निवासी समागत सभासदोंसे बोले—'सिंहके समान ऊँचे कंधोंवाला और मनुष्योंमें श्रेष्ठ यह जो अत्यन्त रूपवान् युवक दिखायी दे रहा है; कौन है? ॥ ३ ॥
अदृष्टपूर्वः पुरुषो रविर्यथा
वितर्कयन् नास्य लभामि निश्चयम् ।
तथास्य चित्तं ह्यपि संवितर्कयन्
नरर्षभस्यास्य न यामि तत्त्वतः ॥ ४ ॥ 'आजसे पहले कभी इसका दर्शन नहीं हुआ है। यह वीर पुरुष सूर्यके समान तेजस्वी है। मैं बहुत सोच-विचारकर भी इसके विषयमें किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाता। यहाँ आनेमें इस श्रेष्ठ पुरुषका आन्तरिक अभिप्राय क्या है? इसपर भी मैंने बहुत तर्क-वितर्क किया है; परंतु किसी वास्तविक परिणामतक नहीं पहुँच पा रहा हूँ ॥ ४ ॥ दृष्ट्वैव चैनं तु विचारयाम्यहं गन्धर्वराजो यदि वा पुरंदरः । जानीत कोऽयं मम दर्शने स्थितो यदीप्सितं तल्लभतां च मा चिरम् ॥ ५ ॥ 'इसे देखकर ही मैं सोचने लगा हूँ कि यह गन्धर्वराज हैं या देवराज इन्द्र? मेरी दृष्टिके सामने खड़ा हुआ यह युवक कौन है, इसका पता लगाओ और यह जो कुछ पाना चाहता हो, वह सब इसे मिल जाना चाहिये; इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये' ॥ ५ ॥ विराटवाक्येन च तेन चोदिता नरा विराटस्य सुशीघ्रगामिनः । उपेत्य कौन्तेयमथाब्रुवंस्तदा यथा स राजावदताच्युतानुजम् ॥ ६ ॥ राजा विराटके पूर्वोक्त आदेशसे प्रेरित हो दरबारीलोग शीघ्रतापूर्वक धर्मराज युधिष्ठिरके छोटे भाई कुन्तीपुत्र भीमसेनके समीप गये तथा राजाने जैसे कहा था, उसी प्रकार उनका परिचय पूछा ॥ ६ ॥ ततो विराटं समुपेत्य पाण्डव- स्त्वदीनरूपं वचनं महामनाः । उवाच सूदोऽस्मि नरेन्द्र बल्लवो भजस्व मां व्यञ्जनकारमुत्तमम् ॥ ७ ॥ तब महामना पाण्डुनन्दन भीम विराटके अत्यन्त निकट जाकर दीनतारहित वाणीमें बोले—'नरेन्द्र! मैं रसोइया हूँ। मेरा नाम बल्लव है। मैं बहुत उत्तम व्यंजन बनाता हूँ। आप मुझे अपने यहाँ इस कार्यके लिये रख लीजिये' ॥ ७ ॥ विराट उवाच न सूदतां बल्लव श्रद्दधामि ते सहस्रनेत्रप्रतिमो विराजसे । श्रिया च रूपेण च विक्रमेण च प्रभाससे त्वं नृवरो नरेष्विव ॥ ८ ॥
विराट बोले— बल्लव! तुम रसोइये हो, इस बातपर मुझे विश्वास नहीं होता। तुम तो इन्द्रके समान तेजस्वी दिखायी देते हो। अपने अद्भुत रूप, दिव्य शोभा और महान् पराक्रमसे तुम मनुष्योंमें कोई श्रेष्ठ पुरुष अथवा राजा प्रतीत होते हो ।। ८ ।।
भीम उवाच
नरेन्द्र सूदः परिचारकोऽस्मि ते जानामि सूपान् प्रथमं च केवलान् । आस्वादिता ये नृपते पुराभवन् युधिष्ठिरेणापि नृपेण सर्वशः ।। ९ ।।
भीमसेनने कहा— महाराज! मैं रसोई बनानेवाला आपका सेवक हूँ। मैं भाँति-भाँतिके व्यंजन बनाना जानता हूँ जिनका बनाना केवल मुझे ही ज्ञात है। मेरे बनाये हुए व्यंजन उत्तम श्रेणीके होते हैं। राजन्! पहले महाराज युधिष्ठिरने भी उन सब प्रकारके व्यंजनोंका आस्वादन किया है ।। ९ ।।
बलेन तुल्यश्च न विद्यते मया नियुद्धशीलश्च सदैव पार्थिव । गजैश्च सिंहैश्च समेयिवानहं सदा करिष्यामि तवानघ प्रियम् ।। १० ।।
इसके सिवा शारीरिक बलमें भी मेरी समता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। भूपाल! मैं सदा कुश्ती लड़नेवाला पहलवान हूँ; हाथियों और सिंहोंसे भी भिड़ जाता हूँ। अनघ! मैं सदा आपको प्रिय लगनेवाला कार्य करूँगा ।। १० ।।
विराट उवाच
ददामि ते हन्त वरान् महानसे
तथा च कुर्याः कुशलं प्रभाषसे ।
अध्याय (पृष्ठ 2172)
| कंक (युधिष्ठिर) | वल्लभ (भीम) |
|---|---|
| बृहन्नला (अर्जुन) | ग्रंथिक (नकुल) |
| अरिष्टनेमी (सहदेव) | सैरंध्री (द्रौपदी) |
विराटके यहाँ पाण्डव
न चैव मन्ये तव कर्म यत् समं
समुद्रनेमिं पृथिवीं त्वमर्हसि ॥ ११ ॥
**विराट बोले—**बल्लव! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें अभीष्ट वर देता हूँ। तुम अपनेको भोजन बनानेके काममें कुशल बताते हो, तो मेरी पाकशालामें रहकर वही करो। किंतु मैं यह कार्य तुम्हारे योग्य नहीं समझता। तुम तो समुद्रसे घिरी हुई समूची पृथ्वीका शासन करनेके योग्य हो ॥ ११ ॥
तथा हि कामो भवतस्तथा कृतं
महानसे त्वं भव मे पुरस्कृतः ।
नराश्च ये तत्र समाहिताः पुरा
भवांश्च तेषामधिपो मया कृतः ॥ १२ ॥
तथापि जैसी तुम्हारी रुचि है, मैंने वैसा किया है। तुम मेरी पाकशालामें अग्रणी होकर रहो। जो लोग वहाँ पहलेसे नियुक्त हैं, मैंने तुम्हें उन सबका स्वामी बनाया ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
तथा स भीमो विहितो महानसे
विराटराज्ञो दयितोऽभवद् दृढम् ।
उवास राज्ये न च तं पृथग् जनो
बुबोध तत्रानुचराश्च केचन ॥ १३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार भीमसेन पाकशालामें नियुक्त हो राजा विराटके अत्यन्त प्रिय व्यक्ति होकर रहने लगे। उस राज्यके किसी भी मनुष्यने उनका रहस्य नहीं जाना और न उस पाकशालाके कोई सेवक ही उन्हें पहचान सके ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि भीमप्रवेशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें भीमप्रवेशसम्बन्धी आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2174)
नवमोऽध्यायः
द्रौपदीका सैरन्ध्रीके वेशमें विराटके रनिवासमें जाकर रानी सुदेष्णासे वार्तालाप करना और वहाँ निवास पाना
वैशम्पायन उवाच
ततः केशान् समुत्क्षिप्य वेल्लिताग्राननिन्दितान् ।
कृष्णान् सूक्ष्मान् मृदून् दीर्घान् समुद्ग्रथ्य शुचिस्मिता ॥ १ ॥
जुगूह दक्षिणे पार्श्वे मृदूनसितलोचना ।
वासश्च परिधायैकं कृष्णा सुमलिनं महत् ॥ २ ॥
कृत्वा वेषं च सैरन्ध्र्यास्ततो व्यचरदार्तवत् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर पवित्र मन्द मुसकान और कजरारे नेत्रोंवाली द्रौपदीने अपने सुन्दर, महीन, कोमल और बड़े-बड़े, काले एवं घुँघराले केशोंकी चोटी गूँथकर उन मृदुल अलकोंको दाहिने भागमें छिपा दिया और एक अत्यन्त मलिन वस्त्र धारण करके सैरन्ध्रीका वेश बनाये वह दीन-दुःखियोंकी भाँति नगरमें विचरने लगी ॥ १-२ १/२ ॥
तां नराः परिधावन्तीं स्त्रियश्च समुपाद्रवन् ॥ ३ ॥
अपृच्छंश्चैव तां दृष्ट्वा का त्वं किं च चिकीर्षसि ।
उसे इधर-उधर भटकती देख बहुत-सी स्त्रियाँ और पुरुष उसके पास दौड़े आये तथा पूछने लगे—'तुम कौन हो? और क्या करना चाहती हो?' ॥ ३ १/२ ॥
सा तानुवाच राजेन्द्र सैरन्ध्र्यहमिहागता ॥ ४ ॥
कर्म चेच्छामि वै कर्तुं तस्य यो मां युयुक्षति ।
तस्या रूपेण वेषेण श्लक्ष्णया च तथा गिरा ।
न श्रद्दधत तां दासीमन्नहेतोरुपस्थिताम् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! उनके इस प्रकार पूछनेपर द्रौपदीने उनसे कहा—'मैं सैरन्ध्री* हूँ। जो मुझे अपने यहाँ नियुक्त करना चाहे, उसीके यहाँ मैं सैरन्ध्रीका कार्य करना चाहती हूँ और इसीलिये यहाँ आयी हूँ।' उसके रूप, वेष और मधुर वाणीसे किसीको यह विश्वास नहीं हुआ कि यह दासी है और अन्न-वस्त्रके लिये यहाँ उपस्थित हुई है ॥ ४-५ ॥
विराटस्य तु कैकेयी भार्या परमसम्मता ।
आलोकयन्ती ददृशे प्रासादाद् द्रुपदात्मजाम् ॥ ६ ॥
इतनेमें ही राजा विराटकी अत्यन्त प्यारी भार्या केकय-राजकुमारी सुदेष्णाने, जो अपने महलपर खड़ी हुई नगरकी शोभा निहार रही थी, वहींसे द्रुपदकुमारीको देखा ॥ ६ ॥
सा समीक्ष्य तथारूपामनाथामेकवाससम्।
समाहूयाब्रवीद् भद्रे का त्वं किं च चिकीर्षसि ॥ ७ ॥
वह एक वस्त्र धारण किये थी एवं अनाथा-सी जान पड़ती थी। ऐसे दिव्य रूपवाली तरुणीको उस अवस्थामें देखकर रानीने उसे अपने पास बुलाया और पूछा—'भद्रे! तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो?'॥ ७ ॥
सा तामुवाच राजेन्द्र सैरन्ध्र्यहमुपागता।
कर्म चेच्छाम्यहं कर्तुं तस्य यो मां युयुक्षति ॥ ८ ॥
राजेन्द्र! तब द्रौपदीने रानी सुदेष्णासे कहा—'मैं सैरन्ध्री हूँ। जो मुझे अपने यहाँ नियुक्त करना चाहे, उसके यहाँ रहकर मैं सैरन्ध्रीका कार्य करना चाहती हूँ और इसीलिये यहाँ आयी हूँ'॥ ८ ॥
सुदेष्णोवाच
नैवंरूपा भवन्त्येव यथा वदसि भामिनि।
प्रेषयन्तीव वै दासीर्दासांश्च विविधान् बहून् ॥ ९ ॥
सुदेष्णाने कहा—भामिनि! तुम जैसा कह रही हो, उसपर विश्वास नहीं होता, क्योंकि तुम्हारी-जैसी रूपवती स्त्रियाँ सैरन्ध्री (दासी) नहीं हुआ करतीं। तुम तो बहुत-सी दासियों और नाना प्रकारके बहुतेरे दासोंको आज्ञा देनेवाली रानी-जैसी जान पड़ती हो ॥ ९ ॥
नोच्चगुल्फा संहतोरुस्त्रिगम्भीरा षडुन्नता।
रक्ता पञ्चसु रक्तेषु हंसगद्गदभाषिणी ॥ १० ॥
सुकेशी सुस्तनी श्यामा पीनश्रोणिपयोधरा।
तेन तेनैव सम्पन्ना काश्मीरीव तुरङ्गमी ॥ ११ ॥
अरालपक्ष्मिनयना बिम्बोष्ठी तनुमध्यमा।
कम्बुग्रीवा गूढशिरा पूर्णचन्द्रनिभानना ॥ १२ ॥
तुम्हारे गुल्फ ऊँचे नहीं हैं, दोनों जाँघें परस्पर सटी हुई हैं। तुम्हारी नाभि, वाणी और बुद्धि तीनोंमें गम्भीरता है। नाक, कान, आँख, स्तन, नख और घाँटी—इन छहों अंगोंमें ऊँचाई है। हाथों और पैरोंके तलवे, आँखके कोने, ओठ, जिह्वा और नख—इन पाँचों अंगोंमें स्वाभाविक लालिमा है। हंसोंकी भाँति मधुर एवं गद्गद वाणी है। तुम्हारे केश काले और चिकने हैं। स्तन बहुत सुन्दर हैं। अंगकान्ति श्याम है। नितम्ब और उरोज पीन हैं। ऊपर कही हुई प्रत्येक विशेषतासे तुम सम्पन्न हो। कश्मीरदेशकी घोड़ीके समान तुममें अनेक शुभ लक्षण हैं। तुम्हारे नेत्रोंकी पलकें काली और तिरछी हैं। ओष्ठ पके हुए बिम्बफलके समान लाल हैं। कमर पतली है। गर्दन शंखकी शोभाको छीने लेती है। नसें मांससे ढकी हुई हैं तथा मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा है॥ १०—१२॥
शारदोत्पलपत्राक्ष्या शारदोत्पलगन्धया।
शारदोत्पलसेविन्या रूपेण सदृशी श्रिया ॥ १३ ॥
तुम रूपमें उन्हीं लक्ष्मीके समान हो, जिनके नेत्र शरद्-ऋतुके विकसित कमलदलके समान विशाल हैं, जिनके अंगोंसे शरत्कालीन कमलकी-सी सुगन्ध फैलती रहती है तथा जो शरद्ऋतुके कमलोंका सेवन करती हैं ॥ १३ ॥
का त्वं ब्रूहि यथा भद्रे नासि दासी कथंचन । यक्षी वा यदि वा देवी गन्धर्वी यदि वाप्सराः ॥ १४ ॥ देवकन्या भुजङ्गी वा नगरस्याथ देवता । विद्याधरी किन्नरी वा यदि वा रोहिणी स्वयम् ॥ १५ ॥
कल्याणी! बताओ, तुम वास्तवमें कौन हो? दासी तो तुम किसी प्रकार भी नहीं हो सकतीं। तुम यक्षी हो या देवी? गन्धर्वकन्या हो या अप्सरा? देवकन्या हो या नागकन्या? अथवा इस नगरकी अधिष्ठात्री देवी तो नहीं हो? विद्याधरी, किन्नरी या साक्षात् चन्द्रदेवकी पत्नी रोहिणी तो नहीं हो? ॥ १४-१५ ॥
अलम्बुषा मिश्रकेशी पुण्डरीकाथ मालिनी । इन्द्राणी वारुणी वा त्वं त्वष्टुर्धातुः प्रजापतेः । देव्यो देवेषु विख्यातास्तासां त्वं कतमा शुभे ॥ १६ ॥
तुम अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका अथवा मालिनी नामकी अप्सरा तो नहीं हो? क्या तुम इन्द्राणी, वारुणी देवी, विश्वकर्माकी पत्नी अथवा प्रजापति ब्रह्माकी शक्ति सावित्री हो? शुभे! देवताओंके यहाँ जो प्रसिद्ध देवियाँ हैं, उनमेंसे तुम कौन हो? ।। १६ ।।
द्रौपद्युवाच
नास्मि देवी न गन्धर्वी नासुरी न च राक्षसी ।
सैरन्ध्री तु भुजिष्यास्मि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। १७ ।।
**द्रौपदी बोली—**रानीजी! मैं न तो देवी हूँ, न गन्धर्वी; न असुरपत्नी हूँ, न राक्षसी। मैं तो सेवा करनेवाली सैरन्ध्री हूँ। यह मैं आपसे सच-सच कह रही हूँ ।। १७ ।।
केशान् जानाम्यहं कर्तुं पिंषे साधु विलेपनम् ।
मल्लिकोत्पलपद्मानां चम्पकानां तथा शुभे ।। १८ ।।
ग्रथयिष्ये विचित्रांश्च स्रजः परमशोभनाः ।
मैं केशोंका शृंगार करना जानती हूँ तथा उबटन या अंगराग बहुत अच्छा पीस लेती हूँ। शुभे! मैं मल्लिका, उत्पल, कमल और चम्पा आदि फूलोंके बहुत सुन्दर एवं विचित्र हार भी गूँथ सकती हूँ ।। १८ १/२ ।।
आराधयं सत्यभामां कृष्णस्य महिषीं प्रियाम् ।। १९ ।।
कृष्णां च भार्यां पाण्डूनां कुरूणामेकसुन्दरीम् ।
पहले मैं श्रीकृष्णकी प्यारी रानी सत्यभामा तथा कुरुकुलकी एकमात्र सुन्दरी पाण्डवोंकी धर्मपत्नी द्रौपदीकी सेवामें रह चुकी हूँ ।। १९ १/२ ।।
तत्र तत्र चराम्येवं लभमाना सुभोजनम् ।। २० ।।
वासांसि यावन्ति लभे तावत् तावद् रमे तथा ।
मालिनीत्येव मे नाम स्वयं देवी चकार सा ।
साहमद्यागता देवि सुदेष्णे त्वन्निवेशनम् ।। २१ ।।
मैं भिन्न-भिन्न स्थानोंमें सेवा करके उत्तम भोजन पाती हुई विचरती हूँ। मुझे जितने वस्त्र मिल जाते हैं, उतनोंमें ही मैं प्रसन्न रहती हूँ। स्वयं देवी द्रौपदीने मेरा नाम 'मालिनी' रख दिया था। देवि सुदेष्णे! आज वही मैं सैरन्ध्री आपके महलमें आयी हूँ ।। २०-२१ ।।
सुदेष्णोवाच
मूर्ध्नि त्वां वासयेयं वै संशयो मे न विद्यते ।
न चेदिच्छति राजा त्वां गच्छेत् सर्वेण चेतसा ।। २२ ।।
**सुदेष्णाने कहा—**सुन्दरी! यदि मेरे मनमें संदेह न होता, तो मैं तुम्हें अपने सिर-माथे रख लेती। यदि राजा तुम्हें चाहने न लगें—सम्पूर्ण चित्तसे तुमपर आसक्त न हो जायँ तो तुम्हें रखनेमें मुझे कोई आपत्ति न होगी ।। २२ ।।
स्त्रियो राजकुले याश्च याश्चेमा मम वेश्मनि ।
प्रसक्तास्त्वां निरीक्षन्ते पुमांसं कं न मोहयेः ॥ २३ ॥ इस राजकुलमें जितनी स्त्रियाँ हैं तथा मेरे महलमें भी जो ये सुन्दरियाँ हैं, वे सब एकटक तुम्हारी ओर निहार रही हैं; फिर पुरुष कौन ऐसा होगा, जिसे तुम मोहित न कर सको? ॥ २३ ॥
वृक्षांश्चावस्थितान् पश्य य इमे मम वेश्मनि । तेऽपि त्वां संनमन्तीव पुमांसं कं न मोहयेः ॥ २४ ॥ देखो, मेरे भवनमें ये जो वृक्ष खड़े हैं, वे भी तुम्हें देखनेके लिये मानो झुके-से पड़ते हैं। फिर पुरुष कौन ऐसा होगा, जिसे तुम मोहित न कर लो? ॥ २४ ॥
राजा विराटः सुश्रोणि दृष्ट्वा वपुरमानुषम् । विहाय मां वरारोहे गच्छेत् सर्वेण चेतसा ॥ २५ ॥ सुन्दर नितम्बोंवाली सुन्दरी! तुम्हारे सम्पूर्ण अंग सुन्दर हैं। राजा विराट तुम्हारा यह दिव्य रूप देखते ही मुझे छोड़कर सम्पूर्ण चित्तसे तुम्हींमें आसक्त हो जायँगे ॥ २५ ॥
यं हि त्वमनवद्याङ्गि तरलायतलोचने । प्रसक्तमभिवीक्षेथाः स कामवशगो भवेत् ॥ २६ ॥ निर्दोष अंगों तथा चंचल एवं विशाल नेत्रोंवाली सैरन्ध्री! जिस पुरुषकी ओर तुम ध्यानसे देख लोगी, वही कामके अधीन हो जायगा ॥ २६ ॥
यश्च त्वां सततं पश्येत् पुरुषश्चारुहासिनि । एवं सर्वानवद्याङ्गि स चानङ्गवशो भवेत् ॥ २७ ॥ शुभांगि! चारुहासिनि! इसी प्रकार जो पुरुष प्रतिदिन तुम्हें देखेगा, वह भी कामदेवके वशीभूत हो जायगा ॥ २७ ॥
अध्यारोहेद् यथा वृक्षान् वधायैवात्मनो नरः । राजवेश्मनि ते सुभ्रु गृहे तु स्यात् तथा मम ॥ २८ ॥ सुभ्रु! जैसे कोई मूर्ख मनुष्य आत्महत्याके लिये (गिरनेके उद्देश्यसे) वृक्षोंपर चढ़े, उसी प्रकार राजमहलमें या अपने घरमें तुम्हें रखना मेरे लिये अनिष्टकारी हो सकता है ॥ २८ ॥
यथा च कर्कटी गर्भमाधत्ते मृत्युमात्मनः । तथाविधमहं मन्ये वासं तव शुचिस्मिते ॥ २९ ॥ शुचिस्मिते! जैसे केंकड़ेकी मादा अपने मृत्युके लिये ही गर्भ धारण करती है, उसी प्रकार तुम्हें इस घरमें ठहराना मैं अपने लिये मरणके तुल्य मानती हूँ ॥ २९ ॥
द्रौपद्युवाच
नास्मि लभ्या विराटेन न चान्येन कदाचन । गन्धर्वाः पतयो मह्यं युवानः पञ्च भामिनि ॥ ३० ॥
द्रौपदी बोली— भामिनि! मुझे राजा विराट या दूसरा कोई पुरुष कभी नहीं पा सकता। पाँच तरुण गन्धर्व मेरे पति हैं॥ ३०॥
पुत्रा गन्धर्वराजस्य महासत्त्वस्य कस्यचित्।
रक्षन्ति ते च मां नित्यं दुःखाचारा तथा ह्यहम्॥ ३१॥
वे सब किसी महान् शक्तिशाली गन्धर्वराजके* पुत्र हैं। वे ही मेरी प्रतिदिन रक्षा करते हैं तथा मैं स्वयं भी दुर्धर्ष हूँ॥ ३१॥
यो मे न दद्यादुच्छिष्टं न च पादौ प्रधावयेत्।
प्रीणेरंस्तेन वासेन गन्धर्वाः पतयो मम॥ ३२॥
जो मुझे जूठा अन्न नहीं देता और मुझसे अपने पैर नहीं धुलवाता, उसके उस व्यवहारसे मेरे पति गन्धर्वलोग प्रसन्न रहते हैं॥ ३२॥
यो हि मां पुरुषो गृध्येद् यथान्याः प्राकृताः स्त्रियः।
तामेव निवसेद् रात्रिं प्रविश्य च परां तनुम्॥ ३३॥
परंतु जो पुरुष मुझे अन्य प्राकृत स्त्रियोंके समान समझकर (बलपूर्वक) प्राप्त करना चाहता है, उसका उसी रातमें परलोकवास हो जाता है॥ ३३॥
न चाप्यहं चालयितुं शक्या केनचिदङ्गने।
दुःखशीला हि गन्धर्वास्ते च मे बलिनः प्रियाः॥ ३४॥
प्रच्छन्नाश्चापि रक्षन्ति ते मां नित्यं शुचिस्मिते।
अतः कल्याणि! मुझे कोई भी सतीत्वसे विचलित नहीं कर सकता। शुचिस्मिते! यद्यपि मेरे पति गन्धर्वगण इस समय दुःखमें पड़े हैं; तथापि वे बड़े बलवान् हैं और गुप्तरूपसे सदा मेरी रक्षा करते रहते हैं॥ ३४ १/२॥
सुदेष्णोवाच
एवं त्वां वासयिष्यामि यथा त्वं नन्दिनीच्छसि॥ ३५॥
न च पादौ न चोच्छिष्टं स्प्रक्ष्यसि त्वं कथंचन।
सुदेष्णाने कहा— आनन्ददायिनी सुन्दरी! यदि (तुम्हारा शील-स्वभाव) ऐसा है, तो मैं जैसी तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार तुम्हें अवश्य अपने घरमें ठहराऊँगी। तुम्हें किसी प्रकार पैर या जूठन नहीं छूने पड़ेंगे॥ ३५ १/२॥
वैशम्पायन उवाच
एवं कृष्णा विराटस्य भार्यया परिसान्त्विता॥ ३६॥
उवास नगरे तस्मिन् पतिधर्मवती सती।
न चैनां वेद तत्रान्यस्तत्त्वेन जनमेजय॥ ३७॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— विराटकी रानीने जब इस प्रकार आश्वासन दिया, तब पातिव्रत्य धर्मका पालन करनेवाली सती द्रौपदी उस नगरमें रहने लगी। जनमेजय! वहाँ
दूसरा कोई मनुष्य उसका वास्तविक परिचय न पा सका ।। ३६-३७ ।।
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि द्रौपदीप्रवेशे नवमोऽध्यायः ।। ९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें द्रौपदीप्रवेशसम्बन्धी नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९ ।।
* सैरन्ध्री किसे कहते हैं, यह स्वयं द्रौपदीने इसके पूर्व तीसरे अध्यायके १८ वें श्लोकमें बताया है।
* यहाँ ‘गन्धर्वराज’ कहनेका गूढ़ अभिप्राय यह है कि वे गन्धर्वतुल्य राजा पाण्डुके पुत्र हैं।