भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2176

शारदोत्पलसेविन्या रूपेण सदृशी श्रिया ॥ १३ ॥

तुम रूपमें उन्हीं लक्ष्मीके समान हो, जिनके नेत्र शरद्-ऋतुके विकसित कमलदलके समान विशाल हैं, जिनके अंगोंसे शरत्कालीन कमलकी-सी सुगन्ध फैलती रहती है तथा जो शरद्ऋतुके कमलोंका सेवन करती हैं ॥ १३ ॥

का त्वं ब्रूहि यथा भद्रे नासि दासी कथंचन । यक्षी वा यदि वा देवी गन्धर्वी यदि वाप्सराः ॥ १४ ॥ देवकन्या भुजङ्गी वा नगरस्याथ देवता । विद्याधरी किन्नरी वा यदि वा रोहिणी स्वयम् ॥ १५ ॥

कल्याणी! बताओ, तुम वास्तवमें कौन हो? दासी तो तुम किसी प्रकार भी नहीं हो सकतीं। तुम यक्षी हो या देवी? गन्धर्वकन्या हो या अप्सरा? देवकन्या हो या नागकन्या? अथवा इस नगरकी अधिष्ठात्री देवी तो नहीं हो? विद्याधरी, किन्नरी या साक्षात् चन्द्रदेवकी पत्नी रोहिणी तो नहीं हो? ॥ १४-१५ ॥

अलम्बुषा मिश्रकेशी पुण्डरीकाथ मालिनी । इन्द्राणी वारुणी वा त्वं त्वष्टुर्धातुः प्रजापतेः । देव्यो देवेषु विख्यातास्तासां त्वं कतमा शुभे ॥ १६ ॥