भारतकोश
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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

शारदोत्पलसेविन्या रूपेण सदृशी श्रिया ॥ १३ ॥

तुम रूपमें उन्हीं लक्ष्मीके समान हो, जिनके नेत्र शरद्-ऋतुके विकसित कमलदलके समान विशाल हैं, जिनके अंगोंसे शरत्कालीन कमलकी-सी सुगन्ध फैलती रहती है तथा जो शरद्ऋतुके कमलोंका सेवन करती हैं ॥ १३ ॥

का त्वं ब्रूहि यथा भद्रे नासि दासी कथंचन । यक्षी वा यदि वा देवी गन्धर्वी यदि वाप्सराः ॥ १४ ॥ देवकन्या भुजङ्गी वा नगरस्याथ देवता । विद्याधरी किन्नरी वा यदि वा रोहिणी स्वयम् ॥ १५ ॥

कल्याणी! बताओ, तुम वास्तवमें कौन हो? दासी तो तुम किसी प्रकार भी नहीं हो सकतीं। तुम यक्षी हो या देवी? गन्धर्वकन्या हो या अप्सरा? देवकन्या हो या नागकन्या? अथवा इस नगरकी अधिष्ठात्री देवी तो नहीं हो? विद्याधरी, किन्नरी या साक्षात् चन्द्रदेवकी पत्नी रोहिणी तो नहीं हो? ॥ १४-१५ ॥

अलम्बुषा मिश्रकेशी पुण्डरीकाथ मालिनी । इन्द्राणी वारुणी वा त्वं त्वष्टुर्धातुः प्रजापतेः । देव्यो देवेषु विख्यातास्तासां त्वं कतमा शुभे ॥ १६ ॥

तुम अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका अथवा मालिनी नामकी अप्सरा तो नहीं हो? क्या तुम इन्द्राणी, वारुणी देवी, विश्वकर्माकी पत्नी अथवा प्रजापति ब्रह्माकी शक्ति सावित्री हो? शुभे! देवताओंके यहाँ जो प्रसिद्ध देवियाँ हैं, उनमेंसे तुम कौन हो? ।। १६ ।।

द्रौपद्युवाच

नास्मि देवी न गन्धर्वी नासुरी न च राक्षसी ।
सैरन्ध्री तु भुजिष्यास्मि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। १७ ।।
**द्रौपदी बोली—**रानीजी! मैं न तो देवी हूँ, न गन्धर्वी; न असुरपत्नी हूँ, न राक्षसी। मैं तो सेवा करनेवाली सैरन्ध्री हूँ। यह मैं आपसे सच-सच कह रही हूँ ।। १७ ।।
केशान् जानाम्यहं कर्तुं पिंषे साधु विलेपनम् ।
मल्लिकोत्पलपद्मानां चम्पकानां तथा शुभे ।। १८ ।।
ग्रथयिष्ये विचित्रांश्च स्रजः परमशोभनाः ।
मैं केशोंका शृंगार करना जानती हूँ तथा उबटन या अंगराग बहुत अच्छा पीस लेती हूँ। शुभे! मैं मल्लिका, उत्पल, कमल और चम्पा आदि फूलोंके बहुत सुन्दर एवं विचित्र हार भी गूँथ सकती हूँ ।। १८ १/२ ।।
आराधयं सत्यभामां कृष्णस्य महिषीं प्रियाम् ।। १९ ।।
कृष्णां च भार्यां पाण्डूनां कुरूणामेकसुन्दरीम् ।
पहले मैं श्रीकृष्णकी प्यारी रानी सत्यभामा तथा कुरुकुलकी एकमात्र सुन्दरी पाण्डवोंकी धर्मपत्नी द्रौपदीकी सेवामें रह चुकी हूँ ।। १९ १/२ ।।
तत्र तत्र चराम्येवं लभमाना सुभोजनम् ।। २० ।।
वासांसि यावन्ति लभे तावत् तावद् रमे तथा ।
मालिनीत्येव मे नाम स्वयं देवी चकार सा ।
साहमद्यागता देवि सुदेष्णे त्वन्निवेशनम् ।। २१ ।।
मैं भिन्न-भिन्न स्थानोंमें सेवा करके उत्तम भोजन पाती हुई विचरती हूँ। मुझे जितने वस्त्र मिल जाते हैं, उतनोंमें ही मैं प्रसन्न रहती हूँ। स्वयं देवी द्रौपदीने मेरा नाम 'मालिनी' रख दिया था। देवि सुदेष्णे! आज वही मैं सैरन्ध्री आपके महलमें आयी हूँ ।। २०-२१ ।।

सुदेष्णोवाच

मूर्ध्नि त्वां वासयेयं वै संशयो मे न विद्यते ।
न चेदिच्छति राजा त्वां गच्छेत् सर्वेण चेतसा ।। २२ ।।
**सुदेष्णाने कहा—**सुन्दरी! यदि मेरे मनमें संदेह न होता, तो मैं तुम्हें अपने सिर-माथे रख लेती। यदि राजा तुम्हें चाहने न लगें—सम्पूर्ण चित्तसे तुमपर आसक्त न हो जायँ तो तुम्हें रखनेमें मुझे कोई आपत्ति न होगी ।। २२ ।।
स्त्रियो राजकुले याश्च याश्चेमा मम वेश्मनि ।

प्रसक्तास्त्वां निरीक्षन्ते पुमांसं कं न मोहयेः ॥ २३ ॥ इस राजकुलमें जितनी स्त्रियाँ हैं तथा मेरे महलमें भी जो ये सुन्दरियाँ हैं, वे सब एकटक तुम्हारी ओर निहार रही हैं; फिर पुरुष कौन ऐसा होगा, जिसे तुम मोहित न कर सको? ॥ २३ ॥

वृक्षांश्चावस्थितान् पश्य य इमे मम वेश्मनि । तेऽपि त्वां संनमन्तीव पुमांसं कं न मोहयेः ॥ २४ ॥ देखो, मेरे भवनमें ये जो वृक्ष खड़े हैं, वे भी तुम्हें देखनेके लिये मानो झुके-से पड़ते हैं। फिर पुरुष कौन ऐसा होगा, जिसे तुम मोहित न कर लो? ॥ २४ ॥

राजा विराटः सुश्रोणि दृष्ट्वा वपुरमानुषम् । विहाय मां वरारोहे गच्छेत् सर्वेण चेतसा ॥ २५ ॥ सुन्दर नितम्बोंवाली सुन्दरी! तुम्हारे सम्पूर्ण अंग सुन्दर हैं। राजा विराट तुम्हारा यह दिव्य रूप देखते ही मुझे छोड़कर सम्पूर्ण चित्तसे तुम्हींमें आसक्त हो जायँगे ॥ २५ ॥

यं हि त्वमनवद्याङ्गि तरलायतलोचने । प्रसक्तमभिवीक्षेथाः स कामवशगो भवेत् ॥ २६ ॥ निर्दोष अंगों तथा चंचल एवं विशाल नेत्रोंवाली सैरन्ध्री! जिस पुरुषकी ओर तुम ध्यानसे देख लोगी, वही कामके अधीन हो जायगा ॥ २६ ॥

यश्च त्वां सततं पश्येत् पुरुषश्चारुहासिनि । एवं सर्वानवद्याङ्गि स चानङ्गवशो भवेत् ॥ २७ ॥ शुभांगि! चारुहासिनि! इसी प्रकार जो पुरुष प्रतिदिन तुम्हें देखेगा, वह भी कामदेवके वशीभूत हो जायगा ॥ २७ ॥

अध्यारोहेद् यथा वृक्षान् वधायैवात्मनो नरः । राजवेश्मनि ते सुभ्रु गृहे तु स्यात् तथा मम ॥ २८ ॥ सुभ्रु! जैसे कोई मूर्ख मनुष्य आत्महत्याके लिये (गिरनेके उद्देश्यसे) वृक्षोंपर चढ़े, उसी प्रकार राजमहलमें या अपने घरमें तुम्हें रखना मेरे लिये अनिष्टकारी हो सकता है ॥ २८ ॥

यथा च कर्कटी गर्भमाधत्ते मृत्युमात्मनः । तथाविधमहं मन्ये वासं तव शुचिस्मिते ॥ २९ ॥ शुचिस्मिते! जैसे केंकड़ेकी मादा अपने मृत्युके लिये ही गर्भ धारण करती है, उसी प्रकार तुम्हें इस घरमें ठहराना मैं अपने लिये मरणके तुल्य मानती हूँ ॥ २९ ॥

द्रौपद्युवाच

नास्मि लभ्या विराटेन न चान्येन कदाचन । गन्धर्वाः पतयो मह्यं युवानः पञ्च भामिनि ॥ ३० ॥

द्रौपदी बोली— भामिनि! मुझे राजा विराट या दूसरा कोई पुरुष कभी नहीं पा सकता। पाँच तरुण गन्धर्व मेरे पति हैं॥ ३०॥
पुत्रा गन्धर्वराजस्य महासत्त्वस्य कस्यचित्।
रक्षन्ति ते च मां नित्यं दुःखाचारा तथा ह्यहम्॥ ३१॥
वे सब किसी महान् शक्तिशाली गन्धर्वराजके* पुत्र हैं। वे ही मेरी प्रतिदिन रक्षा करते हैं तथा मैं स्वयं भी दुर्धर्ष हूँ॥ ३१॥
यो मे न दद्यादुच्छिष्टं न च पादौ प्रधावयेत्।
प्रीणेरंस्तेन वासेन गन्धर्वाः पतयो मम॥ ३२॥
जो मुझे जूठा अन्न नहीं देता और मुझसे अपने पैर नहीं धुलवाता, उसके उस व्यवहारसे मेरे पति गन्धर्वलोग प्रसन्न रहते हैं॥ ३२॥
यो हि मां पुरुषो गृध्येद् यथान्याः प्राकृताः स्त्रियः।
तामेव निवसेद् रात्रिं प्रविश्य च परां तनुम्॥ ३३॥
परंतु जो पुरुष मुझे अन्य प्राकृत स्त्रियोंके समान समझकर (बलपूर्वक) प्राप्त करना चाहता है, उसका उसी रातमें परलोकवास हो जाता है॥ ३३॥
न चाप्यहं चालयितुं शक्या केनचिदङ्गने।
दुःखशीला हि गन्धर्वास्ते च मे बलिनः प्रियाः॥ ३४॥
प्रच्छन्नाश्चापि रक्षन्ति ते मां नित्यं शुचिस्मिते।
अतः कल्याणि! मुझे कोई भी सतीत्वसे विचलित नहीं कर सकता। शुचिस्मिते! यद्यपि मेरे पति गन्धर्वगण इस समय दुःखमें पड़े हैं; तथापि वे बड़े बलवान् हैं और गुप्तरूपसे सदा मेरी रक्षा करते रहते हैं॥ ३४ १/२॥

सुदेष्णोवाच
एवं त्वां वासयिष्यामि यथा त्वं नन्दिनीच्छसि॥ ३५॥
न च पादौ न चोच्छिष्टं स्प्रक्ष्यसि त्वं कथंचन।
सुदेष्णाने कहा— आनन्ददायिनी सुन्दरी! यदि (तुम्हारा शील-स्वभाव) ऐसा है, तो मैं जैसी तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार तुम्हें अवश्य अपने घरमें ठहराऊँगी। तुम्हें किसी प्रकार पैर या जूठन नहीं छूने पड़ेंगे॥ ३५ १/२॥

वैशम्पायन उवाच
एवं कृष्णा विराटस्य भार्यया परिसान्त्विता॥ ३६॥
उवास नगरे तस्मिन् पतिधर्मवती सती।
न चैनां वेद तत्रान्यस्तत्त्वेन जनमेजय॥ ३७॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— विराटकी रानीने जब इस प्रकार आश्वासन दिया, तब पातिव्रत्य धर्मका पालन करनेवाली सती द्रौपदी उस नगरमें रहने लगी। जनमेजय! वहाँ

दूसरा कोई मनुष्य उसका वास्तविक परिचय न पा सका ।। ३६-३७ ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि द्रौपदीप्रवेशे नवमोऽध्यायः ।। ९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें द्रौपदीप्रवेशसम्बन्धी नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९ ।।


* सैरन्ध्री किसे कहते हैं, यह स्वयं द्रौपदीने इसके पूर्व तीसरे अध्यायके १८ वें श्लोकमें बताया है।
* यहाँ ‘गन्धर्वराज’ कहनेका गूढ़ अभिप्राय यह है कि वे गन्धर्वतुल्य राजा पाण्डुके पुत्र हैं।

अध्याय (पृष्ठ 2181)

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दशमोऽध्यायः

सहदेवका राजा विराटके साथ वार्तालाप और गौओंकी देखभालके लिये उनकी नियुक्ति

वैशम्पायन उवाच

सहदेवोऽपि गोपानां कृत्वा वेषमनुत्तमम् ।
भाषां चैषां समास्थाय विराटमुपयादथ ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर सहदेव भी ग्वालोंका परम उत्तम वेष बनाकर उन्हींकी भाषामें बोलते हुए राजा विराटके यहाँ गये ॥ १ ॥

गोष्ठमासाद्य तिष्ठन्तं भवनस्य समीपतः ।
राजाथ दृष्ट्वा पुरुषान् प्राहिणोज्जातविस्मयः ॥ २ ॥
राजभवनके पास ही गोशाला थी; वहाँ पहुँचकर वे खड़े हो गये। राजा उन्हें दूरसे ही देखकर आश्चर्यमें पड़ गये और उनके पास कुछ लोगोंको भेजा ॥ २ ॥

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य भ्राजमानं नरर्षभम् ।
समुपस्थाय वै राजा पप्रच्छ कुरुनन्दनम् ॥ ३ ॥
[अपने सेवकोंके बुलानेपर उनके साथ] दिव्य कान्तिसे सुशोभित नरश्रेष्ठ सहदेवको राजसभाकी ओर आते देख राजा विराट स्वयं उठकर उनके पास चले गये और कुरुकुलको आनन्द देनेवाले सहदेवसे पूछने लगे— ॥ ३ ॥

कस्य वा त्वं कुतो वा त्वं किं वा त्वं तु चिकीर्षसि ।
न हि मे दृष्टपूर्वस्त्वं तत्त्वं ब्रूहि नरर्षभ ॥ ४ ॥
‘पुरुषप्रवर! तुम किसके पुत्र हो, कहाँसे आये हो और क्या करना चाहते हो? मैंने आजसे पहले तुम्हें कभी नहीं देखा है; अतः अपना ठीक-ठीक परिचय दो’ ॥ ४ ॥

सम्प्राप्य राजानममित्रतापनं
 ततोऽब्रवीन्मेघमहौघनिःस्वनः ।
वैश्योऽस्मि नाम्नाहमरिष्टनेमि-
 र्गोसंख्य आसं कुरुपुङ्गवानाम् ॥ ५ ॥
वस्तुं त्वयीच्छामि विशां वरिष्ठ
 तान् राजसिंहान् न हि वेद्मि पार्थान् ।
न शक्यते जीवितुमप्यकर्मणा
 न च त्वदन्यो मम रोचते नृपः ॥ ६ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा विराटके निकट पहुँचकर सहदेव मेघोंकी घनघोर घटाके समान गम्भीर स्वरमें बोले—‘महाराज! मैं वैश्य हूँ। मेरा नाम अरिष्टनेमि है। नृपश्रेष्ठ! मैं कुरुवंशशिरोमणि पाण्डवोंके यहाँ गौओंकी गणना तथा देखभाल करता रहा हूँ। अब आपके यहाँ रहना चाहता हूँ; क्योंकि राजाओंमें सिंहके समान पाण्डव कहाँ हैं? यह मैं नहीं जानता। बिना काम किये जीविका चल नहीं सकती और आपके सिवा दूसरा कोई राजा मुझे पसंद नहीं है’ ॥ ५-६ ॥

विराट उवाच

त्वं ब्राह्मणो यदि वा क्षत्रियोऽसि समुद्रनेमीश्वररूपवानसि । आचक्ष्व मे तत्त्वममित्रकर्शन न वैश्यकर्म त्वयि विद्यते क्षमम् ॥ ७ ॥

**विराटने कहा—**शत्रुतापन! मुझे तो ऐसा लगता है कि तुम ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय हो। समुद्रसे घिरी हुई समूची पृथ्वीके सम्राट्की भाँति तुम्हारा भव्य रूप है; अतः मुझे अपना ठीक-ठीक परिचय दो। यह वैश्य कर्म (गोपालन) तुम्हारे योग्य नहीं है ॥ ७ ॥

कस्यासि राज्ञो विषयादिहागतः किं वापि शिल्पं तव विद्यते कृतम् ।

कथं त्वमस्मासु निवत्स्यसे सदा वदस्व किं चापि तवेह वेतनम् ॥ ८ ॥ तुम किस राजाके राज्यसे यहाँ आये हो? और तुमने किस कलाकी शिक्षा प्राप्त की है? बोलो, हमारे यहाँ कैसे सदा रह सकोगे? और यहाँ तुम्हारा वेतन क्या होगा? ॥ ८ ॥

सहदेव उवाच

पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो भ्राता युधिष्ठिरः । तस्याष्टशतसाहस्रा गवां वर्गाः शतं शतम् ॥ ९ ॥ **सहदेव बोले—**राजन्! पाँचों पाण्डवोंमें सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर हैं। उनके पास एक प्रकारकी गौओंके आठ लाख झुंड थे और प्रत्येक झुंडमें सौ-सौ गायें थीं ॥ ९ ॥

अपरे शतसाहस्रा द्विस्तावन्तस्तथा परे । तेषां गोसंख्य आसं वै तन्तिपालेति मां विदुः ॥ १० ॥ भूतं भव्यं भविष्यं च यच्च संख्यागतं गवाम् । न मेऽस्त्यविदितं किंचित् समन्ताद् दशयोजनम् ॥ ११ ॥ इनके सिवा, दूसरे प्रकारकी गौओंके एक लाख झुंड तथा तीसरे प्रकारकी गौओंके उनसे दुगुने अर्थात् दो लाख झुंड थे। (प्रत्येक झुंडमें सौ-सौ गायें थीं।) पाण्डवोंकी उन गौओंका मैं गणक और निरीक्षक था। वे लोग मुझे ‘तन्तिपाल’ कहा करते थे। चारों ओर दस योजनकी दूरीमें जितनी गौएँ हों; उनकी भूत, वर्तमान और भविष्यमें जितनी संख्या थी, है और होगी, उन सबको मैं जानता हूँ। गौओंके सम्बन्धमें तीनों कालमें होनेवाली कोई ऐसी बात नहीं है, जो मुझे ज्ञात न हो ॥

गुणाः सुविदिता ह्यासन् मम तस्य महात्मनः । असकृत् स मया तुष्टः कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥ क्षिप्रं च गावो बहुला भवन्ति न तासु रोगो भवतीह कश्चन । तैस्तैरुपायैर्विदितं ममैत- देतानि शिल्पानि मयि स्थितानि ॥ १३ ॥ ऋषभांश्चापि जानामि राजन् पूजितलक्षणान् । येषां मूत्रमुपाघ्राय अपि वन्ध्या प्रसूयते ॥ १४ ॥ महात्मा राजा युधिष्ठिरको मेरे ये गुण भलीभाँति विदित थे। वे कुरुराज युधिष्ठिर सदा मेरे ऊपर संतुष्ट रहते थे। किन-किन उपायोंसे गौओंकी संख्या शीघ्र बढ़ जाती है और उनमें कोई रोग नहीं पैदा होता, यह सब मुझे ज्ञात है। महाराज! ये ही कलाएँ मुझमें विद्यमान हैं। इनके सिवा मैं उन उत्तम लक्षणोंवाले बैलोंको भी जानता हूँ, जिनके मूत्रको सूँघ लेनेमात्रसे वन्ध्या स्त्री भी गर्भधारण एवं संतान उत्पन्न करनेयोग्य हो जाती है ॥ १२—१४ ॥

विराट उवाच

शतं सहस्राणि समाहितानि सवर्णवर्णस्य विमिश्रितान् गुणैः । पशून् सपालान् भवते ददाम्यहं त्वदाश्रया मे पशवो भवन्त्विह ॥ १५ ॥ **विराटने कहा—**तन्तिपाल! मेरे यहाँ एक लाख पशु संगृहीत हैं। उनमेंसे कुछ तो एक ही रंगके हैं और कुछ मिश्रित रंगके। वे सब विभिन्न गुणोंसे संयुक्त हैं। मैं उन पशुओं और पशुपालोंको आजसे तुम्हारे हाथमें सौंपता हूँ। मेरे पशु अबसे तुम्हारे ही अधीन रहेंगे ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

तथा स राज्ञोऽविदितो विशाम्पते- रुवास तत्रैव सुखं नरोत्तमः । न चैनमन्येऽपि विदुः कथंचन प्रादाच्च तस्मै भरणं यथेप्सितम् ॥ १६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**इस प्रकार प्रजापालक राजा विराटसे अपरिचित रहकर नरश्रेष्ठ सहदेव वहीं गोशालामें रहने लगे। दूसरे लोग भी उन्हें किसी तरह पहचान न सके। राजाने उनके लिये उनकी इच्छाके अनुसार भरण-पोषणकी व्यवस्था कर दी ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि सहदेवप्रवेशे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें सहदेवप्रवेशविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥

अध्याय (पृष्ठ 2185)

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एकादशोऽध्यायः

अर्जुनका राजा विराटसे मिलना और राजाके द्वारा कन्याओंको नृत्य आदिकी शिक्षा देनेके लिये उनको नियुक्त करना

वैशम्पायन उवाच

अथापरोऽदृश्यत रूपसम्पदा
स्त्रीणामलङ्कारधरो बृहत्पुमान् ।
प्राकारवप्रे प्रतिमुच्य कुण्डले
दीर्घे च कम्बूपरि हाटके शुभे ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर नगरकी चहारदीवारीके पीछे जो मिट्टीका ऊँचा टीला था, उसके समीप रूप-सम्पदासे सुशोभित एक दूसरा पुरुष दिखायी दिया। उसका डील-डौल ऊँचा था। उसने स्त्रियोंके लिये उचित आभूषण पहन रखे थे तथा कानोंमें बड़े-बड़े कुण्डल और हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ पहनकर उनके ऊपर सोनेके सुन्दर कंगन धारण कर लिये थे ॥ १ ॥

बाहू च दीर्घान् प्रविकीर्य मूर्धजान्
महाभुजो वारणतुल्यविक्रमः ।
गतेन भूमिं प्रतिकम्पयंस्तदा
विराटमासाद्य सभासमीपतः ॥ २ ॥

अपने बड़े-बड़े केशोंकी लटोंको खोलकर हाथोंतक फैलाये वह महाबाहु पुरुष उस समय हाथीके समान मस्तानी चालसे चलता और पग-पगपर मानो पृथ्वीको कँपाता हुआ राजसभाके समीप राजा विराटके पास आकर खड़ा हुआ ॥ २ ॥

तं प्रेक्ष्य राजोपगतं सभातले
व्याजात् प्रतिच्छन्नमरिप्रमाथिनम् ।
विराजमानं परमेण वर्चसा
सुतं महेन्द्रस्य गजेन्द्रविक्रमम् ॥ ३ ॥
सर्वानपृच्छच्च सभानुचारिणः
कुतोऽयमायाति पुरा न मे श्रुतः ।
न चैनमूचुर्विदितं तदा नराः
सविस्मयं वाक्यमिदं नृपोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥

छद्मवेशसे अपने स्वरूपको छिपाकर सभाभवनमें आया हुआ वह शत्रुविजयी वीर पुरुष अपने उत्कृष्ट तेजसे प्रकाशित हो रहा था। गजराजके समान बल-विक्रमवाले उस महेन्द्रपुत्र अर्जुनको देखकर राजाने समस्त सभासदोंसे पूछा—'यह कहाँसे आया है? आजसे पहले मैंने कभी इसके विषयमें नहीं सुना है।' राजाके पूछनेपर उन मनुष्योंमेंसे किसीने उस पुरुषको अपना परिचित नहीं बताया। तब राजाने आश्चर्ययुक्त होकर यह बात कहीं— ।। ३-४ ।।

सत्त्वोपपन्नः पुरुषोऽमरोपमः श्यामो युवा वारणयूथपोपमः । आमुच्य कम्बूपरि हाटके शुभे विमुच्य वेणीमपिनह्य कुण्डले ।। ५ ।। स्रग्वी सुकेशः परिधाय चान्यथा शुशोभ धन्वी कवची शरी यथा । आरुह्य यानं परिधावतां भवान् सुतैः समो मे भव वा मया समः ।। ६ ।।

'तात! तुम शक्ति और धैर्यसे सम्पन्न देवोपम पुरुष हो। तुम्हारी अंगकान्ति श्याम है। तुम तरुण हो और हाथियोंके यूथके अधिपति महान् गजराजके समान शोभा पा रहे हो। तुमने हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ पहनकर उनके ऊपर सोनेके सुन्दर कंगन डाल लिये हैं, वेणी खोलकर केशोंकी लटें छितरा ली हैं तथा कानोंमें कुण्डल धारणकर गलेमें गजरा डाल रखा है। तुम्हारे केश बहुत ही सुन्दर हैं। तुम नारीजनोचित वेश-भूषा धारण करके भी उसके विपरीत धनुष-बाण और कवच धारण करनेवाले वीरके समान शोभा पा रहे हो। तुम रथ आदि वाहनोंपर बैठकर इच्छानुसार भ्रमण करो और मेरे पुत्रोंके अथवा मेरे ही समान होकर रहो ।। ५-६ ।।

वृद्धो ह्यहं वै परिहारकामः सर्वान् मत्स्यांस्तरसा पालयस्व । नैवंविधाः क्लीबरूपा भवन्ति कथंचनेति प्रतिभाति मे मनः ।। ७ ।।

'मैं बूढ़ा हो गया हूँ; अब राजकाज छोड़ना चाहता हूँ; अतः तुम सम्पूर्ण मत्स्यदेशका शीघ्र ही पालन करो। तुम्हारे-जैसे स्वरूपवाले किसी तरह नपुंसक नहीं हो सकते। मेरे मनको ऐसा ही प्रतीत होता है' ।। ७ ।।

(अर्जुन उवाच वेणीं प्रकुर्यां रुचिरे च कुण्डले तथा स्रजः प्रावरणानि संहरे ।

स्नानं चरेयं विमृजे च दर्पणं विशेषकेष्वेव च कौशलं मम ।। क्लीबेषु बालेषु जनेषु नर्तने शिक्षाप्रदानेषु च योग्यता मम । करोमि वेणीषु च पुष्पपूरणं न मे स्त्रियः कर्मणि कौशलाधिकाः ।। **अर्जुन बोले—**मैं वेणी-रचना अच्छी कर सकता हूँ, मनोहर कुण्डल बनाना जानता हूँ, फूलोंके हार तथा ओढ़नेकी चादरें सुन्दर ढंगसे बनाता हूँ, स्नान करा सकता हूँ, दर्पणकी सफाई करता हूँ और चन्दन आदिसे अनेक प्रकारकी रेखाएँ बनाकर शृंगार करनेकी क्रियामें मुझे विशेष कुशलता प्राप्त है। नपुंसकों, बालकों एवं साधारण लोगोंमें नाचने तथा संगीत एवं नृत्यकी शिक्षा देनेमें मेरी अच्छी योग्यता है। स्त्रियोंकी वेणीमें फूल गूँथनेका कार्य भी मैं अच्छे ढंगसे सम्पन्न करता हूँ। इन सब कार्योंमें स्त्रियाँ भी मुझसे अधिक कुशल नहीं हैं।

तमब्रवीत् प्रांशुमुदीक्ष्य विस्मितो विराटराजोपसृतं महायशाः ।। निकट आनेपर उसका कद बहुत ऊँचा देखकर महायशस्वी राजा विराट अत्यन्त विस्मित होकर बोले।

विराट उवाच

नार्हस्तु वेषोऽयमनूर्जितस्ते
नापुंस्त्वमर्हो नरदेवसिंह ।
तवैष वेषोऽशुभवेषभूषणै-
र्विभूषितो भूतपतेरिव प्रभो ।।
विभाति भानोरिव रश्मिमालिनो
घनावरुद्धे गगने घनैखिव ।
धनुर्हि मन्ये तव शोभयेद् भुजौ
तथा हि पीनावतिमात्रमायतौ ।।)
**विराट ने कहा—**नरदेवसिंह! ओज और बलसे रहित नपुंसकका-सा यह वेष तुम्हारे योग्य नहीं है। तुम क्लीब होनेके योग्य नहीं हो। प्रभो! तुम्हारा यह वेष भगवान् भूतनाथकी भाँति अशुभ वेष-भूषासे विभूषित है। जैसे बादलोंकी घटासे आच्छादित आकाशमें भी अंशुमाली सूर्यका मण्डल सुशोभित होता है, उसी प्रकार इस क्लीबवेषमें भी तुम पौरुषसे प्रकाशित हो रहे हो। मेरा ऐसा विश्वास है कि तुम्हारी इन मोटी और अत्यन्त विशाल भुजाओंको धनुष ही सुशोभित कर सकता है।

अर्जुन उवाच

गायामि नृत्याम्यथ वादयामि
भद्रोऽस्मि नृत्ये कुशलोऽस्मि गीते ।
त्वमुत्तरायै प्रदिशस्व मां स्वयं
भवामि देव्या नरदेव नर्तकः ॥ ८ ॥
**अर्जुनने कहा—**नरदेव! मैं गाता, नाचता और बाजे बजाता हूँ। नृत्यकलामें निपुण और संगीत-कलामें भी कुशल हूँ। आप उत्तराको शिक्षा देनेके लिये मुझे रख लें। मैं स्वयं राजकुमारी उत्तराको नृत्य सिखलाऊँगा ।। ८ ।।

इदं तु रूपं मम येन किं तव
प्रकीर्तयित्वा भृशशोकवर्धनम् ।
बृहन्नलां मां नरदेव विद्धि
सुतं सुतां वा पितृमातृवर्जिताम् ॥ ९ ॥
मेरा ऐसा रूप जिस कारणसे हुआ है, उसे आपके सामने कहनेसे क्या लाभ है? वह अधिक शोक बढ़ानेवाली बात है। राजन्! आप मुझे बृहन्नला समझें और पिता-मातासे रहित पुत्र या पुत्री मान लें ।। ९ ।।

विराट उवाच

ददामि ते हन्त वरं बृहन्नले

सुतां च मे नर्तय याश्च तादृशीः ।

इदं तु ते कर्म समं न मे मतं

समुद्रनेमिं पृथिवीं त्वमर्हसि ।। १० ।।

विराट बोले—बृहन्नले! मैं तुम्हें अभीष्ट वर देता हूँ। तुम मेरी पुत्रीको तथा उसके समान

अवस्थावाली अन्य राजकुमारियोंको नृत्यकला सिखलाओ। परंतु मुझे यह कर्म तुम्हारे

योग्य नहीं जान पड़ता। तुम तो समुद्रसे घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीके शासक होने योग्य

हो ।। १० ।।

वैशम्पायन उवाच

बृहन्नलां तामभिवीक्ष्य मत्स्यराट्

कलासु नृत्येषु तथैव वादिते ।

सम्मन्त्र्य राजा विविधैः स्वमन्त्रिभिः

परीक्ष्य चैनं प्रमदाभिराशु वै ।। ११ ।।

अपुंस्त्वमप्यस्य निशम्य च स्थिरं

ततः कुमारीपुरमुत्ससर्ज तम् ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर मत्स्यनरेशने बृहन्नलाकी गीत, नृत्य

और बाजे बजानेकी कलाओंमें परीक्षा करके अपने अनेक मन्त्रियोंसे यह सलाह ली कि

इसे अन्तःपुरमें रखना चाहिये या नहीं। फिर तरुणी स्त्रियोंद्वारा शीघ्र ही उनके नपुंसकत्वकी

जाँच करायी। जब सब तरहसे उनका नपुंसक होना ठीक प्रमाणित हो गया, तब यह सुन-

समझकर उन्होंने बृहन्नलाको कन्याके अन्तःपुरमें जानेकी आज्ञा दी ।। ११ १/२ ।।

स शिक्षयामास च गीतवादितं

सुतां विराटस्य धनंजयः प्रभुः ।। १२ ।।

सखीश्च तस्याः परिचारिकास्तथा

प्रियश्च तासां स बभूव पाण्डवः ।। १३ ।।

तथा स सत्रेण धनंजयो वसन्

प्रियाणि कुर्वन् सह ताभिरात्मवान् ।

तथा च तं तत्र न जज्ञिरे जना

बहिश्चरा वाप्यथ चान्तरेचराः ।। १४ ।।

शक्तिशाली अर्जुन विराटकन्या उत्तरा, उसकी सखियों तथा सेविकाओंको भी गीत,

वाद्य एवं नृत्यकलाकी शिक्षा देने लगे। इससे वे उन सबके प्रिय हो गये। छद्मवेशमें

कन्याओंके साथ रहते हुए भी अर्जुन अपने मनको सदा पूर्णरूपसे वशमें रखते और उन

सबको प्रिय लगनेवाले कार्य करते थे। इस रूपमें वहाँ रहते हुए अर्जुनको बाहर अथवा

अन्तःपुरके कोई भी मनुष्य पहचान न सके ।। १२—१४ ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि अर्जुनप्रवेशो नाम एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें अर्जुनप्रवेशनामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १८ १/३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2191)

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द्वादशोऽध्यायः

नकुलका विराटके अश्वोंकी देखरेखमें नियुक्त होना

वैशम्पायन उवाच

अथापरोऽदृश्यत पाण्डवः प्रभु-
 विराटराजं तरसा समेयिवान् ।
तमापतन्तं ददृशे पृथग्जनो
 विमुक्तमभ्रादिव सूर्यमण्डलम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर अन्य पाण्डुपुत्र शक्तिशाली नकुल बड़े वेगसे चलते हुए राजा विराटके यहाँ आये। उन्हें आते समय साधारण लोगोंने देखा; उस समय वे मेघमालाकी ओटसे निकले हुए सूर्यमण्डलके समान तेजस्वी जान पड़ते थे ॥ १ ॥

स वै हयानैक्षत तांस्ततस्ततः
 समीक्षमाणं स ददर्श मत्स्यराट् ।
ततोऽब्रवीत् ताननुगान् नरेश्वरः
 कुतोऽयमायाति नरोऽमरोपमः ॥ २ ॥
स्वयं हयानीक्षति मामकान् दृढं
 ध्रुवं हयज्ञो भविता विचक्षणः ।
प्रवेश्यतामेष समीपमाशु मे
 विभाति वीरो हि यथामरस्तथा ॥ ३ ॥

आते ही उन्होंने इधर-उधर घूमकर घोड़ोंको देखना प्रारम्भ किया। इस प्रकार उन अश्वोंका निरीक्षण करते समय उन्हें मत्स्यराज विराटने देखा। तब वे नरेश वहाँ बैठे हुए अनुचरोंसे बोले—'पता तो लगाओ, यह देवोपम पुरुष कहाँसे आ रहा है? यह बिना कहे-सुने स्वयं मेरे घोड़ोंको बहुत ध्यानसे देख रहा है; अतः यह अवश्य घोड़ोंको पहचाननेवाला और अश्वविद्याका विद्वान् होगा। इसलिये इसे शीघ्र मेरे समीप ले आओ। यह वीर देवताओंकी भाँति सुशोभित हो रहा है' ॥ २-३ ॥

अभ्येत्य राजानममित्रहाब्रवी- ज्जयोऽस्तु ते पार्थिव भद्रमस्तु वः। हयेषु युक्तो नृप सम्मतः सदा तवाश्वसूतो निपुणो भवाम्यहम् ॥ ४॥ तत्पश्चात् राजसेवकोंके साथ राजाके समीप आकर शत्रुहन्ता नकुलने कहा—‘राजन्! आपकी जय हो। आपका कल्याण हो। मैं घोड़ोंको शिक्षा देनेमें निपुण हूँ और अनेक राजाओंसे सम्मानित हूँ। मैं सदा आपके घोड़ोंका चतुर सारथि हो सकता हूँ’ ॥ ४ ॥

विराट उवाच

ददामि यानानि धनं निवेशनं ममाश्वसूतो भवितुं त्वमर्हसि । कुतोऽसि कस्यासि कथं त्वमागतः प्रब्रूहि शिल्पं तव विद्यते च यत् ॥ ५ ॥ विराटने कहा— भद्र पुरुष! मैं तुम्हें सवारी, धन और रहनेके लिये घर देता हूँ। तुम मेरे घोड़ोंको शिक्षा देनेवाले सारथि हो सकते हो, किंतु मैं पहले यह जानना चाहता हूँ कि तुम

कहाँसे आये हो? किसके पुत्र हो और किसलिये तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है? तुममें जो कला-कौशल हो, उसे भी बताओ।। ५ ।।

नकुल उवाच

पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो भ्राता युधिष्ठिरः ।
तेनाहमश्वेषु पुरा नियुक्तः शत्रुकर्शन ।। ६ ।।
अश्वानां प्रकृतिं वेद्मि विनयं चापि सर्वशः ।
दुष्टानां प्रतिपत्तिं च कृत्स्नं चैव चिकित्सितम् ।। ७ ।।

**नकुल बोले—**शत्रुदमन! सुनिये, पाँचों पाण्डवोंमें जो बड़े भ्राता युधिष्ठिर हैं, उन्होंने पहले मुझे घोड़ोंकी देखभालके कामपर लगा रखा था। मैं घोड़ोंकी जाति पहचानता हूँ एवं उन्हें सब प्रकारकी शिक्षा देनेकी कला भी जानता हूँ। दुष्ट घोड़ोंकी दुष्टता-निवारणका ढंग भी मुझे मालूम है तथा घोड़ोंकी चिकित्सा भी मैं पूर्णरूपसे जानता हूँ।। ६-७ ।।

न कातरं स्यान्मम जातु वाहनं
न मेऽस्ति दुष्टा वडवा कुतो हयाः ।
जनस्तु मामाह स चापि पाण्डवो
युधिष्ठिरो ग्रन्थिकमेव नामतः ।। ८ ।।

मेरा सिखाया हुआ घोड़ा कभी कायर नहीं हो सकता। मेरी सिखायी हुई घोड़ीमें भी कोई ऐब नहीं आता, फिर घोड़े तो बिगड़ ही कैसे सकते हैं? मुझे साधारण लोग तथा पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर भी 'ग्रन्थिक' नामसे ही पुकारा करते थे ।। ८ ।।

(मातलिरिव देवपतेर्दशरथनृपतेः सुमन्त्र इव यन्ता ।
सुमह इव जामदग्नेस्तथैव तव शिक्षयाम्यश्वान् ।।
युधिष्ठिरस्य राजेन्द्र नरराजस्य शासनात् ।
शतसाहस्रकोटीनाम्श्वानाम्स्मि रक्षिता ।।)

जैसे देवराज इन्द्रके सारथि मातलि हैं, जैसे राजा दशरथके रथचालक सुमन्त्र हैं और जैसे जमदग्निनन्दन परशुरामके सूत सुमह हैं, उसी प्रकार मैं आपका सारथि होकर आपके घोड़ोंको शिक्षा दूँगा। राजेन्द्र! मैं महाराज युधिष्ठिरके आदेशसे उनके यहाँ लक्षकोटि अश्वोंका संरक्षक रहा हूँ।

विराट उवाच

यदस्ति किंचिन्मम वाजिवाहनं
तदस्तु सर्वं त्वदधीनमद्य वै ।
ये चापि केचिन्मम वाजियोजका-
स्त्वदाश्रयाः सारथयश्च सन्तु मे ।। ९ ।।

**विराटने कहा—**ग्रन्थिक! मेरे पास जो भी घोड़े और अन्य वाहन हैं, वे सब आजसे ही तुम्हारे अधीन हो जायँ। इसके सिवा जो कोई भी मेरे घोड़ोंको जोतनेवाले सारथि हैं, वे सब तुम्हारे अधिकारमें इदं रहें ।। ९ ।।
इदं तवेष्टं यदि वै सुरोपम
ब्रवीहि यत् ते प्रसमीक्षितं वसु ।
न तेऽनुरूपं हयकर्म विद्यते
प्रभासि राजेव हि सम्मतो मम ।। १० ।।
युधिष्ठिरस्येव हि दर्शनेन मे
समं तवेदं प्रियमत्र दर्शनम् ।
कथं तु भृत्यैः स विनाकृतो वने
वसत्यनिन्द्यो रमते च पाण्डवः ।। ११ ।।
देवोपम पुरुष! यदि यही कार्य तुम्हें प्रिय है, तो बताओ, इसके लिये वेतनरूपसे कितना धन लेनेका तुमने विचार किया है? यह घोड़ोंकी शिक्षाका कार्य तुम्हारे अनुरूप नहीं है। तुम तो राजाकी भाँति शोभा पा रहे हो और मुझे भी अत्यन्त प्रिय लगते हो। आज मुझे तुम्हारा जो यहाँ दर्शन हुआ है, यह राजा युधिष्ठिरके ही दर्शनके समान मुझे अत्यन्त प्रिय है। अहो! सर्वथा प्रशंसाके योग्य पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर सेवकोंके बिना वनमें कैसे रहते होंगे और कैसे उनका मन वहाँ लगता होगा? ।। १०-११ ।।

वैशम्पायन उवाच

तथा स गन्धर्ववरोपमो युवा
विराटराज्ञा मुदितेन पूजितः ।
न चैनमन्येऽपि विदुः कथंचन
प्रियाभिरामं विचरन्तमन्तरा ।। १२ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार प्रसन्न हुए राजा विराटके द्वारा सम्मानित हो श्रेष्ठ गन्धर्वके सदृश शोभा पानेवाले युवावस्थासम्पन्न नकुल वहाँ रहने लगे। उनका स्वरूप बड़ा ही प्रिय और नयनाभिराम था। वे नगरके भीतर विचरते रहते थे, तो भी उन्हें राजा तथा अन्य मनुष्य किसी प्रकार पहचान न सके ।। १२ ।।
एवं हि मत्स्ये न्यवसन्त पाण्डवा
यथाप्रतिज्ञाभिरमोघदर्शनाः ।
अज्ञातचर्यां व्यचरन् समाहिताः
समुद्रनेमीपतयोऽतिदुःखिताः ।। १३ ।।
जिनका दर्शन अमोघ है, वे पाण्डवगण इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार मत्स्यदेशमें रहने और एकाग्रतापूर्वक अज्ञातवासका समय व्यतीत करने लगे। वे सागरसे

घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीके अधिपति होकर भी अत्यन्त कष्ट उठा रहे थे ।। १३ ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि नकुलप्रवेशे द्वादशोऽध्यायः ।। १२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें नकुलप्रवेशसम्बन्धी बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १५ श्लोक हैं।)