महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2202, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंभ्रामयित्वा शतगुणं गतसत्त्वमचेतनम् । प्रत्यपिंषन्महाबाहुर्मल्लं भुवि वृकोदरः ॥ ३६ ॥ सौ बार घुमानेपर जब वह धैर्य, साहस और चेतनासे भी हाथ धो बैठा, तब बड़ी-बड़ी बाहुओंवाले वृकोदरने उसे पृथ्वीपर गिराकर मसल डाला ॥ ३६ ॥
तस्मिन् विनिहते वीरे जीमूते लोकविश्रुते । विराटः परमं हर्षमगच्छद् बान्धवैः सह ॥ ३७ ॥ इस प्रकार उस लोकविख्यात वीर जीमूतके मारे जानेपर राजा विराटको अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३७ ॥
प्रहर्षात् प्रददौ वित्तं बहु राजा महामनाः । बल्लवाय महारङ्गे यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ३८ ॥ उस समय कुबेरके समान महामनस्वी राजा विराटने अत्यन्त हर्षमें भरकर बल्लवको उस विशाल रंगभूमिमें ही बहुत धन दिया ॥ ३८ ॥
एवं स सुबहून् मल्लान् पुरुषांश्च महाबलान् । विनिघ्नन् मत्स्यराजस्य प्रीतिमाहरदुत्तमाम् ॥ ३९ ॥ इसी तरह बहुत-से पहलवानों और महाबली पुरुषोंको मारकर भीमसेनने मत्स्यनरेश विराट्का उत्तम प्रेम प्राप्त किया ॥ ३९ ॥
यदास्य तुल्यः पुरुषो न कश्चित् तत्र विद्यते । ततो व्याघ्रैश्च सिंहैश्च द्विरदैश्चाप्ययोधयत् ॥ ४० ॥